मैं बी.ए. द्वितीय वर्ष की परीक्षा दे चुका था। तृतीय वर्ष के लिए अंग्रेज़ी और हिन्दी विषयों का चुनाव भी मन में कर चुका था। जून का महीना भी बीत चुका था। मेरी उम्र भी 18 वर्ष हो चुकी थी। जन्म से ही एक बिल्कुल साधनविहीन परिवार का अब तक का अनुभव दिमाग को धनोपार्जन की युक्तियों की तरफ मोड़ देता था। अपनी ज़रूरत का कुछ हिस्सा ट्यूशन से प्राप्त पैसों से पूरा हो सकता था लेकिन परिवार के प्रति लगाव और जिम्मेदारी का भाव नैतिकता की मांग बनकर वैसा करने से रोक देता था। कुल चार जीवित भाई बहनों में मैं अंतिम था लेकिन तब तक किसी की शादी नहीं हुई थी। पिता जी वही पितृसत्तात्मक समाज के प्रतिनिधि थे - बेटियों को घर से बाहर निकलने देने के विरोधी। उन दिनों वे दुष्ट होने की हद तक जड़ व्यक्ति थे। तुलसीदास का रामचरितमानस ही उन दिनों उनका पथ प्रदर्शक ग्रंथ था। दोनों बहनों ने 1992 में इंटरमीडिएट पास किया था लेकिन पिता जी ने अगले सात आठ वर्षों तक उन्हें न तो कुछ पढ़ने लिखने दिया और न ही घर से बाहर निकलने दिया। वे जब भी घर से निकलीं तो या तो शौच जाने के लिए या फिर फाइनली अपनी अपनी ससुराल जाने के लिए। सन् 1992 के अंत में बाबरी मस्जिद भी तोड़ी गई थी। यह कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों के उत्कर्ष का समय था। पिता जी RSS और विश्व हिन्दू परिषद के नेताओं के सम्पर्क में रहते थे। हमारे गांव में भी राम लिखी ईंट अाई थी जिस पर लोगों द्वारा यथाशक्ति पैसे और अनाज चढ़ाए गए थे। धर्म की तो जय हो रही थी मगर हमारी हालत बेहद दयनीय होती जा रही थी। बी ए का छात्र होने और बालिग होने के बाद मैंने पिताजी को कभी कभी आड़े हाथों लेना शुरू किया जो अभी तक जारी है। उस समय की जीवन की विषम स्थितियों से निकलने का एक ही रास्ता नजर आता था कि मैं कुछ नियमित आय का रोज़गार पकड़ूं। अध्यापन में रुचि थी। एक दिन पिता जी को चुनौती दे दी कि तुम्हारे इन हिन्दू नेताओं का एक स्कूल भी तो चलता है, उसमें मुझे पढ़ाने का मौका क्यों नहीं मिल सकता? पहली बार पिताजी मेरी चुनौती पर गंभीर हुए क्योंकि मैं एक तो मेहनती और अनुशासनप्रिय था, दूसरे लड़का था। उन दिनों उच्च शिक्षा की कक्षाओं के सत्र विलम्ब से चलते थे। जून, जुलाई, अगस्त महीनों तक परीक्षाएं होना आम बात थी। सितंबर से पहले बी ए की कक्षाएं कदापि शुरू नहीं होती थीं। लेकिन प्राइमरी स्तर के नर्सरी स्कूल पक्का जुलाई में शुरू हो जाते थे। मेरी योजना जुलाई से सितंबर - अक्टूबर तक इन्हीं महीनों का इस्तेमाल स्कूल में अध्यापन का अनुभव प्राप्त करने और कुछ अधिक पैसे कमाने के लिए करने की थी।
Monday, December 14, 2020
एक विस्मरणीय संस्मरण : आलोक कुमार श्रीवास्तव
मैं बी.ए. द्वितीय वर्ष की परीक्षा दे चुका था। तृतीय वर्ष के लिए अंग्रेज़ी और हिन्दी विषयों का चुनाव भी मन में कर चुका था। जून का महीना भी बीत चुका था। मेरी उम्र भी 18 वर्ष हो चुकी थी। जन्म से ही एक बिल्कुल साधनविहीन परिवार का अब तक का अनुभव दिमाग को धनोपार्जन की युक्तियों की तरफ मोड़ देता था। अपनी ज़रूरत का कुछ हिस्सा ट्यूशन से प्राप्त पैसों से पूरा हो सकता था लेकिन परिवार के प्रति लगाव और जिम्मेदारी का भाव नैतिकता की मांग बनकर वैसा करने से रोक देता था। कुल चार जीवित भाई बहनों में मैं अंतिम था लेकिन तब तक किसी की शादी नहीं हुई थी। पिता जी वही पितृसत्तात्मक समाज के प्रतिनिधि थे - बेटियों को घर से बाहर निकलने देने के विरोधी। उन दिनों वे दुष्ट होने की हद तक जड़ व्यक्ति थे। तुलसीदास का रामचरितमानस ही उन दिनों उनका पथ प्रदर्शक ग्रंथ था। दोनों बहनों ने 1992 में इंटरमीडिएट पास किया था लेकिन पिता जी ने अगले सात आठ वर्षों तक उन्हें न तो कुछ पढ़ने लिखने दिया और न ही घर से बाहर निकलने दिया। वे जब भी घर से निकलीं तो या तो शौच जाने के लिए या फिर फाइनली अपनी अपनी ससुराल जाने के लिए। सन् 1992 के अंत में बाबरी मस्जिद भी तोड़ी गई थी। यह कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों के उत्कर्ष का समय था। पिता जी RSS और विश्व हिन्दू परिषद के नेताओं के सम्पर्क में रहते थे। हमारे गांव में भी राम लिखी ईंट अाई थी जिस पर लोगों द्वारा यथाशक्ति पैसे और अनाज चढ़ाए गए थे। धर्म की तो जय हो रही थी मगर हमारी हालत बेहद दयनीय होती जा रही थी। बी ए का छात्र होने और बालिग होने के बाद मैंने पिताजी को कभी कभी आड़े हाथों लेना शुरू किया जो अभी तक जारी है। उस समय की जीवन की विषम स्थितियों से निकलने का एक ही रास्ता नजर आता था कि मैं कुछ नियमित आय का रोज़गार पकड़ूं। अध्यापन में रुचि थी। एक दिन पिता जी को चुनौती दे दी कि तुम्हारे इन हिन्दू नेताओं का एक स्कूल भी तो चलता है, उसमें मुझे पढ़ाने का मौका क्यों नहीं मिल सकता? पहली बार पिताजी मेरी चुनौती पर गंभीर हुए क्योंकि मैं एक तो मेहनती और अनुशासनप्रिय था, दूसरे लड़का था। उन दिनों उच्च शिक्षा की कक्षाओं के सत्र विलम्ब से चलते थे। जून, जुलाई, अगस्त महीनों तक परीक्षाएं होना आम बात थी। सितंबर से पहले बी ए की कक्षाएं कदापि शुरू नहीं होती थीं। लेकिन प्राइमरी स्तर के नर्सरी स्कूल पक्का जुलाई में शुरू हो जाते थे। मेरी योजना जुलाई से सितंबर - अक्टूबर तक इन्हीं महीनों का इस्तेमाल स्कूल में अध्यापन का अनुभव प्राप्त करने और कुछ अधिक पैसे कमाने के लिए करने की थी।