Saturday, October 27, 2012

गीत  

ये वियोग के दिन हैं पांच !
आया है सन्देश तुम्हारा उसे रहा हूँ बांच |
तुम्हें सात के बाद लगा करता है बहुत अजीब,
लेकिन मेरा तो ऐसा भी हो ना सका नसीब |
तुम्हें अजीब लग रहा है मेरी तबियत नासाज,
यहाँ सैकड़ों मील दूर है सिर्फ तुम्हारी याद |
सिर अपना है, और हाथ में सिर्फ उंगलियाँ पांच,
दर्द भी अपना और उँगलियों का अपना है नाच |
दो दिन बीत गए हैं अब बस बचे हुए हैं तीन,
बुला रही है याद तुम्हारी जैसे अहि को बीन |
बार-बार दिन जोड़ रहा हूँ और रहा हूँ जांच | 
                         ये वियोग के दिन हैं पांच ! 

(पाँच दिन के गुवाहाटी प्रवास के दौरान, जब पत्नी मुम्बई में थीं और उन्होंने इस आशय का एसएमएस किया था कि शाम सात के बाद उन्हें बहुत अजीब महसूस होता है)