Tuesday, June 21, 2011

ग़ज़ल

अब मैं धीरे-धीरे अपनी किस्मत लिखता हूँ
हासिल के खाते में उनकी खिदमत लिखता हूँ

उनकी खिदमत, जिसमे आँखें बूढी हो आयीं
बूढी आँखों कि अनदेखी हसरत लिखता हूँ

हसरत भरी निगाह बचा कर रक्खी सालों-साल
उन्हीं नज़रों की खातिर अब रहमत लिखता हूँ

कागज़ पर अल्फाज़ और अश-आर उतर आते
जब दीवानेपन में आ मैं वुस-अत लिखता हूँ

और कलम जब-जब सुस्ताने का मन करता है
तब-तब मैं कागज़ पर केवल हरकत लिखता हूँ

इधर ज़िन्दगी में जो कुछ तबदीली आई है
उससे किस्मत में सोनम सी बरकत लिखता हूँ


ओबामा चरित

बन्धु ओबामा की सदा, खुली रहे दूकान।
फर्क मिटे दिन रात का, चला रहे अभियान।।

कोशिश है साम्राज्य का, सूर्य न होवे अस्त।
बुश से ऊबा विश्व हो, ओबामा से त्रस्त।।

श्वेत-अश्वेत की चांचर में निकस्यो बिजई हुइ के रंग स्यामा।
आस बंधी सब लोगन को मनो भागो अंधेरो अ निकस्यो घामा।
फीकी परी सब नीकी उजास ये जान कि काग उलूक को मामा।
अंतर का परितै मनमोहन, होत्यो बुश या कि आहै ओबामा।।

बुश को अराजक राज चल्यो बिनसायो अनेकन को धन-धामा।
तेल की प्यास बुझी न कभी और ना ही मिला कभी कोई ओसामा।
भूत भयंकर भय को बनायो, कबहुं आतंक कबहुं इसलामा।
सोई अराजकता को बढ़ावन आवत है दुरदांत ओबामा।।
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लाल गलीचे बिछाए, राह तकें दिन-रैन।
कृपा करो इस देश पर स्यामल अंकल सैम।।

श्वेत तुम्हारे पूर्वजों का हम पर एहसान।
दो सौ बरसों में बने हम कुछ सभ्य सयान।।

चीख पुकार बुलाव गुहार सुनात कछू न दिखात हो रामा।
सीस पे नीली पगा पर सोभत लकदक जैकेट और पजामा।
लूट को राज यहै मनमोहन, देस रहै जनु दीन सुदामा।
स्वागत को करबद्ध खड़े, लै जाहु जो चाहत होय ओबामा।।

मंदी की मार से बेकल यू एस त्रस्त नगर संत्रस्त हैं ग्रामा।
घोर अकाल परयो रोजगार को, आगे की राह पे लाग्यो विरामा।
मांस की भूखी औ खून की प्यासी, जो कौम उसे मत जानियो लामा।
युद्ध के सौदे की बात मनावन आवत आदमखोर ओबामा।।

-आलोक कुमार श्रीवास्तव

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