मेरी हालिया कविता....
देह
यह सिर्फ जवानी के दिनों का
बयान हो सकता है
(इस दकियानूस मुल्क में)
कि मेरे लिए
स्त्री का मतलब है
सिर्फ मेरी पत्नी।
(...कोई और नहीं!)
खुलासे और तफसील की मांग पर,
आता है जवाब –
कि मुकम्मल तौर पर
जिसे ’देखा’ है मैंने,
(मैं आखिर कबीर की ही परम्परा का तो हूँ,
इसीलिए कहूँगा ‘आँखिन की देखी’,
जिसे देखा नहीं
उसे भला क्यों मानूँगा या कहूँगा)
बात सिर्फ देखने की ही नहीं,
‘महसूसने’ और ‘जानने’ की भी है...
(उससे भी आगे अवगाहने की भी है)
और इन सब ‘क्रियाओं’ को
अनुभव में बदला है मेरे लिए –
सिर्फ मेरी पत्नी ने।
जवानी के दिनों का यह बयान
बदलेगा नहीं कभी शायद अब
क्योंकि कोई फैशन नहीं है
यह बयान,
बल्कि सचाई के तकाज़े से उपजा
मेरे भीतर का ईमान है।
यह बात दीगर है
कि अक्सर,
डगमगाता भी है मेरा ईमान,
और तब
‘डगमग छाँड़ि दे मन बौरा’ गाकर
सीधे रास्ते पर लाता हूँ खुद को,
बन जाता हूँ निरगुनिया
तनिक देर के लिए,
क्योंकि जानता हूँ
यह सब, बाकायदा
कि ‘गुन’ कौन-कौन से भरे हैं
माया का भेस धरे
नारी की देह में।
(अब माया का भेस धरना ही
ईप्सित चुनौती है नारी की;
यह भी फरिया दूँ कि
नारी पर माया होने का आरोप
बेबुनियाद है वैसे ही
जैसे, कविता पर अश्लीलता का आरोप।)
देह, जिसे माटी का लोंदा
कह गए बाबा कबीर;
देह, जो खींच ले गई
बाबा तुलसी को
सावन की अंधियारी रात में
धकियाकर, ललचाकर
देह, वह भी नारी की देह
ईमान, वह भी पत्नी को अर्पित ईमान...
वर्ना अपनी ही पत्नी की देह के लिए
क्यों तड़पे तुलसी,
आखिर क्यों बार-बार
रटते रहे महात्मा कबीर
‘सुनो लोई!’
किसी और के पास नहीं गए तुलसी,
किसी और को नहीं सुनाया कबीर ने,
घोर निर्जन में बाबा नागार्जुन ने
देखा तो सिर्फ सिंदूर तिलकित भाल,
नाच रही है
मेरे जेहन में फिलहाल
सोनम की टेढ़ी माँग
और बाएँ से दाएँ जाते
खूब फूले और खुले बाल
आँखों में काजल की पतली लकीर भी
रोक लिया करती है
मुझको चहेंट कर।
ओ हो... घबराइए नहीं मित्र,
देह की बात छेड़
डालूँगा नहीं पेशोपस में
कि आप
सभ्यता के तकाज़े से
कविता पर अश्लीलता का आरोप
जड़ने को बाध्य हों।
चाह सदा है मेरी
कि दु:ख ही नहीं सिर्फ,
बल्कि सुख भी
कवि और पाठक का साध्य हो,
मगर नहीं चाहूँगा
सोने वाला सुखिया संसार कभी,
भूख भी हो और रोटी भी हो
बीवी भी हो और बेटी भी हो
काम भी हो, नींद भी हो
मेहनत हो, थकन हो, आगे की उमीद भी हो
और एक सपना हो
वैसे ही, जैसे, कोई अपना हो
और अपनों की गंध तो
चींटी से लेकर हाथी तक को
भाती है
गंध से भी ज्यादा स्वाद,
कि अनायास नहीं है
पत्नी के होठों के प्रति
मेरी दीवानगी, मेरा पागलपन...
आप चिंतित न हों,
आँच नहीं आने दूँगा
आपकी सभ्यता की मर्यादा पर
कुछ भी अश्लील
घटित नहीं होने दूँगा
कविता पर।
कर ही नहीं पाऊंगा जाहिर
वह स्वाद
(ज्यों गूँगे मीठे फल को रस...)
गो कि कहते हैं लोग
कि स्थूल है देह
(लीजिए मैं मान लेता हूँ
कि उसका स्वाद भी स्थूल होगा)
मगर दृश्यों की सूक्ष्मता पर
कोई शुबहा नहीं रहा कभी मुझे,
और देखते समय
मैं साथ-साथ ही देखता हूँ
स्थूल और सूक्ष्म को,
जब टकराते हैं
मेरे स्थूल और सूक्ष्म
(आप चाहें तो यहाँ मार्क्स बाबा का सुमिरन कर सकते हैं)
तब ज्यादातर
स्थूल ही बचता है दृश्य में,
बस कोनों-अँतरों की जगहों को
भरने के काम आता है सूक्ष्म
जहाँ वैसे भी कम से कम
धूल तो
भरी ही रहती है,
मेरी सफाईपसंदगी भी
जिसे हटा नहीं पाई
उसे कविता से
हटाने की कठिन कोशिश
भला क्यों करूंगा मैं
तो फिर इस धूल-गंदगी के बीच बसा
सच भी
कैसे बदल सकता है,
कोई फर्क नहीं पड़ता इस बात से
कि बयान मेरा है
या मेरे मित्र घनश्याम का
सवाल तो यह है
कि हमारे लिए
स्त्री का मतलब
हमारी पत्नी के सिवा कोई और क्यों नहीं है...
और हमारा समवेत जवाब है-
देह।