Thursday, May 23, 2013

एक रात का मेहमान


1984 के दंगों पर कथाकार नीलकांत ने दिसम्बर, 1986 में यह कहानी लिखी थी। साहित्य-जगत में इसकी जैसी चर्चा होनी चाहिए थी, वैसी हुई नहीं। जन संस्कृति मंच के साथी दुर्गा प्रसाद सिंह ने, पिछले दिनों, जब ’84 दंगों से जुड़ा सज्जन कुमार से संबंधित अदालत का एक फैसला आया, तब इस ज़बर्दस्त कहानी की तरफ हमारा ध्यान आकर्षित किया। यह चर्चा उन्होंने फेसबुक पर की थी, वहीं कई मित्रों ने इसे पढ़ने की इच्छा जाहिर की। तो लीजिए....पढ़िए, दुर्गा सर द्वारा उपलब्ध कराई गई ’84 दंगों पर केंद्रित नीलकांत जी की यह ज़बर्दस्त कहानी ....    

एक रात का मेहमान
नीलकांत

मुझे क्या पता था कि राजधानी में पहुँचते ही मेरी सारी स्वतंत्रताएँ छीन ली जाएँगी? उस आकस्मिक उथल-पुथल से सांसत में फँसकर, मेरी तरह हजारों लोग राजधानी की नारकीय व्यवस्था के नाश की भविष्यवाणी करने लगे थे।
नयी दिल्ली स्टेशन से सीधे, मुझे किशन कुमार के घर पहुँचना था। इससे पहले एक-दो बार मैं यहाँ आया-गया था और हर बार मुझे यहाँ के गोल चक्करों और चौराहों से फूटती छ:-सात से अधिक सड़कों की भूल-भुलैया भटकाती हुई, कहीं का कहीं पहुँचाती रही है। इस परेशानी से मुक्ति पाने के लिए, मैं एक तिनपहिए-चालक को किशन के घर का पता, और एवेन्यू नम्बर बताकर आराम से उस पर बैठ गया। चालक ने बताया कि वह अक्सर उस कालोनी में जाता रहता है। उसके इस आश्वासन और संसदीय भाषा से मैं और भी अधिक निश्चिंत हो गया। राष्ट्रपति भवन, संसद भवन, गगनचुम्बी होटलों की इमारतें, स्वर्गीय राजनेताओं की आदमकद पाषाण-प्रतिमाएं; अशोक रोड, जनपथ और संसद मार्ग.... तेज गति से चक्कर काटती बसें, डबल-डेकर, टैक्सियाँ और स्कूटर.... अपने तिपहिए वाहन में बैठे-बैठे, जो बेतहाशा भाग रहा था, रास्ते के कुछ विरल दृश्यों की कतरनें तेजी से चेतना के पटल पर बेतरतीब बिखरती जा रही थीं।
मैंने घड़ी देखी। एक तो प्रयागराज लेट पहुँची थी। कुछ देर स्टेशन पर हुई और अब दस बजने जा रहे थे। तिपहिये चालक ने कहा, बाबूजी अब हम आ गये। उसने कालोनी का नाम लिया, जिसका नाम एक स्वर्गीय राजनेता के नाम पर था, और जिसका उल्लेख मैं यहाँ नहीं करना चाहता।
चालक ने मीटर पढ़कर, किराया जोड़कर, पंद्रह रुपये बताए तो मैं अचकचा गया। जल्दी करो साब’, उसने कहा, जल्दी करो, कुछ गड़बड़ मामला है। मैंने गड़बड़की पूछताछ से पहले ही उसे पंद्रह रुपए दे दिए और फ्लैट नम्बर का स्मरण करते हुए चौतल्ले मकानों को देखने लगा। चार तल्लों के फ्लैटों की यह एक बड़ी-सी कालोनी थी। इसमें किशन तीसरे तल्ले पर रहता था। हर दो चौतल्ले फ्लैट को विभाजित करने वाले जीने की सीढ़ियाँ, हर एक फ्लैट के मुख्य द्वार के पास चौड़ी बना दी गयी थीं और इसी से लगी एक चौफुटी चौड़ी फर्श की पट्टी उससे जोड़ दी गयी, जिससे दस-पाँच लोग एक किनारे हटकर वहाँ खड़े हो सकें और ऊपर जाने वालों को या ऊपर से नीचे आने वालों को किसी किस्म की रुकावट न महसूस हो।
तीसरी मंजिल पर पहुँचकर, कई अंकों वाले मकान नम्बर को पढ़कर, मैंने किशन कुमार के फ्लैट के मुख्य द्वार पर लगी काल-बेल पर उँगली रखते ही उसे फिर अपनी मुट्ठियों में बंद कर लिया; क्योंकि मेरे पीछे के फ्लैट का दरवाजा उसी समय चीत्कार के साथ खुल गया और तीन-चार लोगों का एक सिख परिवार हड़बड़ी में निकलकर बाहर आ गया और जल्दी-जल्दी एक बड़ा-सा ताला लटकाकर, सीढ़ियों से उतरकर, अदृश्य हो गया। नीचे एक टैक्सी खड़ी थी जो तत्काल स्टार्ट होकर चल दी।
कोई बड़े सवेरे आ गया’, मेरे सामने वाले दरवाजे के पीछे से आवाज आयी, जिसका स्वर स्पष्टत: स्त्रियोचित मधुरता लिए हुए था। लेकिन वह सीधी सरल बात चुभने वाली थी। इस छोटे दरम्यान में वह सरल-सा वाक्य आड़े-तिरछे होकर हृदय में चुभने-सा लगा।
दरवाजा एकाएक साँस लेता हुआ खुल गया। सामने, संभवत: किशन की बीवी खड़ी थी। हाथ उसका अब तक हैंडल पर ही था। तुरंत नहाए हुए पानी की नम चमक उसकी बाँहों और चेहरे पर साफ ही दिखायी दे रही थी। मैक्सी की नीली धारियों को उसके कंधे और पीठ पर, उसके खुले बालों ने ढँक रखा था।
“नमस्ते”, मैंने कहा।
“नमस्ते”, उसने दोनों हाथ जोड़कर कहा, “आप?
“जी मैं इलाहाबाद से आया हूँ। मेरा नाम रंजन कुमार है।” मैंने कहा, “मैंने अपने आने की सूचना किशन को इसी तारीख में दे रखी थी”, एक क्षण रुककर मैंने पूछा,“क्या हैं नहीं ?
“ओह ! इससे क्या, मैं तो हूँ। आप अंदर आ जाइए।” उसने अपने मुँह पर बिखर आए बालों को कानों के दोनों ओर सहेजते हुए कहा।
मैंने अपनी अटैची उठा ली और उसकी पीठ पर कच्चे कोयले की डली जैसे घूँघरवाले लहराते बालों को चोरी-छिपे देखते हुए, कुछ कदमों के बाद ही, डाइनिंग टेबिल के पास पहुँच गया।
“आप यहीं बैठ लें, नाश्ता करें, तब तक किशन भी आ जाता है।” इतना कहकर वह किचन की तरफ चल दी। लेकिन जिस धड़ल्ले के साथ उसने किशन कहा था,वह भी मुझे झकझोर गया। संभवत: किशन ने किसी पंजाबिन से शादी कर ली हो ! यह सोचते हुए मैं कुर्सी पर बैठ गया। औरत को इस तरह प्रांतों में बाँटने वाले अपने दिमाग की तुच्छता को, अपने से भिन्न होते हुए सहसा मैंने देख लिया और तत्काल मुझे इस पर शर्म-सी महसूस हुई।
किचन से, दूसरे क्षण श्रीमती किशन बाहर निकल आयीं, डाइनिंग रूम के बायीं ओर एक गलियारा था, जिसकी तरफ उसने तर्जनी दिखाते हुए कहा, “वही बाथरूम है।”
“जी, धन्यवाद !” शिष्टाचारवश मैंने कृतज्ञता जाहिर की, जिसका अभ्यास मुझे कतई नहीं था। वह फिर किचन के भीतर चली गयी थी और क्राकरी के बर्तनों के खनकने की आवाजें आने लगी थीं। इन ध्वनियों पर मेरे कान लगे हुए थे, कि फिर किसी ने घंटी बजा दी। लेकिन उसने एकाएक बटन से हाथ नहीं हटाया होगा,जिससे उसकी दीर्घ ध्वनि, जिबह किये जा रहे मेमनों के विलाप की तरह कमरों के अंतरभाग में देर तक गूँजती रह गयी।
“यही हाल है, जब से यह फ्लैट खरीदा गया है”, श्रीमती किशन ने दरवाजे की ओर बढ़ते हुए कहा, जब से मेरी शादी हुई है ! इतने शब्दों के वाक्य गुनगुनाती हुई,वह दरवाजे तक पहुँच गयी और हैंडल घुमाकर, दरवाजा खोल दिया। इस बार किशन स्वयं था। मुझे अंदर देखकर, मानो वह घबरा गया हो और मैंने भी उसके अभिवादन की तत्परता में अपनी एकत्र की गयी प्रसन्नता को मुस्कराहट में बदलने से रोक लिया।
किचन की ओर जाती हुई अमृता से उसने कहा, “अमृत, कुछ नाश्ता जल्दी ले आओ”, यह कहते हुए, किशन मेरी बगल में ही कुर्सी पर बैठ गया। उसका चेहरा चिंता से उखड़ा-उखड़ा लग रहा था। इस क्षण भर की चुप्पी से मेरे मन में अनेक विचार दौड़ गये, पहले तो अमृता का वह प्रथम वाक्य, बड़े सबेरे कोई आ गया और फिर किशन जैसे अभिन्न और मसखरे दोस्त का अजनबी-सा बनता जा रहा चेहरा। इस कारण मुझे अतिथियों से पीड़ित महानगरों के नागरिकों के बारे में सुनी हुई बातें प्रत्यक्षत: सत्य प्रतीत होने लगीं। उसने अपने खत में मुझे सपरिवार आने के लिए लिखा था, भला मैं उसके कहे पर नहीं आया? संभवत: वह अपने नये जीवन में गाहे-बगाहे मेहमानों के अनचाहे प्रवेश से ऊब चुका हो, और मुझे भी उन्हीं अपराधियों में अब शामिल देख रहा हो ! इसलिए, मैंने सोचा कि यदि मैं तत्काल अपने वापस जाने की घोषणा कर दूँ तो उसे कुछ राहत मिल सकती है।
“यू.जी.सी. के कार्यालय से लौटकर, आज ही शाम को, और यदि काम नहीं हुआ तो कल शाम को किसी गाड़ी से इलाहाबाद के लिए रवाना हो जाऊँगा।” मैं अपना लंबा वाक्य, जो उस माहौल में काठ से स्वर निकालने की तरह बेमतलब था, खत्म करते हुए, किचन की ओर देखने लगा।
एक झालरदार पर्दे के पीछे से कत्थई ट्रे में नाश्ता लिये हुए अमृता दिखाई पड़ी।
“मुझे क्या मालूम था कि तुमने जिस तारीख पर आने की सूचना दी थी, वह कयामत का दिन होगा।” किशन ने अनमनी-सी स्थिति में इधर-उधर देखा।
टेबिल पर ट्रे रखती हुई, अमृता भी एक कुर्सी पर बैठ गयी। यह मेरी नवविवाहिता अमृता देवी हैं। यह बात भी उसने जरा भारी मन से ही कही। मैंने दुबारा नमस्ते किया। कोई बात थी जो गतिरोध बनी हुई थी।
मूँगफली मिली दालमोठ और बिस्कुट की तश्तरी मेरी तरफ खिसकाती हुई, अमृता ने प्यालों में चाय उड़ेलनी शुरू कर दी थी। शीशे के गिलासों के बगल में पानी से भरा जग रखा हुआ था। अमृता को भी किशन की आकृति कुछ असाधारण-सी प्रतीत हो रही थी, क्योंकि वह भी भौंहें संकुचित करके किशन के चेहरे पर कभी-कभार देख लिया करती थी। उनकी ये सारी हरकतें मुझे अत्यंत गोपनीय दृष्टि कूटकों जैसी लग रही थीं, हर समय मुझे यही लगता रहा कि, कहीं-न-कहीं मेरे आ जाने से इस नये जोड़े के स्वाभाविक जीवन में भँवर पड़ गयी है।
“समाचार है कि पी.एम. की हत्या कर दी गयी,” किशन ने चाय की प्लेट अपनी तरफ सरकाते हुए कहा, “सच बात है, तो नतीजे बहुत बुरे होंगे।”
मैं तो सनाका खा गया। तिपहिये चालक का यह वाक्य, “साब, जल्दी करो, कुछ गड़बड़ है।” और सीढ़ियों पर घबराये सिख-परिवार का नीचे की तरफ भागना और किशन की यह सूचना कि पी.एम. की हत्या कर दी गयी, एक सार्थक सूत्र में जुड़ गये।
“कैसे मालूम ?” मैंने पूछा।
“ओह ! किसने कहा ?” अमृता ने भी पूछा।
“बात अभी दबाकर रखी गयी है।” किशन ने कहा, “राष्ट्रपति देश के बाहर गये हुए हैं। पी.एम. के पुत्र प. बंगाल से अभी-अभी दिल्ली उतरे हैं”, चाय की चुस्की लेकर,किशन ने कहा, “आकाशवाणी की दूसरी बुलेटिन में शायद इस बार समाचार प्रसारित हो।”
अमृता ने एक आयातित ट्रांजिस्टर लाकर टेबिल पर दिया। फिर हम लोग इस घटना के भावी परिणामों पर सोच-विचार करने लगे। किशन ने कुछ क्षण बाद,उठकर अपने फ्लैट का दरवाजा खोला, देखा सामने वाले पड़ोसी के दरवाजे पर बड़ा-सा ताला लटक रहा था। वह लौटकर फिर अपनी जगह पर बैठ गया। कमरा भीतर से बोल्ट था, फिर भी एक उत्तेजित भनभनाहट बुलंद होती जा रही थी और विभिन्न दिशाओं में चक्कर काटती हुई प्रतीत होती थी। मैं, जो नयी दिल्ली की इस असामान्य तो क्या सामान्य गतिविधियों से भी परिचित नहीं था, अमूर्तता की गिरफ्त में फँसता जा रहा था। बहुत सारी गड्डमड्ड परछाइयों और अपरिचित आवाजों से मेरा मानस-पटल बोझिल हो चुका था, जिसमें किशन, अमृता और पी.एम. के कुछ चित्र, जिन्हें अखबारों में देखता आया था, उलझी रेखाओं की ढेरी में छिपते-तिरते दिखायी देते रहे। अमृता का चेहरा भी इस समाचार के सुनने के तत्काल बाद ही अपने मौलिक रूप-रंग से भिन्नतर होने लगा था। किशन ने अपनी दृष्टि अमृता के चेहरे पर टिका दी, संभवत: उसने उसकी बेचैनी के सबब को गहराई से समझ लिया था।
बातचीत के सिलसिले में यह पता चल गया था कि अमृता के घर के लोग त्रिलोकपुरी में रहते थे। वह सचिवालय में काम करने वाले किसी अफसर की पुत्री थी। मुझे इससे अधिक जानकारी हासिल करने की इच्छा थी, किंतु परिस्थिति ने इससे अधिक के लिए अनुमति नहीं दी। किशन के चुप हो जाने पर हम सभी चुप हो जाते। वह जो कहता, उसे सुनते या जो करता उसे देखते ! कुछ क्षण बाद, चुप्पी तोड़े बगैर, जब अचानक उठकर वह खड़ा हो गया तो, मैंने देखा, वह दीवार पर लगे एक फ्रेम में मढ़े फोटो को उतारने लगा था। यह एक ग्रुप फोटो था, जिसमें माँ-बाप, अमृता और किशन कुर्सियों पर बैठे हुए थे। फोटो से साफ जाहिर था कि पगड़ीधारी बाप सिख थे। उसने फोटो उतारकर सोने वाले कमरे में ले जाकर कहीं रख दिया होगा।
डाइनिंग टेबिल के चारों ओर हमारी गतिविधियाँ बहुत मामूली सक्रियता से जुड़ पा रही थीं। एक अमूर्त, अनिश्चित आशंका और विनाश की छाया, मोटी पर्त की तरह जमती जा रही थी, जिसके टूट गिरने से मानो कोई भयानक शोर गूँज उठने वाला हो, जिसे सुनने के लिए हमारे कान कभी अभ्यस्त नहीं थे।
“सामने वाले फ्लैट का दरवाजा बंद है”, किशन ने कहा, “अभी सुबह तो हरजीत सिंह केसरी थे।”
“लगता है वे लोग कहीं चले गए”, अमृता ने कहा।
“हाँ, जब मैं सीढ़ियों से ऊपर आ गया था, उसी समय लोग ताला बंद करके, तेजी से नीचे जा रहे थे। नीचे एक टैक्सी भी खड़ी थी।” मैंने अपना अंदाज बताया।
“और उनके मेहमान ? जो कल शाम अंबाला से आये हुए थे”, अमृता ने यह सवाल किशन से ही पूछा था।
“मैंने उन्हें एक-दो बार देखा जरूर है।” किशन ने कहा, “किंतु इस समय मुझे ठीक-ठीक याद नहीं आ रहा है।”
“अमरजीत सिंह उनका नाम है”, अमृता ने कहा। 
“हाँ, ठीक यही नाम है”, किशन ने कहा, “कल मैंने सीढ़ियों से उन्हें उतरते देखा था। वही तो हरजीत सिंह केसरी के समधी हैं। दस सालों से हम पड़ोसी हैं, लेकिन दस-पाँच बार ही हमारी मुलाकातें हुई हैं। वह भी दो-चार मिनिट की।”
इन सारी बातों का ओर-छोर मेरे लिए उस हालत में अगम्य था। समय की रफ्तार का भी मुझे अंदाज नहीं हो पा रहा था। साधारणत: बेचैनी और घबराहट मुझे अज्ञान की हदों में खींच लाए थे, इसी मन:स्थिति में ऊभ-चूभ डूबता हुआ मैं स्थिति का एक सामान्य और स्पष्ट चित्र देख लेने की बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहा था।
तभी किशन निहुरे-निहुरे बालकनी की ओर दौड़ पड़ा। किंतु अमृता ने उसे हाथ पकड़कर रोक लिया। कालोनी के पास वाली सड़क पर भगदड़ मच गयी थी, एक उन्मादी भीड़ की चीख-पुकार के बीच यह नारा सुनायी पड़ा, “खून का बदला खून से लेंगे !” फिर वह आवाज बुलंदी पर चढ़ती गयी।
कत्लेआम शुरू हो गया। एक-दो बार बंदूकें दगने की आवाज सुनायी पड़ी।
“गोलियाँ चल रही हैं”, अमृता ने किशन को लपेटते हुए, कमरे के भीतर ले आकर कहा, “सुना नहीं ?
“वही तो देखना चाहता था”, किशन ने व्यग्रता से कमरे में चारों ओर देखा, फिर अपना अनुमान सुनाते हुए बोला, “लगता है कुछ लोग मौके का फायदा उठाने के लिए बाहर सड़कों पर निकल आये हैं।”
“नारा नहीं सुना”, अमृता ने किशन से कहा, “मगर, खूनी तो सब नहीं हैं। खूनी तो पी.एम. के नौकर थे।”
“पी.एम. के दो सिख अंगरक्षकों ने गोलियाँ चलाकर उनकी हत्या कर दी....।” ट्रांजिस्टर आन था। समाचार बुलेटिन प्रसारित होने लगे। यह एक स्पष्ट सूचना थी और स्थिति पर पड़े धुँधलके को साफ करने वाली थी। सिख-अंगरक्षकों पर उद्घोषक के बार-बार जोर देने से हम सबका ध्यान उन दोनों शब्दों पर टिक गया।
आकाशवाणी को वही विभाजित करने वाली भाषा बोलते सुनकर मैं दंग रह गया। किशन भी व्यंग्य से मुस्करा पड़ा। “आपरेशन ब्लू स्टार की यह दूसरी अवस्था है।” यह कहते हुए उसने टेलीविजन आन कर दिया। पर्दे पर एक लाश का बड़ा चित्र स्थिर हो गया। एक कतार में कुछ लोगों के चित्र लाश की परिक्रमा करते दिखाई दे रहे थे – और वही नारा गूँज रहा था – “खून का बदला खून से लेंगे !”
किशन और मैंने एक साथ देखा – अमृता का चेहरा एक धुँधले मंडल में डूबता जा रहा था, जिसमें उसके कानों के दोनों कुंडल ही जब तब चमक उठते थे। अंदर कमरे में मर्करी के बल्ब जल उठे थे, और कालोनी का ऊपरी मंजिल का हिस्सा जहाँ तक बैठे-बैठे मैं देख सकता था, उन सभी फ्लैटों की खिड़कियों के शीशे चमकने लगे थे। तो भी अंधकार का एक घटाटोप फैलता जा रहा था – फैलता ही जा रहा था। जब तब इसमें चमककर बुझते रोशनी के छल्ले दिख जाते और फिर धाँय से धमाका सुनायी पड़ता। किंतु ऐसे अवसर एक-दो बार ही दुहराए गये।
अमृता सहसा किशन के कंधे पर सिर रखकर सिसक पड़ी। अपने और किशन के सम्बंधों के प्रति सम्भवत: वह अब पूर्णत: सचेत हो चुकी थी, फिर भी ऐसा निष्कर्ष मैं निश्चय के साथ प्रस्तुत करने का अधिकारी नहीं था। किशन ने पंजाबी बोली में ही धीमे से उसके कान में कुछ बुदबुदाकर कहा, जिसका अर्थ मेरे लिए पर्दे में ही था। लेकिन मेरी हीर का सुपरिचित अर्थ मैं अच्छी तरह ग्रहण कर सका था।
“तुम सारे दिन से चलती-फिरती रही हो, अमृता कुछ देर जाकर आराम कर लो”, किशन ने उससे कहा। मगर वह अपने स्थान से नहीं उठी, और वहीं डाइनिंग टेबिल के टाप के किनारे अपने सिर को रखकर, सिसकती रही। किशन ने एक लम्बी साँस ली और उठ खड़ा हुआ। उसके दोनों पंजे टाप पर चंगुल की तरह फैले हुए थे, सिर से पैर तक, जहाँ-जहाँ उसके अंग, वस्त्रों से बाहर खुले हुए थे, माथे पर, हाथ के पंजों और पैरों के ऊपरी पटल पर, इस्पात के तारों की तरह नीली-नीली नसें बेतरह सख्त होकर खिंच आयी थीं। वह देखते ही देखते एक वहशी, एक अजनबी, और एक विस्फोटक चुप्पी दबाये बारूद का गोला जैसा लगने लगा था।  
यह सारी स्थितियाँ मेरे सामने जिस रूप में आ रही थीं, मैं उन्हें निर्देशित करने में सर्वथा असमर्थ था। इन समस्याओं को समाधान की ओर गतिशील बनाने की बात सोच पाना तो और भी असम्भव होता जा रहा था। एकाएक उसने आवेश में कहना शुरू किया।
“जी हाँ, मैंने अमृता से शादी की है, वह सिख की बेटी है, हम सम्बंध बनाने के लिए स्वतंत्र हैं, हमारी स्वतंत्रता छीनने वालों का नाश हो।” यह कहते हुए उसने जिस जोर के साथ मुट्ठियाँ बाँधीं, उससे उसकी सभी उँगलियाँ एक साथ बोल उठीं, “समाज-विरोधी, जीवन-विरोधी राजनीति ने हमारी सारी सुरक्षा, एकता और स्वतंत्रता पर अपने दाँत गड़ा दिये हैं, किंतु इस तरह से मानवता को देर तक अपने वश में नहीं रख सकते। आने वाले दिनों में, सभी सीमाएँ टूटेंगी, सत्ताधारियों के विभाजन की दीवारें गिरेंगी, प्रेम और एकता की ताकतें वेग के साथ उठ खड़ी होंगी, देखना।” कभी वह मेरी ओर देखता, कभी टेबिल पर रखे अमृता के सिर पर निगाहें टिका देता।

उसकी सारी बातें तर्कसंगत और कानूनसंगत तो थीं, लेकिन माहौल इन सबके विरुद्ध था। उसमें आक्रामकता और पैशाचिकता बाढ़ पर थी, उसका फन कुतुबमीनार के ऊपर-ऊपर विषैली हिलोरें भरता हुआ लहरा रहा था और उसके फन से झरते हुए जहरीले झाग से आजादी की उपलब्धियाँ दम तोड़ती जा रही थीं। जब-जब अंतरप्रांतीय प्रेम अंतरजातीय सम्बंध और जन-एकता के अंकुर फूटते हैं, अंधचेतना की मांदों में पाले-पोसे गये, ऐसे ही विषैले नाग बाहर निकलकर आ जाते हैं !
ध्वनि धीमी करके, टेलीविजन ऑन रखा हुआ था। पर्दे को आयत्त किए एक लाश बराबर दिखाई जा रही थी। मगर उन लाशों को कौन देख रहा होगा जो पेट्रोल और मिट्टी का तेल छिड़ककर जला दी गयीं, जो गटरों में और पुलों के नीचे फेंक दी गयीं, उन दुधमुँहे बच्चों की लूट ली गयी किलकारियाँ और कुमारियों की दुहाई देती चीखों को कौन सुन रहा होगा ! यह सब छिपाकर सिर्फ एक लाश दिखायी जा रही थी ! क्या वह सारे देश में फैल रही क्रूरता, हिंसा और अमानवीयता को ढकने के लिए काफी थी? मैं समझता हूँ, किशन, अमृता और मेरे लिए वह बिल्कुल नाकाफी थी।
अचानक, दरवाजा हिला और आधा खुल गया। शायद हवा का झोंका रहा हो; लेकिन नहीं, अधखुले भाग में सहसा मैंने देखा एक पगड़ीधारी लंबा-सा व्यक्ति खड़ा है। उसने तंग मुहरी का पायजामा और कुर्ता पहन रखा था। इस बीच अमृता, जो उठकर सोने वाले कमरे के दरवाजे के पास पहुँच गयी थी, गर्दन घुमाकर वहीं से पूछा,“यह कौन हैं ?
“आप कौन हैं ?” किशन ने दरवाजे की ओर बढ़ते हुए, व्यक्ति के पास रुककर पूछा।
“मैं !... आप हमें भूल गये लगते हैं”, यह कहते हुए वह अंदर आ गया। किशन कुछ कदम पीछे हट गया।
“नहीं, नहीं”, किशन ने कहा, “मेरा मतलब है, यहाँ पहले भी कभी आये थे आप ?” पीछे हटते हुए किशन डाइनिंग-टेबिल के पास तक आ गया, “बैठिए !”
“एक-दो बार आपसे मुलाकात भी हो चुकी है”, उस व्यक्ति ने कहा, “मेरा नाम अमरजीत सिंह है।” खड़े-खड़े उस व्यक्ति ने कहा।
“हाँ, अमरजीत सिंह ! हमारे पड़ोसी हरजीत सिंह केसरी के समधी।” अमृता ने कहा, “लेकिन आप तो वह नहीं हैं।”
“नहीं, मैं वही हूँ।” अमरजीत सिंह ने कहा।
“बैठ जाइए”, किशन ने कुर्सी दिखाते हुए कहा, “आप हमारे मेहमान हैं”, किशन ने अमृता की ओर मुड़कर कहा, “अमृत, मेहमान को खाना लाओ। फिर हमें भी कुछ लाकर दो। साढ़े दस बज गए।”
इस नवागंतुक को देखकर किशन जितना चौकन्ना और चुस्त हो गया, उसे देखकर मुझे आश्चर्य हो रहा था। जबकि मुझे उसके आ जाने के बाद सब तरफ संकट ही संकट नजर आने लगा था। उस व्यक्ति का भय से पीला पड़ा चेहरा मानो अभी भी आतंकवादियों की आँखों के सामने रखा हुआ था ‌‌‌‌-- क्योंकि वह लगभग क्रिया-शून्य और बोली-बानी से परे होता जा रहा था। वह जिधर देखता, देखता ही रह जाता।
लो ! यह एक और आदमी हमारे बीच में आ गया जिसे ईश्वर की लाश के पीछे भी नहीं छिपाया जा सकता था।
अमृता ने हम सबके सामने टेबिल पर भोजन की प्लेट रखते हुए उस व्यक्ति को कितनी बार देखा होगा, मैं नहीं बता सकता, किंतु जब एक-दो बार मैंने उसे नवागंतुक की ओर देखते देखा तो उसकी निगाहों में पहचानने की कोशिश जारी थी। माहौल किसी स्वप्न की भूमि पर तिरता-सा प्रतीत होने लगा।
भोजन की चार प्लेटें, चार शीशे के गिलास और दो बड़े जग में फ्रिज का ठंडा पानी हमारे सामने रखे जा चुके थे। अमृता भी किशन की बगल में बैठ गयी, “आप भी बैठ जायें”, अमृता ने कहा, “कुछ तो खा लीजिए।”
“अपण को भूख नहीं है, अपण को प्यास है।” अमरजीत सिंह ने कहा तो अमृता ने गिलास और किशन ने एक जग उसकी तरफ खिसका दिया। उसने गिलास भर-भरकर पानी पीना शुरू कर दिया और अंत में जब उसने पूरा पानी पी लिया तो फिर दुहराया, “अपण को बस प्यास है।”
“और ?” किशन ने कहा; इस पर उसने हाथ जोड़कर नहीं का संकेत किया।
संभवत: अनेक घेरावों से किसी तरह बचकर निकल आने पर भी उस व्यक्ति ने रास्ते में जहाँ-तहाँ जितने हादसे देखे होंगे, उन सबकी छाया उसके चेहरे पर मँडरा रही थी।
“आपके समधी का अता-पता है ?” किशन ने पूछा।
इस पर अमरजीत सिंह ने भारी पगड़ी वाले सिर को नहीं का संकेत करने के लिए, बायें से दायें और फिर दायें से बायें हिलाने का प्रयास किया। यह पूछने पर पता चला कि फ्लैट की चाभी उनके पास है, हम सब आश्वस्त हो गये। इसके बाद उसने हमारी बातों से जो भी निष्कर्ष निकाले हों, यह तो नहीं मालूम, लेकिन वह तुरंत उठकर, दरवाजे से बाहर चले गये।
हमारे सामने पड़ी भोजन की प्लेटों ने हमें अपनी ओर आकर्षित किया। अभी तक किसी के मुँह में एक निवाला भी नहीं जा सका था। हम तीनों ने अपनी-अपनी प्लेटें अपने सामने सरकाकर, खाना शुरू कर दिया। कोने पर अमरजीत सिंह के लिए परसी गयी प्लेट मानों प्रेतात्मा के लिए सौंप दी गयी थी। जब-तब हम उस तरफ देख लिया करते थे।
“क्या वह व्यक्ति जैसा बता रहा था, सचमुच वही था ?, मैंने किशन से पूछा।
“भई, मुझे तो शक है। क्योंकि अमरजीत सिंह को तो मैंने देखा ही है”, किशन ने अमृता की ओर मुखातिब होते, उससे पूछा, “तुम भी तो उन्हें पहचानती होगी ?
“हाँ, मगर ये जो आये थे, अमरजीत से भिन्न मालूम होते थे”, अमृता ने कहा।
खैर, तय हुआ कि, वह व्यक्ति चाहे तो अपने समधी के फ्लैट में रह ले, क्योंकि चाबी उसके पास है ही, नहीं तो फिर हम उससे एक बार फिर अपने साथ रहने का आग्रह करेंगे। सबेरे वह, जहाँ कहेगा, उसे सुरक्षित स्थान पर पहुँचा दिया जायेगा।
तभी लाउडस्पीकर से ऐलान सुनाती हुई एक टैक्सी कालोनी में घूमने लगी। “गद्दारों को, जिन्होंने प्रधानमंत्री की हत्या की है...जो भी घरों में छिपाएगा...उसे देशद्रोही समझा जाएगा।”
अमृता जो किशन की बगल में बैठी हुई थी, उसकी तरफ कुर्सी सरकाती हुई, बिल्कुल उससे सटकर बैठ गई। ऐलान के भारी-भरकम शब्द, जिन पर राजाज्ञा की मुहर लगी प्रतीत हो रही थी, कालोनी के फ्लैटों में खिड़कियों और रोशनदानों में घुसकर कानों के पर्दों से टकराने लगे थे। नीचे से ऊपर तक के मकानों की खिड़कियाँ और दरवाजे धड़ाम-धड़ाम बंद होने लगे, और कुछ पल तक उनका शोर गोलियाँ दगने की बाढ़ जैसा प्रतीत होता रहा।
कुछ क्षण के लिए एक अतल मौन-सा छा गया और इसे तोड़ते हुए मानो किशन इस कालोनी में कुछ बोलने वाला पहला व्यक्ति हो, उसने कहा, “अगर वह व्यक्ति अमरजीत सिंह नहीं है, तो भी उसे बुलाकर हम अपने फ्लैट के भीतर छिपा लें।” ये शब्द अमृता को सम्बोधित करते हुए कहे गए थे, किंतु उसने उसका जवाब देने के बजाय, अपना चेहरा किशन की पीठ में छिपा लिया, जैसे वह और कुछ सुनना नहीं चाहती। ऐलान सुनने के बाद उसके भीतर घटते परिवर्तन में अधिक तीव्रता आ गयी थी। किशन मेरी ओर देखने लगा।
यह तो अत्यंत मानवीय प्रस्ताव है’, मैंने अपना मत व्यक्त करने की स्वतंत्रता का पहली बार इस्तेमाल करते हुए कहा, “आखिर वे पड़ोसी के मेहमान है, तो हमारे भी मेहमान हुए।”
“बिल्कुल ठीक कहा तुमने”, किशन यह स्वीकार करते हुए, तत्काल उठने चला था कि अमृता ने उसके कंधों पर अपने दोनों हाथों का दबाव बढ़ाकर, उसे उठने से रोक दिया।
“मैं तो उसका चेहरा देखकर हैरत में आ गया हूँ। जैसे वह अपना प्रेत बन चुका हो, आज तो निश्चय के साथ मैं उसे अमरजीत कह सकने में असमर्थ हूँ।” किशन ने बैठे-बैठे कहा।
“व्यवस्था की नीयत पर एकाएक समग्र अविश्वास का अनुभव कितना गहरा होता होगा !” मैंने कहा, “मैंने तो इस व्यक्ति को पहले कभी देखा नहीं था। तुम तुलना करके उसके कल के और आज के स्वरूप को समझ सकते हो।”
“वो लोग आ गये”, एकाएक किशन की पीठ में अपने सिर को छिपाते हुए अमृता ने कँपकँपी के साथ फिर दुहराया, “आ गये, वो लोग आ गये !” उसकी दबी-दबी-सी चीख से हम लोग चौकन्ने हो गये। कहीं कोई दिखाई नहीं दिया, हाँ इस बार पुलिस गाड़ियाँ गश्त पर निकल आयी थीं। उनकी सीटियाँ और ऐलान सुनायी देने लगे थे। कर्फ्यू लागू कर दिया गया था। जब-तब फायरिंग की धांय-धांय गूँज उठती और दिल्ली के आकाश पर मंडराती एक दानवाकार छाया की आँखें चमक उठतीं। पल भर में ही पूरी कालोनी में अंधेरा छा गया; पुलिस वाहनों की हेड लाइट की तेज रोशनी, खिड़कियों के कांच छेदकर, दीवारों पर आतंक और भय की रक्तरंजित रेखाएँ खींचती इधर-उधर गुम हो जातीं।
अमृता का अर्धभाग वेधशाला की तरह दूरदर्शी बनता जा रहा था। कंपकंपी और अस्फुट शब्दों के साथ, उसकी आँखों से आँसू बहते रहे। किशन उसकी हर बात को समझ लेता था और उसे धीमे शब्दों में कुछ समझाने का प्रयास भी करता रहता। अपने बारे में मैं इतना ही कह सकता हूँ कि मैं सम्पूर्ण स्थिति को समझने में सर्वथा असमर्थ था। कहाँ क्या हो रहा है, कैसे हो रहा है और शहर के किस हिस्से में यह सारा कृत्य सबसे अधिक हो रहा होगा — यह अनुमान कर पाना मेरे लिए कठिन था। अमृता ने जब त्रिलोकपुरी का नाम लिया तो, किशन टेलीफोन के पास जाकर चोंगा हाथ में लेकर, अपने मुँह और कान से लगाकर खड़ा हो गया। लेकिन त्रिलोकपुरी जाने वाली टेलीफोन लाइन मानो कट चुकी थी। फिर उसने आकाशवाणी और दिल्ली के बड़े अखबारों से संपर्क स्थापित किया। इन स्थानों से उसने हालात के बारे में पूछताछ की, कुछ सूचनाएँ एकत्र कीं और त्रिलोकपुरी के बारे में भयावह समाचार मिले – आगजनी, लूट, हत्या, बलात्कार  -- लाशें ट्रकों में भर-भरकर शहर से बाहर ले जाकर, गायब की जा रही थीं। त्रिलोकपुरी अमृता का नैहर था। 
रात का एक बजा था।
“हमारी कालोनी में भी कुछेक उन्मादी लोग रहते हैं। इनमें से एक-दो मेरे परिचित हैं, जिन्होंने अमृता से मेरी शादी को अनुचित बताया था”, किशन ने मुझसे कहा,“इस अवसर पर वे अपनी बात को सिद्ध करने का प्रयास कर सकते हैं।”
इस बार मैं भी अमृता की तरह काँप उठा। टेबिल के गिर्द यदि सुरक्षा का अब कोई आधार नजर आ रहा था तो वह एक सम्प्रदाय के बहुमत का आधार था, जिसके कि हम लोग सदस्य थे, जिसकी पुरानी संरचना सदियों से जड़ होकर अपनी जगह पर सड़ रही थी, जिसे अब तरह-तरह से आक्रामक और हिंसक भीड़ का रूप देकर, इस पिछड़े बहुमत को अपनी राजनीति चलाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा था। ये सारे तर्क किशन के थे। जब कि मेरी चेतना के प्रवाह में श्मशान के दृश्य फैलते जा रहे थे, जिसमें कुछ नर-पशुओं के एक हाथ में जलते लुक्कारे दिखायी दे रहे थे, दूसरे में बच्चों की दबी-कसी गर्दनें और स्त्रियों के रक्त-रंजित शव पर जानवरों के खुरों से बने छेद – जिनमें से उनकी पसलियों और रानों की हड्डियाँ नंगी होकर झाँक रही थीं ‌‌‌‌– ओह मैं भी कहाँ, किस अनचाहे नरक में आ फँसा !
“उस व्यक्ति को देखो”, अमृता ने उत्तेजित होकर कहा, “जिसने अपने को अमरजीत बताया था, उसे देखो।”
एक लम्बी चुप्पी के बाद हम चौंक पड़े। किशन ने दरवाजे की ओर देखा और मुझे भी लगा, किसी ने जमुहाई के साथ एक लम्बी साँस ली है, जिसे हम दोनों ने स्पष्ट रूप से सुन लिया था। किशन की पीठ से सटी हुई अमृता के बाल अस्त-व्यस्त होकर उसके चेहरे को अब अँधेरे की बहती हुई लकीरों की तरह ढँक चुके थे, जिनमें से बुदबुदाते हुए, सफेद पड़ गए होंठ, और विक्षिप्त-सी लाल डोरों से खिंची पुतलियाँ झाँक उठती थीं।
उस व्यक्ति के दरवाजे के बाहर चले जाने के बाद, बातचीत में लग जाने के कारण, दरवाजा अंदर से बंद नहीं किया जा सका था। डाइनिंग टेबिल के किनारे बैठे-बैठे ही हम लोगों ने देखा, दरवाजे का पल्ला दो-तीन इंच खुल गया था, जिसकी लम्बी खड़ी रिक्तता में उस पगड़ीधारी व्यक्ति की अत्यंत क्षीण आकृति दिखाई दी, पगड़ी,दाढ़ी और कुर्ता, जिसमें हाथ-पैर गायब थे, जो हिस्सा प्रदर्शित था, वह भी कैंची से दोनों ओर एक सीध में कतर दिया गया लगता था।
“देखो, उस व्यक्ति को देखो”, अमृता ने बेचैनी से ऐंठते हुए कहा।      
“अच्छा”, इस बार किशन उठा, आगे बढ़ा और मैं भी उठकर उसके पीछे-पीछे चलने लगा। दस-बारह कदम चलकर हमने दरवाजे को पूरा खोल दिया। अपने को अमरजीत सिंह बताने वाला व्यक्ति दोनों फ्लैटों के दरवाजों के बीच पैर सामने फैलाकर, समकोण बना बैठा था। उसका चेहरा दु:खी व्यक्ति का चेहरा भी नहीं रह गया था – वह विरक्त, निस्संग और निस्सारता के गहनबोध में दबकर एक पाषाणी साँचे में ढल गया था।
“किशन बाबू, तुम परीशान मत हो, अपण को अकेला छोड़ दो।” उसने कहा !
“लेकिन यह कैसे हो सकता है। अब तो रात के चार बजने जा रहे हैं। और आप अब तक सीढ़ी पर बैठे हुए हैं।” किशन ने उसे समझाते हुए कहा, “आपने तो कहा था कि फ्लैट की चाभी आपके पास है ?” किशन ने पूछा।
“हाँ जी, है तो”, उसने जेब में टटोलकर चाभी निकाल ली और हमें दिखाते हुए कहा, “चाभी तो है !” फिर उसने चाभी अपने जेब में रख ली। फिर दूसरी जेब से उसने एक मनीबैग निकाला और बोला, “इसमें बीस हजार रुपए हैं, इसे अपने पास रख लो।”
“नहीं-नहीं”, किशन ने कहा, “घबराने की कोई बात नहीं है। इसे आप अपने पास रखे रहें। सुबह होते-होते हालात बदल जाएंगे।” किशन की बात सुनकर उसने मनीबैग फिर अपनी जेब में रख लिया।
“अपण को प्यास लगी है। पानी ला दो।” उस व्यक्ति ने हाथ का चुल्लू बनाते हुए अपने मुँह से लगाकर कहा।
मेज पर एक पानी भरा जग रखा हुआ था। एक गिलास और जग लेकर मैं फिर दरवाजे के पास आ गया। गिलास उस व्यक्ति को देते हुए, जो मेरे लिए तो एकदम ही अजनबी था, जग का पानी गिलास में उड़ेलने लगा। उसने पूरा जग पानी पीकर, फिर अपने दोनों हाथों को सामने फैले पैरों पर रख लिया।
“अपण को यहीं रहने दो”, उसने कहा।
फिर टेबिल के गिर्द जाकर हम कुर्सियों पर बैठ गये। सुबह होने पर रोजमर्रा की चहल-पहल से भिन्न, आज सब कुछ दहशत में डूबा-डूबा लग रहा था। बेलगाम बदमाशों, पेशेवर हत्यारों और लुटेरों के गुट, नुक्कड़ों और गलियों में आते-जाते होते, पुलिस रास्ता बचाकर चलने के लिए, बीच-बीच में हवाई फायर करके, उन्हें सचेत कर दिया करती थी।
राजधानी का यह हाल है, तो अन्य नगरों और गांवों में बसे इस विशाल भारत की जनता की क्या दशा होगी ? कितनी बार यहाँ से शांति कपोत उड़ाये गये, राष्ट्रीय एकता समितियों ने शंख बजाये, संसद और उसके बाहर अपने पवित्र संविधान की कसमें खायी गयीं मगर फिर उनकी दाढ़ों से मासूमों के रक्त चूते नजर आये।
पौ फटने से पहले का सघन होता अंधेरा; फिर एक बार पुलिस वाहनों से नये ऐलान सुनायी पड़े। मर्करी बल्बों की जलती हुई कतारें, अंधेरे पर फैले कोढ़-सी चितकबरी और घिनौनी लग रही थीं।
“जो शरणार्थी शिविर में....सुरक्षित स्थान में जाना चाहते हों.....” पुलिस का ऐलान जारी था, “शरणार्थी शिविर में जो सुरक्षित स्थान हैं, अगर कोई वहाँ जाना चाहे.....!”
हमने अमरजीत सिंह को अपनी जगह पर बैठे-बैठे ध्यान से देखा, उनमें बला की चुस्ती आ गयी थी, और उनका समूचा शरीर एक सशक्त खिंचाव के वेग से मानो जुड़ गया था। इसी बीच जब किशन ने उठकर, अपनी बालकनी से पुलिस गाड़ी को ठहरने के लिए आवाज और हाथ का संकेत दिया, तो हमारा ध्यान एकाएक उसकी तरफ केंद्रित हो गया। “ठहरिए !”, उसने कहा और फिर बालकनी से सीधे अपने फ्लैट के दरवाजे पर जा खड़ा हुआ।
मगर वह जगह, जहाँ अमरजीत सिंह बैठे हुए थे, खाली पड़ी थी। सीढ़ियों के निचली ढलान पर उसने उसी व्यक्ति को तेजी से उतरते हुए और पुलिस वाहन की ओर जाते हुए देखा। किशन भी नीचे उतरने लगा था। लेकिन जब तक वह नीचे पहुँचता, गाड़ी स्टार्ट हो चुकी थी और जल्दी ही कुछ दूर सड़क पर बने एक छोटे पुल के पास पहुँचकर रुक गयी थी। पीछे उसकी लाल बत्तियाँ जल रही थीं और हेडलाइट ऑफ कर दी गयी थी।
बालकनी से यह सब देखकर, जब मैं वापस टेबिल के पास आया तो किशन भी नीचे से हाँफता हुआ ऊपर आ गया था। अमृता ने अपनी गोद में अपना सिर छिपा लिया थ। और हम दोनों से वह एकदम परे हो गयी थी।
इस बार कुर्सियों पर बैठते हुए, हमने अपने शरीर पर छायी थकान को साफ-साफ अनुभव किया, हाथों-पैरों में जकड़न और जलन के साथ ही आँखों में काँटे चुभने लगे थे। अपनी वापसी के बारे में सोचा तो अनिश्चितता हाथ लगी। अपने काम और वापसी के बारे में कुछ भी कहने-सुनने के लिए मेरे पास कोई अधिकार शेष नहीं रह गया था। एक प्रताड़ित और निरर्थक व्यक्ति के रूप में और अपने ही जैसे निष्क्रिय लोगों के बीच नपुंसक जीवन जीते हुए इंतजार करना बाकी रह गया था।
पटाखे की आवाज सुनकर, हमने एक साथ बालकनी की ओर देखा, पौ फट रही थी। शीघ्र ही दिल्ली की इमारतों की खिड़कियों और दरवाजों में रक्तिम लपटें फैलने लगीं। जगह-जगह सड़कों, गलियों और दीवारों के पलस्तर तोड़कर, वैमनस्य और घृणा की मानो दबी-दबी-सी ज्वाला फूट पड़ी हो – स्वतंत्रता, समता और बंधुत्व के जनवादी मूल्यों को भस्म कर देने के लिए, उसके दुश्मनों को एक सशक्त बहाना मिल गया था। पी.एम. के हत्यारे और जनता में आतंक फैलाने वाले कातिल एक ही खेमे के थे – सुबह होते-होते किशन ने यह बात कहकर एक लम्बी साँस खींच ली थी।
....और तभी अपने दोनों हाथों से अपना मुँह ढँकती और फफककर रोती हुई अमृता उठ खड़ी हुई। “किशन, वह व्यक्ति अमरजीत सिंह थे”, यह कहती हुई, उसने बिजली की फुर्ती से, कमरे को पार किया और जब तक हम यह सोचते कि वह क्या करने जा रही थी, तब तक वह निचली मंजिल की अंतिम सीढ़ी पर पहुँच चुकी थी। फिर वहाँ से सीधे उस सड़क पर भागने लगी, जिधर पुलिसगाड़ी अमरजीत सिंह को लेकर चली गयी थी।
गाड़ी पुल के पास से कभी की जा चुकी थी। किशन ने अमृता को फटकारते हुए लहजे में पुकारा, “अमृता पागल मत बनो, रुको, अब आगे उधर एक कदम भी नहीं !” लेकिन पुल का मुकाम तब तक उसके कदमों के तले आ चुका था। वहीं एक लाश पड़ी हुई थी, जिसका अधोभाग नाले में था, और सिरहाना सूखी जमीन पर पड़ा हुआ था, सिर पर पगड़ी, चेहरे पर दाढ़ी, हाथ में कड़ा और वही सफेद कुर्ता और पायजामा। छाती पर काले चमड़े वाला मनीबैग खाली रखा हुआ था। “मेरा नाम अमरजीत सिंह....!”
मुझे पहचानने में अब जरा भी देर नहीं लगी। यह वही मेहमान था, जिसने रात सीढ़ियों पर बैठकर बितायी थी, सुबह की प्रतीक्षा के बाद, जब सुबह हुई तो उसे सुरक्षा की गारंटी के साथ सरकारी वाहन में बिठाकर, शरणार्थी शिविर की ओर ले जाया जा रहा था।

(दिसम्बर, 1986)