देश के वर्तमान सामाजिक-राजनीतिक परिवेश में, जब
भारतीय पूँजीपति वर्ग अपने नियंत्रण में मौजूद राजकीय तंत्रों का अपने हित के लिए
अधिकतम और कारगर तरीके से उपयोग करते हुए एक विचारधारात्मक ढाँचा गढ़ने के लिए कमर
कस रहा है, तब हमारे लिए यह आवश्यक है कि
उसके इस प्रयास के कारण जो सामाजिक तथा सांस्कृतिक चेतना पैदा होने की सम्भावना है, उसके बारे में हम सचेत रहें। राज्य द्वारा नियंत्रित
सूचना-संचार माध्यमों का ज़रा ज्यादा ही तेज़ी से विकास और सरकार के प्रशासनिक
ताने-बाने का आधुनिकीकरण, पूँजीवादी वर्चस्व-स्थापन की
महत्वपूर्ण कड़ियाँ हैं। राजनीति को छोड़ दें तब भी, राज्य
तथा पूँजीपति वर्ग के पास जिस तरह के साधन हैं उन्हें देखते हुए, एक जवाबी प्रभुत्व के विकास के साधन तथा तरीके क्या
हैं? यह एक ऐसा सवाल है जिस पर फौरन
ध्यान दिए जाने की जरूरत है, क्योंकि इन दिनों पूँजीवादी
सांस्कृतिक तथा विचारधारात्मक हमला अभूतपूर्व पैमाने पर छेड़ा जा रहा है।1
देश का वर्तमान नब्बे के दशक की शुरुआत में ही घटित तीन प्रमुख घटनाओं से
निर्मित हो रहा था। ये थीं – मंडल आयोग की रिपोर्ट का आना, आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत; और बाबरी मस्जिद का विध्वंस। इन घटनाओं के व्यापक
प्रभाव को देखते हुए हम इन्हें एक विभाजक रेखा के रूप में ले रहे हैं। अपने
अभिव्यक्त रूप से पहले अगर इनकी पृष्ठभूमि और आधार को देखा जाए तो थोड़ा पीछे जाकर
इसे अस्सी के दशक के मध्य से मान सकते हैं। यहाँ से आरम्भ होने वाले वर्ष ही हमारे
लिए ‘वर्तमान’2 हैं, जिन्हें
हम जी रहे हैं।
ऊपर जिस सांस्कृतिक और विचारधारात्मक हमले की बात की गई है, इन तीनों घटनाओं का उससे एक अंतस्संबंध है। तीसरी
दुनिया के देशों में सामराजी पूंजीवाद अपने को जिस रूप में व्यक्त कर रहा है उसमें
सांस्कृतिक पतनशीलता, साम्प्रदायिक और नस्लीय हिंसा तथा
जातिवादी वैमनस्य, भ्रष्टाचार आदि प्रमुख हैं। लेकिन
यह वर्तमान सिर्फ इन्हीं तत्वों से नहीं बन रहा है बल्कि इन स्थितियों के खिलाफ
तमाम सच्चे धर्मनिरपेक्ष, जनवादी तथा अस्मितावादी संघर्षों
से भी तय हो रहा है। ऐसी स्थिति में अतीत की भूमिका मौन की नहीं होती। अतीत में एक
तरह की मुखरता होती है, वह जड़ नहीं होता। वह सतत्
परिवर्तनशील है। काल के किसी एक बिंदु पर अतीत एक चीज़ होता है।3 अतीत हमें प्रेरणा देने के लिए
है। अतीत से हम शिक्षा ले सकते हैं।4 अतीत के संबंध में जो एक बात हम नहीं कर सकते वह ये
कि हम उसे फिर से साकार कर दें। हम उसे सिर्फ नष्ट कर सकते हैं।5
भक्तिकाल को हम वर्तमान और अतीत के इन्हीं संबंधों के बीच देख सकते हैं।
लेकिन इससे पहले विद्वानों और हिंदी के साहित्येतिहासकारों के भक्तिकाल विषयक
दृष्टिकोण पर विचार कर लेना अप्रासंगिक न होगा।
भक्तिकाल के उदय के संबंध में आचार्य रामचंद्र शुक्ल का बहुत बार दुहराया
जा चुका मत है कि यह हताश हिंदू जाति6 के भक्ति के शरण में जाने और
इस्लाम की प्रतिक्रियास्वरूप हुआ।7 आचार्य शुक्ल ने अपने इस कथन में
जिस प्रकार‘हताश हिंदू’ और ‘इस्लाम की
प्रतिक्रिया’ पदों का प्रयोग किया है, वह इतिहासकार के रूप में उनके द्वारा एक अवैज्ञानिक
पद्धति के प्रयोग का प्रमाण और परिणाम है। क्योंकि जिस भक्तिकाल की वे बात करते
हैं उसी में इस बात की जाँच करने की जहमत नहीं उठाते कि खुद भक्तिकालीन कवियों के
यहाँ इन पदों का प्रयोग हुआ है, या नहीं। अगर हुआ है तो किस रूप
में। उन्होंने शायद इस सामान्य तथ्य पर ध्यान देना भी आवश्यक नहीं समझा कि ‘प्रतिक्रिया’ और ‘प्रभाव’ में अंतर
होता है। इस प्रकार भक्तिकाल के संबंध में वे इतिहास पर अपना मत थोपते हैं। जिस
समय और समाज में वे खड़े थे, उसकी बहुत सारी जटिलताओं और
संश्लिष्टताओं को सुविधापूर्वक छोड़ते हुए एक सरलीकृत समझ और अपनी मान्यताओं के साथ
वे भक्तिकालीन समय और समाज को देख रहे थे। (यहाँ यह गौरतलब है कि जब रामचंद्र
शुक्ल यह कर रहे थे तब तक कांग्रेस के भीतर हिंदुओं और मुसलमानों को अलग-अलग
आइडेंटिटी के रूप में देखा जाने लगा था।) वस्तुत: रामचंद्र शुक्ल का यह ‘हताश हिंदू जाति’ पद का
प्रयोग पूँजीवादी उत्पादन संबंधों के प्रवेश के साथ या उसकी विशिष्टताओं के आगे
हताश सामंती संस्कारों के लिए गरिमापूर्ण शरणस्थल साबित हुआ। यह उनके सृजनशील
व्यक्तिवाद8 की सीमा-रेखा थी जो सामंती संस्कारों के नए संस्करणों
द्वारा तय की जा रही थी। इसके माध्यम से आधुनिक भारत के नवजागरण से ही उपस्थित
साम्प्रदायिक पहचान को भी देखा जा सकता है।रामचंद्र शुक्ल के लिए वही महत्वपूर्ण
रहा जो भक्ति काल ने हिंदुओं को दिया, मानवता
के लिए या तत्कालीन समाज की प्रतिक्रियात्मक शक्तियों और सत्ता के खिलाफ जो रुख
भक्तिकाल का रहा, उसे उन्होंने उतना खास नहीं समझा।
दूसरे साहित्येतिहासकार आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी इस मामले में सावधान
रहे और उन्होंने इस सिलसिले में जो पद-समूह प्रयुक्त किए, वे हैं – ‘हिंदीभाषी
जन-समुदाय’9 और ‘आज का
हिंदू समाज’10। ‘हिंदी साहित्य :भारतीय चिंता का स्वाभाविक विकास’ में वे लिखते हैं – “आज से लगभग हजार वर्ष पहले हिंदी
साहित्य बनना शुरू हुआ था। इन हजार वर्षों में भारतवर्ष का हिंदी भाषी जन-समुदाय
क्या सोच-समझ रहा था, इस बात की जानकारी का एकमात्र
साधन हिंदी साहित्य ही है।” आगे वे लिखते हैं – “अपनी बात को ठीक-ठीक समझाने के
लिए मुझे और भी हजार वर्ष पीछे लौट जाना पड़ेगा। आज के हिंदू समाज में आज से दो
हजार वर्ष पहले से लेकर हजार वर्ष पहले तक के हजार वर्षों में जो ग्रंथ लिखे गए, उनकी प्रामाणिकता में बाद में चलकर कभी कोई संदेह
नहीं किया गया और उन्हें ही यथार्थ में हिंदू धर्म का मेरुदंड कह सकते हैं।”इन ग्रंथों में
स्मृति, संहिता, सिद्धांत-ग्रंथ और पुराणों के अतिरिक्त बौद्ध और जैन
धर्मग्रंथों के साथ शैव-शाक्त ग्रंथ भी लिखे गए। हिंदी भाषी जनसमुदाय इन सब के
प्रभाव में ही बन रहा था। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भक्तिकाल को पहले से चली आती
हुई चिंता धारा के विकास के रूप में देखा जरूर, लेकिन
भक्तिकालीन सामाजिक शक्तियों की शिनाख्त और उनका भक्तिकाल से सम्बंध; यह विषय उनकी चिंता प्रक्रिया से बाहर रहा जिसे
उन्होंने अपने विश्लेषण में शामिल करना आवश्यक नहीं समझा। जब कि अब तो यह तथ्य भी
आ गया है कि तंत्र-मंत्रवाद वस्तुत: निचली जातियों या पुरोहिती समूह से बाहर रहने
वाली जातियों की अपनी प्रतीकात्मक भाषाभिव्यक्ति थी।11
हजारी प्रसाद द्विवेदी की दूसरी सीमा है उनका संस्कृत प्रेम। उन्होंने लिखा
है – हिमालय से सेतुबंध तक सारे भारतवर्ष के धर्म, दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा आदि विषयों की भाषा कुछ सौ वर्ष पहले तक एक
ही रही है। यह भाषा संस्कृत थी। भारतवर्ष का जो कुछ श्रेष्ठ है, जो कुछ उत्तम है, जो कुछ रक्षणीय है, वह इस भाषा के भंडार में संचित
किया गया है। जितनी दूर तक इतिहास हमें ठेलकर पीछे ले जा सकता है, उतनी दूर तक इस भाषा के सिवा हमारा कोई सहारा नहीं है। ....हमारे कम से
कम छह-सात हजार वर्ष के विशाल इतिहास में अधिक से अधिक पाँच सौ वर्ष ऐसे रहे हैं
जिनमें विदेशी भाषा (फारसी/अरबी) का आधिपत्य रहा। दुर्भाग्यवश इस सीमित काल और
सीमित अंश में व्यवहृत भाषा का दावा आज हमारी भाषा समस्या का सर्वाधिक जबर्दस्त
रोड़ा साबित हो रहा है.... इस विशाल देश की भाषा समस्या का हल आज से सहस्रों वर्ष
पूर्व से लेकर अब तक जिस भाषा के जरिए हुआ है, उसके सामने
कोई भी भाषा न्यायपूर्वक अपना दावा लेकर उपस्थित नहीं रह सकती, फिर वह स्वदेशी हो या विदेशी। इस धर्म के मानने वाले की हो या उस धर्म
के। इतिहास साक्षी है कि संस्कृत इस देश की अद्वितीय महिमाशालिनी भाषा है : अविजित, अनाहत और दुर्द्धर्ष।12
इसमें हजारी प्रसाद द्विवेदी ने भारत का कुल इतिहास सात हजार वर्ष माना है, अर्थात ईसवी सन से
5000 साल पहले। इतिहास को वे जितना पीछे ठेलकर ले जाते हैं वहाँ उन्हें संस्कृत
भाषा ही एक सहारा दिखती है। जब कि प्राचीनतम अभिलेखों (मौर्य साम्राज्य) और बौद्ध
साहित्य की भाषा (छठी सदी ई.पू.)संस्कृत नहीं है। दूसरे डॉ. राम विलास शर्मा ने
अपने मत में परिवर्तन करते हुए यह स्वीकार किया कि संस्कृत के व्यवहार से पहले
भारत में संस्कृतेतर भाषा विद्यमान थी और खुद वैदिक भाषा ने उससे काफी कुछ ग्रहण
किया। अभिलेखीय साक्ष्यों में देखा जाए तो पूर्णत: शुद्ध संस्कृत में लिखित उपलब्ध
प्राचीनतम अभिलेख गुजरात में गिरनार स्थित शक नरेश रुद्रदामा प्रथम का है जो दूसरी
ईसवी सदी का है।13
महाभाष्य के रचयिता पतंजलि का कहना है कि संस्कृत के एक सामान्य मानक शब्द
के विपरीत अनेक गैर मानक एवं भ्रष्ट अपशब्द अथवा अपभ्रंश शब्द होते हैं।14 अर्थात संस्कृत शब्दों की तुलना
में गैर-संस्कृत शब्दों में कहीं अधिक विकल्प उपलब्ध थे। ये विकल्प न केवल उन
भाषाओं की सापेक्षिक समृद्धि दर्शाते हैं, बल्कि उनके संभावित व्यापक जनाधार की
ओर भी इशारा करते हैं।15 इस सम्बन्ध में बगैर
किसी आग्रह और भाषाई झुकाव के निरपेक्ष विश्लेषण से यह बात सामने आती है कि
संस्कृत उस समय की एक समानांतर भाषा थी, वह दूसरी भाषाओं की
जननी नहीं थी| खुद हिन्दी के विकास की जो परंपरा भाषा
वैज्ञानिकों ने अब तक दिखाई है उसमें भारत में आदिभाषा की शुरुआत वैदिक संस्कृत से
मानी जाती है| अब इस मान्यता से भी हमें मुक्त हो ही जाना
चाहिए, क्योंकि अब हमारे पास इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि
पालि, प्राकृत, अपभ्रंश आदि का विकास
संस्कृत से नहीं बल्कि तत्कालीन समाज की जनभाषा से हुआ है|
हजारी प्रसाद द्विवेदी जिसे हिंदी
भाषी जनसमुदाय कहते हैं और जो भक्तिकाल में अपनी समृद्धि गाथा लिखता है, वह भी एक हजार साल पीछे से बन रहा था जिसका स्रोत
संस्कृत से अधिक गैर-संस्कृत भाषाएँ थीं और जिसे वह आरोपित करके भारतीय चिंताधारा
बताते हैं वह भी संस्कृत से इतर भाषा और उस भाषा समुदाय की देन अधिक है जिसे वे
औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ बन रही ‘भारतीयता’ की समावेशी संस्कृति से ढँक देते हैं। इस प्रकार
शुक्ल जी की ‘हिंदू जाति’ की जगह द्विवेदी जी की ‘भारतीयता’ ले लेती
है।
हजारी प्रसाद द्विवेदी की तीसरी कमजोरी है अरबी-फारसी को भारत की भाषा
समस्या का रोड़ा घोषित करना। असल में यह प्रतिक्रियावादी विचार हिंदी के संस्कृतकरण
की साजिश की उपज है। हिन्दी का संस्कृतकरण हजारी प्रसाद द्विवेदी को उसी हिंदी
भाषी जनसमुदाय की ऐतिहासिक स्थितियों के पार्श्व में धकेल देता है जिसके बल पर वे
रामचंद्र शुक्ल के मत से अपने को अलगाते हैं और नवजागरण की ही भाषाई बहस में अपने
को संस्कृत से जोड़ते हैं| इस कड़ी में तीसरा मत हम मुक्तिबोध का लेंगे जो कहते हैं - "भक्तिकाल
की मूल भावना साधारण जनता के कष्ट और पीड़ा से उत्पन्न है| यद्यपि
पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी का यह कहना ठीक है कि भक्ति कि धारा बहुत पहले से
उद्गत होती रही और उसकी पूर्व भूमिका बहुत पूर्व से तैयार होती रही, किन्तु उनके द्वारा निकाला गया यह तर्क ठीक नहीं मालूम होता कि मध्ययुगीन
भक्तों की भावना में जनता के सांसारिक कष्टों के तत्व नहीं हैं| पंडित रामचंद्र शुक्ल के इस कथन में हमें पर्याप्त सत्य मालूम होता है कि
भक्ति आन्दोलन का एक मूल कारण जनता का कष्ट है| किन्तु पंडित
शुक्ल ने कष्टों के मुस्लिम विरोधी और हिन्दू राजसत्ता के पक्षपाती जो अभिप्राय
निकाले हैं वे उचित नहीं मालूम होते| असल बात यह है कि
मुसलमान संत मत भी उसी तरह कट्टरपंथियों के विरुद्ध था, जितना
कि भक्तिमार्ग| दोनों एक दूसरे से प्रभावित भी थे| किन्तु, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि भक्ति
भावना की तीव्र आर्द्रता और सारे दुखों और कष्टों के परिहार के लिए ईश्वर की पुकार
के पीछे जनता की भयानक दु:स्थिति छिपी हुई थी| यहाँ यह हमेशा
ध्यान में रखना चाहिए कि वह बात साधारण जनता और उसमें से निकले हुए संतों की है,
चाहे वे ब्राह्मण वर्ग से निकले हों या ब्राह्मणेतर वर्ग से|
साथ ही यह भी स्मरण रखना होगा कि श्रृंगार भक्ति का भक्ति का रूप
उसी वर्ग में सर्वाधिक प्रचलित हुआ जहां ऐसी श्रृंगार भावना के परिपोष के लिए
पर्याप्त अवकाश और समय था, फुरसत का समय| भक्ति आन्दोलन का आविर्भाव एक ऐतिहासिक सामाजिक शक्ति के रूप में जनता के
दुखों और कष्टों से हुआ| यह निर्विवाद है|"16
मुक्तिबोध के सामने नवजागरण की शक्ति और सीमा दोनों स्पष्ट हो चुकी थी और
आजादी के आन्दोलन में सक्रिय सामाजिक शक्तियों और उनके नेताओं की स्थिति भी| इसलिए मुक्तिबोध
इतिहास, अतीत, परंपरा को बेहतर तरीके
से देख पा रहे थे| जबकि वहीं उनके समकालीन कई धाकड़
मार्क्सवादी और गैर मार्क्सवादी आलोचक अब भी भ्रम के एक कुहासे से घिरे हुए थे|
बहरहाल, उपर्युक्त तीनों मतों का हमारे 'वर्तमान' से सीधा सम्बन्ध है, जिसका बहुत कुछ हिन्दी नवजागरण
से तय हो रहा था| धर्म, सम्प्रदाय,
जाति, भाषा से सम्बंधित जितनी भी समस्याएँ 'वर्तमान' के सामने हैं उनके बीज कहीं न कहीं
औपनिवेशिक सत्ता के खिलाफ संघर्ष के दौरान बन रहे राष्ट्र के ही भीतर थे| आजादी की यह लड़ाई पुराणी सामाजिक शक्तियों की ही अगुआई में लड़ी गयी जो
टूटती सामंती सामाजिक संरचना से निकली थीं| ये वो लोग थे जो
अपने को बचाने के लिए इतिहास की ठूंठ और झाड़-झंखाड़ (प्रतिगामी चीजों) का सहारा ले
रहे थे| यही कारण है कि इस दौर में साहित्य में इतिहास,
अतीत, परम्परा से जो कुछ लिया गया उसमें से एक
भी प्रतीक और व्यक्तित्व निर्गुणमार्गी भक्तिधारा से नहीं है जो अपनी अंतर्वस्तु
में ज्यादा जनोन्मुख17, क्रांतिकारी और जातिविरोधी था|
भक्तिकाल के जिन दो व्यक्तित्वों, तुलसीदास और
कबीर पर इस दौर में ध्यान दिया गया उसमें साधारण जनों के लिए कबीर का सदाचारवाद
तुलसी के सन्देश से अधिक क्रांतिकारी था|18 इसके बावजूद,
रामचंद्र शुक्ल के प्रिय तो तुलसीदास थे ही, हजारी
प्रसाद द्विवेदी के भी प्रिय तुलसीदास ही थे| उन्होंने तुलसी
को 'उत्तर भारत के गले का हार' कहा है|
फिर निराला को भी जो व्यक्तित्व भाया वह तुलसीदास का ही था, और यह सब कुछ महज एक संयोग नहीं था| मुक्तिबोध लिखते
हैं - "एक बार भक्ति-आन्दोलन में ब्राह्मणों ('पुरोहितवाद
या सामंती व्यवस्था का बौद्धिक वर्ग' -ले.) का प्रभाव जम
जाने पर वर्णाश्रम धर्म की पुनर्विजय की घोषणा में कोई देर नहीं थी| ये घोषणा तुलसीदास ने ही की थी| निर्गुण मत में
निम्न जातीय धार्मिक जनवाद का पूरा जोर था, उसका क्रांतिकारी
सन्देश था| कृष्ण भक्ति में वह बिलकुल काम हो गया, किन्तु फिर भी निम्न जातीय प्रभाव अभी भी पर्याप्त था| तुलसीदास ने भी निम्नजातीय भक्ति स्वीकार की, किन्तु
उसको अपना सामाजिक दायरा बतला दिया| निर्गुण मतवाद के
जनोन्मुख रूप और उसकी क्रांतिकारी जातिवाद-विरोधी भूमिका के विरुद्ध तुलसीदास जी
ने पुराण मतवादी स्वरूप प्रस्तुत किया|19 किन्तु साथ ही यह
भी ध्यान में रखना होगा कि साधारण जनता ने राम को अपना त्राणकर्ता भी पाया,
गुह और निषाद को अपनी छाती से लगाने वाला भी पाया| एक तरह| जनसाधारण की भक्तिभावना के भीतर समाये हुए
सामान प्रेम का आग्रह भी पूरा हुआ किन्तु वह सामाजिक उंच-नीच को स्वीकार करके ही|"20
दरअसल औपनिवेशिक भारत में बौद्धिक धरातल पर आ रहे परिवर्तनों में, दो क्षेत्रों में
एक साथ जारी सांस्कृतिक-विचारधारात्मक संघर्षों की केन्द्रीय भूमिका थी| इनमें एक था परम्परागत व्यवस्था के विचारधारात्मक आधार के खिलाफ संघर्ष;
और दूसरा था औपनिवेशिक वर्चस्व-स्थापन के खिलाफ संघर्ष| ...जहां परम्परागत संस्कृति पश्चिम द्वारा प्रस्तुत सांस्कृतिक चुनौती का
सामना करने के लिए अपर्याप्त दिखाई दे रही थी वहीं औपनिवेशिक वर्चस्व-स्थापन तो
परम्परा को ही ख़त्म करता दिखाई दे रहा था| इसलिए इन दोनों
के खिलाफ बौद्धिक संघर्ष छिड़ा और यही संघर्ष औपनिवेशिक भारत की बौद्धिक
परिस्थितियों को गढ़ रहा था|21
भारतीय समाज के भविष्य को रूप देने की यह बौद्धिक तलाश, जो इस दुहरे
संघर्ष पर आधारित थी, परम्परा तथा आधुनिकता के प्रति अपने
रुख में दुविधाग्रस्त और अक्सर अंतर्विरोधग्रस्त बनी रही थी|22 यही दुविधा अतीत को परखने और भविष्य
को गढ़ने में सामने आ रही थी| सच तो यह है कि पराधीन जनगण के
लिए इतिहास इसकी संभावना ही प्रस्तुत नहीं कर रहा था कि वे अतीत और भविष्य के बीच
एक स्पष्ट विभाजन कर सकें| इसके चलते अतीत और भविष्य की उनकी
(बौद्धिक वर्ग की) धारणाएं अक्सर परस्पर अतिक्रमण करती हैं| सांस्कृतिक-विचारधारात्मक
संघर्षों की दिशा तथा उनके चरित्र को, इसी अतिक्रमणशीलता से
उत्पन्न अस्पष्टता तथा अनिश्चितता प्रभावित कर रही थी|23
हिन्दी नवजागरण से निकले बौद्धिक वर्ग के सामने यही समस्या थी| इस पूरे दौर में
एक प्रेमचंद ही ऐसे हैं जो अपने को इससे क्रमश: निकालते हैं, वर्ना उनके समकालीनों में रामचंद्र शुक्ल, हजारी
प्रसाद द्विवेदी, निराला, जयशंकर
प्रसाद आदि के यहाँ अतीत और भविष्य को लेकर अतिक्रमण, दुविधा,
अंतर्विरोध मौजूद है| लेकिन मुक्तिबोध की
स्पष्ट दृष्टि इसे जिस रूप में देखती है, उसकी अभिव्यक्ति इन
शब्दों में हुई है - "इस सर्वशक्तिशाली ब्रिटिश साम्राज्यवाद के भीतर भारतीय
औपनिवेशिक पूंजीवाद का उदय हुआ| विश्व पूंजीवाद के भीतर अखिल
भारतीय अर्थ-तंत्र भी पूंजीवादी हो गया था, किन्तु विशाल
सामंती ध्वंसावशेष अपनी बूढ़ी मीनारों के साथ अभी भी सीना ताने खड़े हुए थे|
...उन सामंती प्रभावों की रूपांतरित आदर्श छायाओं ने स्थित्यात्मकता
को जन्म दिया| इस स्थित्यात्मकता में व्यक्ति-मन छटपटाने लगा|
यह छटपटाहट तभी दूर हो सकती थी जब उसको क्रांतिकारी सामाजिक दर्शन
प्राप्त होता, जिसमें जनता के वास्तविक सामाजिक क्रांतिकारी
हितों के सामंजस्य में व्यक्ति की तृषाओं की पूर्ति तथा उपलब्धि होती| किन्तु उन दिनों वैसा नहीं हो सकता था|"24
यद्यपि वह युग अद्वैतवादी-रहस्यवादी दार्शनिक विचारों तथा नवीन परिष्कृत
धर्म-सम्प्रदायों और समाज-सुधारों का था, लेकिन सुधार केवल ऊपरी ही रहे|
भारतीय परिवारों की वास्तविक सामंती प्रभाव-श्रृंखलाएं घनीभूत ही
रहीं| यह इसलिए हुआ कि तत्कालीन उत्तर प्रदेश और बंगाल आदि
प्रान्तों के भीतर सामंती शोषण-व्यवस्था कमर कसकर खड़ी थी| दूसरे,
जो औद्योगिक पूंजीपति न थे, मात्र व्यापारी थे,
उनमें सामंती प्रभाव-छायाएं विशेष रूप से घनीभूत थीं| वे अभी तक सामंती-व्यवस्था से पूरा छुटकारा न पा सके थे| फलत: नवीन व्यक्तिवाद से संपन्न होकर धर्म एक नए रूप में आया, समाज-सुधार की बात केवल शाब्दिक होकर रह गयी और लोग सामंती प्रभावों का
आदर्शीकरण करने लगे|25 राजनीति में भी यही हो रहा था जिसके नेता गांधी थे| साहित्य-संस्कृति
में भी यही हो रहा था| इसी विचार-सरणी के भीतर अतीत को देखा
गया, भक्तिकाल को भी देखा गया, और संत
मत की अपेक्षा उसमें से इस तरह के सांस्कृतिक व्यक्तित्व छांटकर निकाले गए जो इस
आदर्शीकरण के अनुकूल थे|
इस क्रम में वे यह भी भूल गए कि
भविष्य इसकी सजा भुगतेगा। हमारे देश का मौजूदा वर्तमान आज इन्हीं गलतियों के
परिणामों से रू-ब-रू है। जाति, धर्म, सम्प्रदाय, भाषा इन
सभी का जनोन्मुख रूप, जो भक्तिकालीन संत मत में पूरी
प्रतिष्ठा पा चुका था, हिंदी के बौद्धिकों के बीच
प्रतिष्ठा नहीं पा सका। आज जब नव साम्राज्यवादी सांस्कृतिक हमला और तेज़ होकर पलटा
है तो फिर से हमारे सामने अतीत और भविष्य को लेकर सवाल खड़े होने लाजिम हैं।
यहाँ प्रारम्भ में वर्तमान की जिन
तीन घटनाओं की बात की गई, अर्थात उदारीकरण, बाबरी मस्जिद विध्वंस और मंडल कमीशन, उनमें से प्रथम दो ने सांस्कृतिक क्षेत्र में गम्भीर
चुनौतियाँ पेश कीं। बाबरी मस्जिद विध्वंस के दस वर्ष बाद गुजरात नरसंहार ने इसे और
भी गम्भीर कर दिया और वैश्विक पूँजी उदारीकरण उदारीकरण के रूप में इन्हीं ताकतों
को मजबूत करने में लगी है। भक्तिकाल के संत मत ने जिन सामंती संस्थाओं का ज़बर्दस्त
विरोध किया, उदारीकरण ने उन्हीं संस्थाओं को फिर से ताकतवर बनाया है। धर्म का जो मानवीय रूप हो सकता था, जो मानव मुक्ति का भी एक साधन हो सकता था, भक्तिकालीन संतों ने उसे प्रस्तुत किया। आज सांस्कृतिक
राष्ट्रवादियों और बाजार की ताकतों के द्वारा उसी धर्म के मनुष्य विरोधी संकीर्ण
रूप को मजबूत किया जा रहा है। जनोन्मुख भाषा का जैसा विस्तार भक्तिकाल में मिलता
है, वह फिर कभी सम्भव नहीं हो पाया।
आज उन भाषाओं के सामने संकट है। अभी भारतीय संस्कृति की एक विशेष पहचान बनाने की
कोशिश की जा रही है। इसमें मुख्य उद्देश्य यही है कि भारत और भारतीयता की परिभाषा
यहाँ के तथाकथित मूल निवासियों की पहचान के संदर्भ में की जाए। एक तरफ जहाँ धर्म
का सहारा लेकर इसे हिंदू धर्म और हिंदुत्व की एकरूपी परिधि से सीमित किया जा रहा
है, वहीं दूसरी ओर पूरी भारतीय
संस्कृति को केवल संस्कृत भाषा और साहित्य की ही देन बताकर उसके वास्तविक और
ऐतिहासिक रूप की हत्या की जा रही है।26 अब अगर हम भक्तिकाल को देखें तो कबीर ने संस्कृत को ‘कूप जल’ कहा है, ऐसे में कबीर पर विस्तृत अध्ययन करने वाले हजारी
प्रसाद द्विवेदी एक तरफ कहते हैं कि कबीर भाषा के डिक्टेटर हैं और दूसरी तरफ
संस्कृति निर्माण में संस्कृत भाषा तक अपने को सीमित कर लेते हैं और कहते हैं कि
कबीर पढ़े-लिखे होते तो संस्कृत की महिमा जान पाते। यानी कबीर अपने समय और समाज को
तो खूब अच्छी तरह समझ रहे थे लेकिन हजारी प्रसाद द्विवेदी के हिसाब से भाषा की
उनकी समझ उनके न पढ़े-लिखे होने से सीमित होती है। कबीर पढ़े-लिखे होने के अभाव में
संस्कृत को ‘कूप जल’ कह बैठे लेकिन पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी खुद यह
जान न पाए कि संतों ने पूरे देश में संस्कृत को क्यों नहीं अपनाया। चाहे बंगाल, असम हो, तब का
महाराष्ट्र हो, या राजस्थान और मध्यदेश का कोई
भाग हो। आखिर नई भाषा की जरूरत क्यों पड़ी, और इन
संत कवियों ने जिन हिंदी, मराठी, बंगाली, पंजाबी
आदि भाषाओं को गढ़ा, क्या उससे भारत की संस्कृति के
निर्माण में कोई मदद नहीं मिली। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने अपने संस्कृत मोह के
चलते संस्कृत की औपचारिक और अच्छी शिक्षा प्राप्त कवि विद्यापति की “सक्कय वाणी बुहुजन
भावइ। पै अंतस को मम्म न पावइ” की उक्ति पर भी विचार करना
जरूरी नहीं समझा|
भारतीय इतिहास के पूरे मध्यकाल में
जिस समन्वित संस्कृति (कम्पोजिट कल्चर) का निर्माण हो रहा था, क्या उस पर भक्तिकालीन संतों का असर नहीं था? रामचंद्र शुक्ल और हजारी प्रसाद द्विवेदी तो खास तौर
पर रामचरितमानस के अवधी भाषा में लिखे जाने पर इतने खुश नहीं जितने कि उसका मंगलाचरण
संस्कृत में होने पर हैं। इसका सीधा संबंध हिंदी नवजागरण के दौर में हिंदी को
उर्दू से अलग संस्कृत के करीब ले जाने की सोच से है जो अंतत: इस समझ तक जाती है कि
‘हिंदी हिंदुओं की भाषा’ है। यह
अनायास नहीं है कि (संघ की अगुआई में)सांस्कृतिक राष्ट्रवादी पूरे मध्यकाल को
मुस्लिम काल या धर्म विशेष का काल कहते हैं और भारत की गुलामी को अंग्रेजों से
पहले का साबित करते हैं। उनका डर दरअसल उस समन्वित संस्कृति और भाषा को लेकर है जो
मध्य काल में विकसित हुई और जिसमें संत मत की बड़ी भूमिका रही और जिसमें पुरोहितवाद
पर जोरदार हमला रहा और जो उनकी विचारधारा और राजनीति के खिलाफ जाती है और जब भक्ति
काल पर बात करना बहुत जरूरी हो जाता है तो कोशिश पूरे भक्तिकाल की साम्प्रदायिक
व्याख्या की होती है। यह प्रवृत्ति हमारे ‘वर्तमान’ में अचानक ही नहीं उभरी। बाबरी मस्जिद विध्वंस के
बाद भाकपा(माले) के तत्कालीन महासचिव कॉ. विनोद मिश्र के 1993 के एक भाषण के
निम्नलिखित अंश से यह स्पष्ट हो जाएगा। उन्होंने कहा था :
इतिहास में बहुत-सी घटनाएँ घटती रहती हैं – छोटी-बड़ी। इनमें कुछ-कुछ ऐसी घटनाएँ
होती हैं जिनका बड़ा असर होता है और जिन घटनाओं के जरिए हम बहुत-सी चीज़ें जान पाते
हैं, बहुत-से रहस्यों पर से पर्दे उठ जाते हैं। आज से तकरीबन
एक साल पहले बाबरी मस्जिद को गिरा दिया जाना एक ऐसा ही वाकया है, एक ऐसी ही घटना है। इस मामले में जो बात अक्सर कही गई है बीजेपी ने
हिंदुस्तान की जो स्टेट की संस्थाएँ हैं – पार्लियामेंट, ज्यूडीशियरी, लॉ एंड ऑर्डर मशीनरी इन सब को नहीं
माना, इनका मखौल उड़ाया और बाबरी मस्जिद गिरा दी। लेकिन सवाल
इससे भी बड़ा है। सवाल यह है कि हमारे स्टेट की, हिंदुस्तानी
हुकूमत की ये सारी जो संस्थाएँ थीं वे क्यों इस घटना को चुपचाप खड़ी देखती रहीं। हिंदुत्व, जब अपने पूरे हमलावर रुख के साथ सामने आया, तो हमने
देखा कि हिंदुस्तान की हुकूमत, हिंदुस्तानी स्टेट की सारी
इंस्टीच्यूशंस नपुंसक बन के रह गईं। हिप्पोक्रेट बनके रह गईं। ज्यूडीशियरी से लेकर
नेशनल इंटीग्रेशन काउंसिल से लेकर लॉ एंड ऑर्डर मशीनरी तक। सवाल सिर्फ एक प्राइम
मिनिस्टर की हिचकिचाहट का, कमजोरी का नहीं था। वह तो एक
सिम्बल था इस बात का कि जब भी हिंदुत्व अपने पूरे हमलावर रुख के साथ सामने आया है, हमारी सारी की सारी स्टेट इंस्टीच्यूशंस नाकारगर साबित हुई हैं।27
हिंदुस्तानी मुसलमान, जिन्हें पार्टीशन
के बाद काफी बड़े मानसिक धक्के का शिकार होना पड़ा था और बहुत-सी परेशानियाँ उठानी
पड़ी थीं, धीरे-धीरे हिंदुस्तानी हुकूमत के जो मामले थे, जो सेकुलरिज्म की बातें थीं, उन पर भरोसा रखते हुए
इस पूरी व्यवस्था के साथ अपने को जोड़ रहे थे। लेकिन बाबरी मस्जिद की घटना ने उनके
सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया कि हिंदुस्तानी स्टेट कहाँ तल सेकुलर है। और, इस घटना ने फिर से उन तमाम पुराने सवालों पर, जो एक
समय लगता था कि हल किए जा चुके हैं, उन सारे मुद्दों पर फिर
से बहस छेड़ दी है। मैं इस बारे में फिर कहना चाहूँगा कि जिन्ना का जो मुस्लिम
राष्ट्रवादथा, मुस्लिम नेशनलिज्म था वह किसी सावरकर या
गोलवरकर के रिऐक्शन में नहीं आया था। क्योंकि सावरकर-गोलवरकर की ताकतें उस जमाने
में काफी कमजोर थीं। कहीं न कहीं वो उभरा था गांधी के जो इंडियन नेशनलिज्म, गांधी की जो भारतीय राष्ट्रवाद की परिभाषा थी, उसके
रिऐक्शन में। भारतीय राष्ट्रवाद की जो परिभाषा, इंडियन
नेशनलिज्म की जो बात गांधी के जमाने में शुरू हुई, वह लिबरल
थी, उदारवादी किस्म की थी। बाद में वह बढ़ते-बढ़ते हिंदुत्व की
अल्ट्रा, एक उग्र धारा में बदलती चली गई। नेहरू एक पर्दे का
काम करते थे, एक शील्ड का काम करते थे – हिंदुस्तानी स्टेट की असलियत को छिपाने में। वे हटे,
इंदिरा गांधी आयीं और उन्होंने इंडियन नेशनलिज्म का जो हमलावर रुख दिया उससे
भारतीय राष्ट्रवाद, हिंदुस्तानी राष्ट्रवाद और हिंदू
राष्ट्रवाद के बीच की दीवार खत्म हो गई। यह वह स्थिति थी जिसकी अनिवार्य परिणति
भारतीय जनता पार्टी के मजबूत होने में ही हो सकती थी। राम जन्मभूमि का ताला खोला
गया। असलियत में बोतल से साम्प्रदायिकता के जिन्न को बाहर निकाल दिया गया। आज वह
जिन्न बाहर निकल चुका है और पूरे देश में तबाही मचा रहा है। उसे फिर से बोतल में
बंद करने की सारी कोशिशें अभी तक नाकाम साबित हुई हैं।28 आज हिंदुस्तान दोराहे पर खड़ा है जहाँ से आप या एक
हिंदू राष्ट्र की तरफ बढ़ सकते हैं या एक आधुनिक, मॉडर्न सेकुलर स्टेट की तरफ।29
भक्तिकालीन संतमत की सबसे बड़ी
खासियत में से एक है उसकी सेकुलर लीगेसी, जिसे मुक्तिबोध निम्नजातीय धार्मिक
जनवाद30 कहते हैं। वह अपनी अभिव्यक्ति में भले ही अलौकिक सत्ता को
सम्बोधित है लेकिन उसकी कार्यकारी शक्ति तो मनुष्य समाज का सत्य ही है। मुक्तिबोध
लिखते हैं – कबीर, रैदास आदि संतों की
बानियों का संदेश, तत्कालीन मानों के अनुसार,बहुत अधिक क्रांतिकारी था। यह आकस्मिकता न थी कि चंडीदास कह उठता है –
“शुनह मानुष भाई,
शबार उपरे मानुष-सत्य
ताहार उपर नाई”
इस मनुष्य सत्य की घोषणा के क्रांतिकारी
अभिप्राय कबीर में प्रकट हुए।31 जबकि आधुनिक भारत के सुधारवादी आंदोलन
को देखा जाए तो उसमें जातिवाद, धार्मिक पाखंड, अंध विश्वास, कुरीति और सामंती व्यवस्था के खिलाफ वह आक्रामकता नहीं है जो भक्तिकालीन
संतमत में है। निर्गुण संतमत में राम और कृष्ण की पौराणिक चरित कथाओं के नकार के
स्पष्ट सामाजिक मायने थे। राजपूत काल, जिसमें वर्ण और धर्म
जैसी सामाजिक संस्थाएँ रूढ़ होती हैं उसमें यह देखा गया कि शासक वर्ग अपने को
पुराणों में दी गई वंशावली से सम्बद्ध कर लेता था। किसी भी पौराणिक चरित्र को आधार
बनाने का सीधा मतलब था कि उस व्यवस्था की मूल खामियों पर उदार हो जाना। सगुण भक्त
कवियों ने इसे सिद्ध किया। आगे चलकर इसीलिए हिंदी नवजागरण के बौद्धिकगण दुविधाग्रस्त
होते हैं। राम और कृष्ण को नायक बनाकर औपनिवेशिक वर्चस्व स्थापन को विस्थापित तो
नहीं ही किया जा सका, उल्टे हुआ यह कि भारतीय राष्ट्रवाद की
अवधारणा में ऐसा तत्व समाविष्ट हुआ जिसका खामियाजा आज का हिंदुस्तानी राष्ट्र भुगत
रहा है अर्थात भारतीय राष्ट्रवाद और हिंदू राष्ट्रवाद के बीच जो मोटी दीवार होनी
चाहिए थी उसकी जगह एक बारीक झिल्ली भर बची और वह भी बाबरी मस्जिद के विध्वंस के
साथ समाप्त हो गई।
इस मामले में 1857 की आजादी की
पहली लड़ाई भले ही पुरानी शक्तियों के द्वारा लड़ी गई लेकिन उसमें किसी भी पौराणिक
चरित्र के नायकत्व को स्थापित नहीं किया गया। क्या इसे महज एक संयोग माना जाए या
किसान समुदाय की कोई खास विशिष्टता मानी जाए, क्योंकि मध्यकाल में संतमत के प्रभाव
में जो सिख, जाट, मराठा, बुंदेला राज्य उभरे,मुक्तिबोध की मानें तो संत मत
ने इनके भीतर आत्मगौरव और विश्वासभरा और ये सभी राज्य किसान राज्य हैं। बाद में
भले उसमें सामंती तत्वों ने प्रवेश पाया। पुन: गांधी की अगुआई वाली आजादी की लड़ाई
के दौरान जब किसान सभाएँ अस्तित्व में आती हैं तो वहा भी इस तरह का सिम्बलाइज्ड
नायकत्व नहीं है और मिजाज़ भी सेकुलर है।
यह सही है कि हिंदी नवजागरण हिंदू
नवजागरण नहीं था। इस संबंध में वीरभारत तलवार के विश्लेषण तो ठीक हैं, निष्कर्ष गलत हैं।
लेकिन हिंदी नवजागरण 1980 के दशक के साम्प्रदायिक राजनीति के नए ढंग के उभार में
हथियार तो बनता है और वीरभारत तलवार इस खतरे के प्रति अपनी सचेतनता के तहत साम्प्रदायिकता
की जड़ तलाशते हैं और इसी प्रक्रिया में वे हिंदी नवजागरण तक पहुँचते हैं लेकिन यह
उसका निहित सत्य है कि उसमें साम्प्रदायिक राजनीति के लिए कुछ नहीं था, फिर ऐसा कैसे हुआ?
हिंदी नवजागरण को खुद उसके भीतर अगर देखा जाए तो यह तो मिलता ही है कि
हिंदी गद्य इस दौरान अस्तित्व में आई एक नई चीज़ थी और इसकी जो भी प्रारम्भिक
इतिहास-वंश-परम्परा आदि निर्धारित की जा रही थी वह सब कार्य पश्चिम के प्राच्यवादी
विद्वानों के द्वारा किया जा रहा था। उनमें से अधिकांश विद्वान औपनिवेशिक हितों के
प्रति पूरी तरह सचेत थे। समस्त हिंदी लेखन के सहारे अगर कोई धर्म, साम्प्रदायिकता
आदि की कोई व्याख्या जानना चाहे तो उसे कुछ भी हासिल नहीं होगा क्योंकि धर्म और
विभिन्न सम्प्रदायों के तत्व सम्बंधी विवेचन या इसकी कोई भी अभिव्यक्ति संस्कृत
भाषा में ही अधिक है। यह अनायास नहीं है कि 1773 ई. में जब हेस्टिंग्ज बंगाल में
कंपनी शासन को स्थायित्व देने की प्रक्रिया में बढ़ा तो उसने सबसे पहले संस्कृत पर
ध्यान दिया। यह सिर्फ भारत को जानने भर के लिए नहीं था। इसकी अगली कड़ी के रूप
में1801 ई. में हिंदी गद्य पर ध्यान दिया जाता है और फिर 1843 ई. में तांसी द्वारा
इसके इतिहास के निर्माण का जो कार्य शुरू होता है वह इसी ज्ञान राशि को समृद्ध
करता है और हिंदी नवजागरण में इसी ज्ञानराशि को अनजाने में सहज रूप से या फिर कहें
कि अंग्रेजों द्वारा की जा रही स्कूलिंग के मार्फत स्वीकार किया गया। बावजूद इसके
हिंदी नवजागरण के प्रारम्भिक अग्रदूतों ने अपने विवेक पर हिंदी जातीयता की तलाश को
संस्कृत तक नहीं पहुँचाया और बाद में जब हिंदी-उर्दू को लेकर खींचतान शुरू हुई तो
भी इन सभी का जोर सिर्फ नागरी लिपि पर रहा न कि इसकी जड़ को खींच कर संस्कृत तक
पहुँचाने का। लेकिन बाद के विद्वान इतने सचेत न हुए और संस्कृत पर जोर बढ़ाने लगे।
ऐसा उन विद्वानों ने अधिक किया जिनका जिनका संबंध कहीं-न-कहीं पौरोहित्य कर्म से
भी था। हजारी प्रसाद द्विवेदी ऐसे ही विद्वान थे। संस्कृत में ही भारतीय संस्कृति
को ढूँढ़ने का उनका प्रयास भी इसी कारण था। कबीर पर प्रसिद्ध पुस्तक लिखने वाले
हजारी प्रसाद द्विवेदी भाषा और संस्कृति के सवाल पर उतने सचेत साबित नहीं हुए
जितने कि अपने समय में कबीर थे। (संभावना यह भी है कि उनकी सचेतनता पर
वर्ग-संस्कार भारी पड़ गए हों। यदि ऐसा है तब तो सचेतनता के अस्तित्व पर ही सवाल
उठता है, क्योंकि वह तो वर्गीय-संस्कारों के प्रति
विवेकपूर्ण विचार और चिंतन से ही उत्पन्न होती है।) जब कबीर संस्कृत को कूप जल कह
रहे थे, ईश्वर को निर्गुण बताकर उसे वेदों-पुराणों से बाहर
ढूँढ़ने की बात कह रहे थे तो उसके बहुत स्पष्ट कारण थे,
क्योंकि ऐसा किए बगैर वर्णव्यवस्था के प्रति उनकी या संत मत की आक्रामकता की पूरी
धार ही भोथरी हो जाती। सगुण मत में,जाहिर है, ऐसा ही हुआ।
इस्लामी सूफी मत ने भी वैसा ही
किया जैसा निर्गुण संत मत ने। सूफी कवि भी इसी रास्ते जन भाषा तक आए। सूफी मत में
भी खुदा को इस्लामी धर्म कानूनों और रवायत से बाहर निकालना था क्योंकि वहाँ भी जो
खुदा धर्मग्रंथों में था वह बादशाहों या सल्तनतों की वंश परम्परा में होता था और
उस तक पहुँचने के लिए इस्लामी धर्मगुरु की मध्यस्थता अनिवार्य थी।
‘संतन को कहा सीकरी सो काम’ का संदेश भी स्पष्ट था, क्योंकि सीकरी ही तो वर्णव्यवस्था या अमीर-उमरा की व्यवस्था का संरक्षक
था, जहाँ खुदा या अवतार, भगवान उनका
रिश्तेदार हुआ करता था। आप सीकरी से काम लें और उसकी रवायत के खिलाफ भी जाएँ, ये दोनों तो हो नहीं सकता था। यह बात संतों-सूफियों को अच्छी तरह पता थी।
आगे रीतिकाल में तो यह सिद्ध ही हो गया कि ‘सीकरी’ से काम होने के चलते पूरे साहित्य की अंतर्वस्तु ही बदल गई। इसलिए पूरे
भक्तिकालीन सूफी मत और संतमत की कोई भी धार्मिक या साम्प्रदायिक व्याख्या नहीं हो
सकती, हिंदी की रक्त-मज्जा में ही यह नहीं है। वागीश शुक्ल32
सरीखे साहित्य के विद्वान अगर ऐसी कवायद करते हैं तो उसके स्पष्ट राजनीतिक
निहितार्थ होते हैं। भारतीय राज्यसत्ता भी धर्मनिरपेक्षता को जिस रूप में लेती है
वह भी शासक वर्ग के हित में गढ़ा गया है। धर्मनिरपेक्षता की इस भारतीय अवधारणा को
अगर देखा जाए तो यह दो सिद्धांतों पर आधारित है जिनकी वकालत भारतीय राज्य द्वारा
की जाती है। एक है सभी धर्मों की समान मान्यता और दूसरा है किसी भी धर्म के
अनुयायियों के साथ भेदभाव न करना। राज्य तथा शासन नियंत्रित संचार माध्यमों के
अधिकारीगण, इन दोनों ही आदर्शों को उभारने की कोशिश तो कराते
हैं लेकिन ऐसा करते हुए वे चुनावी राजनीतिक हितों का ध्यान रखना भी नहीं भूलते
हैं।
इस प्रकार उपर्युक्त विवेचन के
पश्चात, संक्षेप में देखें तो भक्तिकालीन निर्गुण संतमत ने हिंदी और उसकी
संस्कृति को चार बेहद महत्वपूर्ण हथियार दिए। ये हैं :
1. जनोन्मुख भाषा का प्रयोग।
2. जाति, धर्म,
सम्प्रदाय की संकीर्णताओं का विरोध
3. सत्ताधारी शासकवर्ग और उसकी सामंतवादी संस्कृति का
विरोध
4. अपना शासक बदलने की स्वतंत्रता का प्रयोग।
इनमें से चौथा हथियार अब सगुण होकर
लोकतंत्र कहलाने लगा है। लेकिन आज के दौर में इसका स्वरूप रोमन इतिहास के ‘बनाना रिपब्लिक’ जैसा हो गया है, इस कारण इसे ‘लंगड़ा लोकतंत्र’ कहना अप्रासंगिक न होगा, जहाँ आप के पास विकल्प बदलने की स्वतंत्रता नहीं है और तमाम छटपटाहट के
बावजूद एक बार चुने शासक को आप पाँच साल से पहले नहीं बदल सकते। जबकि संतों ने
अपना ईश्वर बदल कर (प्रतीक में ही सही) यह दिखाया कि संस्कृति बदलने के लिए शासक
बदलना कितना ज़रूरी है। इस विमर्श का समापन हम मुक्तिबोध के इस कथन से करेंगे जो इस
कठिन समय में उम्मीद की एक किरण दिखाता है :
आज संस्कृति का नेतृत्व उच्च
वर्गों के हाथ में है – जिनमें उच्च-मध्यवर्ग भी शामिल है। किंतु यह आवश्यक नहीं है कि यह
परिस्थिति स्थायी रहे, अनिवार्यत:। यह बदल सकती है। और
जब बदलेगी, तब इतनी तेज़ी से बदलेगी कि होश
फाख्ता हो जाएँगे। संस्कृति का नेतृत्व करना जिस वर्ग के हाथ में होता है, वह समाज और संस्कृति के क्षेत्र में अपनी भावधारा और
जीवनदृष्टि का इतना अधिक प्रचार करता है कि उसकी एक परम्परा बन जाती है। यह
परम्परा भी इतनी पुष्ट, इतनी भावोन्मेषपूर्ण और
विश्व-दृष्टि-समन्वित होती है कि समाज का प्रत्येक वर्ग आच्छन्न हो जाता है। यहाँ
तक कि जब अनेक सामाजिक –राजनैतिक कारणों से निम्न-जन-श्रेणियाँ उद्बुद्ध होकर, सचेत और सक्रिय होकर,
अपने-आपको प्रस्थापित करने लगती हैं, तब वे उन
पुराने चले आ रहे भाव-प्रभावों, विचारधाराओं और जीवन-दृष्टियों को
इस प्रकार सम्पादित और संशोधित कर लेती हैं कि जिससे वे अपने अज्ञान की परिधि में
ज्ञान की ज्वाला प्रदीप्त कर सकें। दूसरे शब्दों में, समाज को बदलने वाली विचारधारा के अभाव में, वे निम्न-जन-श्रेणियाँ, अपनी सामाजिक-राजनैतिक विकासावस्था के अनुरूप, पुरानी विचारधाराओं तथा भावधाराओं का ही
संपादन-संशोधन कर लेती हैं, और इस प्रकार अपने प्रभाव का
आंशिक विस्तार कर लेती हैं। किंतु अंतत:, संस्कृति
का नेतृत्व करने वाले पुराने विधाताओं से हारना ही पड़ता है। मेरा मतलब कबीर-जैसे
निर्गुणवादी संतों की श्रेणी से और उस श्रेणी में आने वाले लोगों से है। समाज के
भीतर निम्न-जन-श्रेणियों का वह विद्रोह था, जिसने
धार्मिक-सामाजिक धरातल पर स्वयं को प्रस्थापित किया। आगे चलकर, निर्गुणवाद के अनंतर, सगुण
भक्ति और पौराणिक धर्म की विजय हुई, तब संस्कृतिके क्षेत्र में निम्न
जातियों को, निम्न-जन-श्रेणियों को पीछे हटना पड़ा। यह आवश्यक
नहीं कि आगे चलकर ये निम्न-जन-श्रेणियाँ चुपचाप बैठी रहें। शायद वह जमाना जल्दी ही
आ रहा है जब वे स्वयं संस्कृति का नेतृत्व करेंगी, और
वर्तमान नेतृत्व अध:पतित होकर धराशायी हो जाएगा।33
संदर्भ
1. संस्कृति, चेतना,
विचारधारा – एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य : के.एन.पणिक्कर, पृ. 22
2. धर्म, समाज और संस्कृति : कृष्ण मोहन श्रीमाली, पृ. 143-144
3. वही, पृ. 144
4. वही, पृ. 145
5. वही, पृ. 145
6. भ्रमरगीतसार
की भूमिका : रामचंद्र शुक्ल, पृ. 10
7. हिंदी
साहित्य का इतिहास : रामचंद्र शुक्ल
8. कामायनी– एक पुनर्विचार :
मुक्तिबोध
9. हिंदी
साहित्य की भूमिका : हजारी प्रसाद द्विवेदी, पृ. 15
10. वही, पृ. 16
11. धर्म, समाज और संस्कृति :कृष्ण मोहन श्रीमाली
12. भाषा, साहित्य और देश : हजारी प्रसाद द्विवेदी (उपर्युक्त
में उद्धृत पृ. 173-174)
13. वही, पृ. 174
14. वही, पृ. 175
15. वही, पृ. 75
16. नयी कविता
का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध : मुक्तिबोध, पृ. 92
17. वही, पृ. 90
18. वही, पृ. 90
19. वही
20. वही, पृ. 93
21. संस्कृति, चेतना,
विचारधारा – एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य : के.एन.पणिक्कर, पृ. 1
22. वही
23. वही, पृ. 2
24. कामायनी – एक पुनर्विचार:
मुक्तिबोध, पृ. 125
25. वही
26. धर्म, समाज और संस्कृति: कृष्ण मोहन श्रीमाली, पृ. 171
27. समकालीन
लोकयुद्ध, 15 नवम्बर1993
28. वही
29. वही
30. नयी कविता
का आत्मसंघर्ष तथा अन्य निबंध : मुक्तिबोध, पृ. 92
31. वही,
पृ. 88-89
32.कथा, अंक-13
33. कामायनी : एक पुनर्विचार, मुक्तिबोध,
पृष्ठ 160-161