Thursday, September 27, 2012

NAYA KANOON -VIDROHI


NEW LAW
 
(English translation of Naya kanoon, a short poem by Ramashankar Yadav Vidrohi)
 

Expression of love, leads to the death, for centuries

There sleeps a river of pain in mountain's heart

Water of the river bows on the stone and gets injured

It had been the law in your world, for centuries.

 

But now, O Love! the laws will change, and the books will be changed

the world itself will change, only Good and Bad will remain unchanged.

 

(Rama Shankar Yadav 'Vidrohi')

Courtsey : Nayi Kheti



Gazal


गज़ल

 
अब मैं धीरे-धीरे अपनी किस्मत लिखता हूँ

हासिल के खाते में उनकी खिदमत लिखता हूँ

 

उनकी खिदमत जिसमें आँखें बूढ़ी हो आईं

बूढ़ी आँखों की अनदेखी हसरत लिखता हूँ

 

हसरत भरी निगाह बचा कर रक्खी सालों-साल

उन्हीं नज़ारों की खातिर अब रहमत लिखता हूँ

 

कागज़ पर अशआर और अल्फाज़ उतर आते

जब दीवानेपन में आ मैं वुसअत लिखता हूँ

 

मुस्तकबिल का लेखा जो तैयार कर रहा हूँ

उसमें अपनी हर चाहत को नफरत लिखता हूँ

 

और कलम जब-जब सुस्ताने का मन करता है

तब-तब मैं कागज़ पर केवल हरकत लिखता हूँ

 

इधर ज़िंदगी में जो कुछ तब्दीली आई है

उससे खुश होकर सोनम-सी बरकत लिखता हूँ

Best wishes to Dr. Manager Pandey for his long healthy life!

रिपोर्ट
आज के दौर में लोकतंत्र की चुनौती ही आलोचना की चुनौती है – प्रो. राजेंद्र कुमार
(प्रो.मैनेजर पांडेय के 71 वर्ष के होने पर आलोचना की चुनौतियाँ विषयक संगोष्ठी का आयोजन)
वरिष्ठ आलोचक प्रो. मैनेजर पांडेय के जीवन के 71 वर्ष पूरे होने के अवसर पर 23 सितम्बर को जन संस्कृति मंच की ओर से इलाहाबाद में आलोचना की चुनौतियाँ विषय पर प्रो. राजेंद्र कुमार की अध्यक्षता में एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। अपने सम्बोधन में प्रो. राजेंद्र कुमार ने कहा कि आज के समय में जो चुनौतियाँ लोकतंत्र के समक्ष हैं, वही आलोचना की भी चुनौतियाँ हैं। उन्होंने बताया कि साहित्य में आलोचना विधा का आगमन गद्य के उद्भव के साथ होता है। पश्चिम में यह पूँजीवादी लोकतंत्र के साथ जन्म लेती है। आज भारत में यह लोकतंत्र भी चुनौतियों का सामना कर रहा है। इसका संकट और इसकी चुनौती आज की आलोचना की भी चुनौती है। उन्होंने कहा कि आज की आलोचना को एक समझ और तमीज विकसित करनी चाहिए जो यह पहचान सके कि साहित्य में विचारधारा को गैर-जरूरी बताने वाले खुद किस विचारधारा को स्वीकार्य बनाना चाहते हैं। उत्तर आधुनिकता, जो सब-कुछ को पाठ बनाती है, वह अपने आप में खुद एक विचार का आरोपण है। उन्होंने आगे कहा कि प्रतिरोध की चेतना की पहचान ही आलोचना को महत्वपूर्ण बनाती है। आलोचना का काम रचनाकार को छोटा या बड़ा सिद्ध करना नहीं है।
इस अवसर पर इतिहासकार और सामाजिक कार्यकर्ता लाल बहादुर वर्मा ने कहा कि आज आलोचना की चुनौती यह है कि साहित्य को साहित्य, और समाज को समाज बनाए रखने में मदद करे क्योंकि आज पूँजीवाद इसी को खत्म कर देना चाहता है। उन्होंने कहा कि आलोचना के लिए जन-सरोकार होना जरूरी है। आलोचना एक उपकरण भी है, जिसे चलाना मालूम होना चाहिए। आज आलोचना को साहित्य के लिए मशाल होना चाहिए। वह साहित्य और जन के बीच पुल है। आलोचक और कथाकार दूधनाथ सिंह ने कहा कि विचारधारा और साहित्य-रचना का जो तनाव है वह आलोचना में होना चाहिए, उसे नज़र-अंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। सामाजिक शक्तियों के जो संघर्ष हैं, साहित्य उन्हें प्रतिबिम्बित करे। रविभूषण (राँची) ने कहा कि आलोचना जीवन और समय-समाज सापेक्ष होनी चाहिए। आज के संकट के समय में आलोचना को राजनीतिक प्रश्नों से भी जूझना होगा।
आलोचक गोपाल प्रधान (दिल्ली) ने आलोचना के वर्तमान पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आज क्षणिक किस्म के परिवर्तनों का उत्सवीकरण हो रहा है और आलोचना के भीतर से इतिहास बोध को विलोपित किया जा रहा है। जब कि हिंदी आलोचना अपने प्रारम्भ से ही सिर्फ साहित्य-आलोचना नहीं रही बल्कि उसने व्यापक सामाजिक सरोकार रखते हुए समाज और देश की आलोचना की। इतिहासबोध उसमें एक जरूरी तत्व रहा है। उन्होंने कहा कि देश का शासक-वर्ग इतना देशद्रोही शायद ही कभी रहा हो, जितना कि आज का शासक-वर्ग है। उसके भीतर के भय का आलम यह है कि वह कार्टून भी बर्दाश्त नहीं कर पा रहा है। उन्होंने अत्याधुनिक तकनीकी के साथ अत्यंत पिछड़ी हुई सामाजिक चेतना के मेलजोल के खिलाफ आलोचनात्मक संघर्ष चलाने की आवश्यकता बताई। पंकज चतुर्वेदी (कानपुर) का कहना था कि आलोचना अगर रचना में मुग्ध हो जाएगी तो वह रचना को ठीक से देख नहीं पाएगी। आलोचक को रचना की संशक्ति के साथ उससे दूरी भी बनाए रखनी होगी तभी वह रचना के महत्व को रेखांकित कर पाएगी। तमाम आलोचक दूरी बनाते हैं लेकिन संशक्ति गायब है। आलोचना को रचना से, उसके रचना कर्म से संबोधित होना होगा। आज के आलोचक पारिभाषिक शब्दावलियों के गुलाम हैं। पूरी आलोचना इन्हीं बीस-पच्चीस शब्दों से काम चलाती है। पारिभाषिक शब्दों की यह गुलामी रचना और आलोचना के बीच एक परदे का काम करती है। आलोचना को नए शब्द ईजाद करने होंगे। उन्होंने रचना और आलोचना में विचारधारा की आबद्धता को गैर ज़रुरी बताते हुए कहा कि जनता के प्रति सम्बद्धता जरूरी है लेकिन विचारधारा से आबद्धता जरूरी नहीं।
प्रो. चंद्रा सदायत(दिल्ली) ने कहा कि आज के दौर के अस्मितावादी विमर्श आलोचना का ही हिस्सा हैं। उन्होंने कहा कि हिन्दी सिर्फ साहित्य नहीं, बल्कि विमर्श की भी भाषा है, उसे वैसा होना ही चाहिए| हिन्दी भाषा के पैनेपन और समृद्धि के लिए अन्य भाषाओं से अनुवाद भी जरूरी है। प्रज्ञा पाठक (मेरठ) ने कहा कि स्त्री के जीवन और साहित्य को अलग कर के देखने से उसके साहित्य का सही मूल्यांकन नहीं हो पाएगा। तमाम लेखिकाएँ भी इसमें भ्रमित होती हैं। आलोचना में अभी भी स्त्री-रचना पर बात करने में पुरुषवादी सोच का दबाव काम करता है। स्त्रियाँ भी स्त्री-विमर्श या रचना पर बात करते समय इसी प्रभाव को ग्रहण कर लेती हैं। स्वतंत्र और व्यक्तित्ववान स्त्री आज भी आलोचना के लिए चुनौती है।
अपने जन्मदिन के मौके पर, संगोष्ठी को संबोधित करते हुए प्रो‌. मैनेजर पांडेय ने कहा कि विचारधारा के बिना आलोचना और साहित्य दिशाहीन होता है। आलोचना में पारिभाषिक शब्दावली का प्रयोग ईमानदारी से होना चाहिए क्योंकि पारिभाषिक शब्द विचार की लम्बी प्रक्रिया से उपजते हैं। उन्होंने कहा कि साहित्य की सामाजिकता की खोज और सार्थकता की पहचान करना ही आलोचना की सबसे बड़ी चुनौती है।
इस अवसर पर दीपक त्यागी (गोरखपुर), राहुल सिंह (बिहार), रामाज्ञा राय (बनारस) आदि वक्ताओं ने भी अपने विचार व्यक्त किए। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छात्र, बुद्धिजीवी,सामाजिक कार्यकर्ता एवं संस्कृतिकर्मी उपस्थित रहे। संगोष्ठी का संचालन जन संस्कृति मंच के महासचिव प्रणय कृष्ण ने किया। इससे पहले स्वाधीनता संग्राम सेनानी और वयोवृद्ध कम्युनिस्ट नेता, 92 वर्षीय कॉ. जिया उल हक ने प्रो. मैनेजर पांडेय को उनके जन्म दिन के उपलक्ष्य में शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया और उनके लम्बे जीवन की कामना की। डॉ. चंद्रा सदायत को जसम की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शोभा सिंह ने शॉल ओढ़ाकर सम्मानित किया। इस मौके पर प्रो. मैनेजर पांडेय के आलोचना कर्म पर केंद्रित दो पुस्तकों का लोकार्पण भी हुआ। इनमें से पहली पुस्तक 'मैनेजर पांडेय का आलोचनात्मक संघर्ष' प्रणय कृष्ण द्वारा लिखित तथा जसम के सांस्कृतिक संकुल द्वारा प्रकाशित है। दूसरी पुस्तक 'आलोचना की चुनौतियाँ' का सम्पादन दीपक त्यागी और राजेश्वर चतुर्वेदी ने किया है जिसमें पाण्डेय जी के व्यक्तित्व और कृतित्व पर अनेक लेख संकलित हैं।