Monday, December 14, 2020

एक विस्मरणीय संस्मरण : आलोक कुमार श्रीवास्तव

मैं बी.ए. द्वितीय वर्ष की परीक्षा दे चुका था। तृतीय वर्ष के लिए अंग्रेज़ी और हिन्दी विषयों का चुनाव भी मन में कर चुका था। जून का महीना भी बीत चुका था। मेरी उम्र भी 18 वर्ष हो चुकी थी। जन्म से ही एक बिल्कुल साधनविहीन परिवार का अब तक का अनुभव दिमाग को धनोपार्जन की युक्तियों की तरफ मोड़ देता था। अपनी ज़रूरत का कुछ हिस्सा ट्यूशन से प्राप्त पैसों से पूरा हो सकता था लेकिन परिवार के प्रति लगाव और जिम्मेदारी का भाव नैतिकता की मांग बनकर वैसा करने से रोक देता था। कुल चार जीवित भाई बहनों में मैं अंतिम था लेकिन तब तक किसी की शादी नहीं हुई थी। पिता जी वही पितृसत्तात्मक समाज के प्रतिनिधि थे - बेटियों को घर से बाहर निकलने देने के विरोधी। उन दिनों वे दुष्ट होने की हद तक जड़ व्यक्ति थे। तुलसीदास का रामचरितमानस ही उन दिनों उनका पथ प्रदर्शक ग्रंथ था। दोनों बहनों ने 1992 में इंटरमीडिएट पास किया था लेकिन पिता जी ने अगले सात आठ वर्षों तक उन्हें न तो कुछ पढ़ने लिखने दिया और न ही घर से बाहर निकलने दिया। वे जब भी घर से निकलीं तो या तो शौच जाने के लिए या फिर फाइनली अपनी अपनी ससुराल जाने के लिए। सन् 1992 के अंत में बाबरी मस्जिद भी तोड़ी गई थी। यह कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों के उत्कर्ष का समय था। पिता जी RSS और विश्व हिन्दू परिषद के नेताओं के सम्पर्क में रहते थे। हमारे गांव में भी राम लिखी ईंट अाई थी जिस पर लोगों द्वारा यथाशक्ति पैसे और अनाज चढ़ाए गए थे। धर्म की तो जय हो रही थी मगर हमारी हालत बेहद दयनीय होती जा रही थी। बी ए का छात्र होने और बालिग होने के बाद मैंने पिताजी को कभी कभी आड़े हाथों लेना शुरू किया जो अभी तक जारी है। उस समय की जीवन की विषम स्थितियों से निकलने का एक ही रास्ता नजर आता था कि मैं कुछ नियमित आय का रोज़गार पकड़ूं। अध्यापन में रुचि थी। एक दिन पिता जी को चुनौती दे दी कि तुम्हारे इन हिन्दू नेताओं का एक स्कूल भी तो चलता है, उसमें मुझे पढ़ाने का मौका क्यों नहीं मिल सकता? पहली बार पिताजी मेरी चुनौती पर गंभीर हुए क्योंकि मैं एक तो मेहनती और अनुशासनप्रिय था, दूसरे लड़का था। उन दिनों उच्च शिक्षा की कक्षाओं के सत्र विलम्ब से चलते थे। जून, जुलाई, अगस्त महीनों तक परीक्षाएं होना आम बात थी। सितंबर से पहले बी ए की कक्षाएं कदापि शुरू नहीं होती थीं। लेकिन प्राइमरी स्तर के नर्सरी स्कूल पक्का जुलाई में शुरू हो जाते थे। मेरी योजना जुलाई से सितंबर - अक्टूबर तक इन्हीं महीनों का इस्तेमाल स्कूल में अध्यापन का अनुभव प्राप्त करने और कुछ अधिक पैसे कमाने के लिए करने की थी। 

RSS वालों का स्कूल सरस्वती शिशु मंदिर हमारे गांव से कस्बे जाने वाले रास्ते पर ही पड़ता था। एक लालच यह भी था कि स्कूल में पढ़ाऊंगा तो सोरांव के बनियों के बच्चों के ट्यूशन भी मिल सकेंगे। पिता जी ने अपने संघी परिचितों से बात करके मुझे शिशु मंदिर में अध्यापकों के चयन की प्रक्रिया बताकर अपने को इस प्रसंग से अलग कर लिया। कारण यह था कि वे यह नहीं जाहिर होने देना चाहते थे कि एक पिता के तौर पर वे अपने बच्चों के खर्चे नहीं पूरे कर पा रहे हैं। इससे उनका ईगो हर्ट होता। वे तो आखिर परिवार रूपी राष्ट्र के प्रमुख थे, अपनी विफलता का ढिंढोरा क्यों पिटवाते? बहरहाल, मैंने इस थोड़े से ही सहयोग के लिए उनका आभार माना और अपने रोजगार की तलाश के मिशन पर निकल पड़ा।
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जुलाई का पहला हफ्ता था। सरस्वती शिशु मंदिर, गिरधरपुर में बच्चों की आमद अभी बहुत कम थी। प्रवेश प्रकिया शुरू ही हुई थी और आचार्य जी लोगों को आसपास के गाँवों में जाकर ‘पात्र’ विद्यार्थियों की तलाश करनी थी। गाँवों में शिक्षा से वंचित बच्चे तो बहुत थे लेकिन सबको शिशु मंदिर में प्रवेश नहीं मिल सकता था। सबसे पहले तो कोई मुसलमान बच्चा वहाँ पढ़ने नहीं जा सकता था। उसके बाद गरीबों और दलितों का नम्बर था। कुछ दलित बच्चों को प्रवेश केवल उनके अभिभावकों की ऊँची हैसियत और अमीरी को देखकर दिया जाता था साथ ही स्कूल में ऐसे बच्चों को मांसाहार न करने और नियमित पूजा-पाठ करने के निर्देश दिए जाते थे। मैंने अब तक इस स्कूल को रास्ते से आते-जाते ही देखा था, कभी भीतर नहीं गया था। उस बाहरी प्रेक्षण के आधार पर मेरी जानकारी यही थी कि वहाँ सबसे ज्यादा सोरांव कस्बे के बनियों के बच्चे पढ़ते हैं और इसके बाद सरांय बाजू, धामापुर, जंगलपुर, गिरधरपुर और रइया गाँवों से आने वाले ब्राह्मण (एकाध ठाकुर भी) और शेष ओबीसी समुदाय के लोगों के बच्चों का नम्बर आता था।

स्कूल का शिक्षक बनने से जुड़ी औपचारिकताओं को समझने के लिए मैं स्कूल के कार्यालय में गया। वहाँ दो लोग बैठे थे। एक थे छरहरे और फुर्तीले दिखने वाले प्राचार्य श्री राधेश्याम तिवारी और दूसरे थे पके कद्दू की तरह दिखने वाले नाटे-मोटे-कंजे आचार्य जी, जिनका नाम अभी बिल्कुल याद नहीं आ रहा है। यह ज़रूर याद आ रहा है कि वे ज्यादातर स्कूल के क्लर्क का काम करते थे, हालांकि थे मल्टी-टास्किंग। रास्ते से गुज़रते हुए मैंने उन्हें कई अलग-अलग काम करते हुए देखा था। उस समय वे उस दिन जमा हुई एक बच्चे की फीस को स्टेट बैंक की सोरांव शाखा में जमा करने के लिए डिपॉज़िट स्लिप भर रहे थे। चूँकि मैं अकेला गया था इसलिए मुझे अपना परिचय भी देना था और आने का उद्देश्य भी बताना था। उन दिनों मैं कतई विनम्र नहीं था और उजड्ड होने की हद तक स्ट्रेट फॉरवर्ड था। मैंने बड़े रूखे तरीके से बातचीत की शुरुआत की थी लेकिन प्राचार्य जी ने उस पर अपनी सभ्यता, विनम्रता और उदारता की चिकनाई चुपड़कर हमारे संवाद को सार्थक बना दिया। उनके अच्छे व्यवहार के कारण मेरा आत्मविश्वास भी बढ़ा और मैं अपने मंतव्य को पूरी तरह सामने रख सका।

सरस्वती शिशु मंदिर, गिरिधरपुर, सोराम, प्रयाग के प्राचार्य श्री राधेश्याम तिवारी ने मुझे अपना मुरीद बना लिया। मैं उन्हें मित्र समझने लगा। (हालांकि उनके द्वारा सोरांव को सोराम और इलाहाबाद को प्रयाग लिखने और बोलने का मुरीद मैं न बन सका। उल्लेखनीय है कि सोरांव का नाम आज भी सोरांव ही है और इलाहाबाद का नाम तब प्रयागराज नहीं था।) जिस मैत्रीपूर्ण भाषा में उन्होंने मुझे विद्या भारती का अध्यापक बनने की प्रक्रिया और चरण का परिचय दिया, उससे मेरे मन में यही धारणा बनी कि यह एक व्यवस्थित प्रक्रिया है और इसके चरणों को पूरा करके मैं अध्यापक बन सकता हूँ।                   

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किसी काम की प्रक्रिया जितनी घुमावदार हो, वह काम उतना ही महान लगने लगता है। शिशु मंदिर का अध्यापक बनने की प्रक्रिया राधेश्याम तिवारी जी ने मुझे उतनी ही घुमावदार बताई थी जितने से मुझमें थोड़ा महानता बोध तो जगे ही साथ ही मैं शिशु मंदिर को कोई आम स्थानीय स्कूल न समझ बैठूं। उन्होंने बताया कि यदि आपका चयन हो जाता है तो नियुक्ति जिला कार्यालय के माध्यम से होगी। चयन के लिए परीक्षा और साक्षात्कार देने जिला कार्यालय ही जाना होगा और संगठन के जिला मंत्री जी स्वयं लिखित परीक्षा में सफल अभ्यर्थियों का साक्षात्कार लेते हैं। जिला तो मैं इलाहाबाद को ही जानता था जो कि सरकारी तौर पर भी हम लोगों का मुख्यालय था और सामाजिक तौर पर भी। लेकिन जिस संस्था में मैं बतौर अध्यापक घुसने जा रहा था, उसका जिला मुख्यालय इलाहाबाद नहीं बल्कि फूलपुर था। फूलपुर मेरी जानकारी में एक तहसील  और एक लोक सभा क्षेत्र तो था लेकिन जिला मुख्यालय के रूप में उसका नाम पहली बार मेरे सामने आया। अटपटेपन का यह पहला अनुभव था। आगे और भी अटपटे अनुभव होने बाकी थे।

विद्या भारती का जिला कार्यालय (RSS के प्रशासनिक ढांचे के अनुसार) गोमती इंटर कालेज, फूलपुर में था और जिला मंत्री लालजी द्विवेदी या तिवारी वहीं बैठते थे। सरस्वती शिशु मंदिर, गिरधरपुर के प्रधानाचार्य राधेश्याम तिवारी जी ने इस पूरे प्रसंग को मेरे लिए जिला स्तरीय घटना बना दिया था और मैंने इस घटना का सामना करने के लिए समुचित तैयारी भी की। हिंदी और अंग्रेजी व्याकरण की जो भी गाइडें, कुंजियां, किताबें घर में मिलीं, सबको तेजी से पढ़ गया। साक्षात्कार के लिए सामान्य ज्ञान की बातों पर गौर किया। अख़बार पढ़ा। उपकार प्रकाशन, आगरा की एक छोटे आकार की किताब में दिए गए तथ्यों को इतनी गहराई से पढ़ा और आत्मसात किया कि वे आज भी याद हैं। 

राधेश्याम जी द्वारा दी गई जानकारियों और दिशानिर्देशों के हिसाब से मैं चयन प्रक्रिया में शामिल होने उसी हफ्ते के शनिवार को फूलपुर के लिए निकला। इससे पहले कभी फूलपुर नहीं गया था। यूं तो साइकिल से ही जाना ठीक रहता, लेकिन बरसात होने पर भीग जाने और बरसात न होने पर पसीने से भीग जाने के डर से बस पकड़ी क्योंकि यह इंटरव्यू में शामिल होने का मामला था। हालांकि फूलपुर पहुंचने पर उस सनसनी को महसूस न कर पाने पर मुझे निराशा हुई, जो राधेश्याम जी ने चयन प्रक्रिया के नाम पर मेरे मन में बैठा दी थी। वहां तो बड़ा नीरस माहौल था। पहले तो लगा कि नाहक ही यहां आ गया क्या, यहां तो कोई पुछत्तर ही नहीं है। पर कुछ समय बिताने के बाद माहौल समझ में आने लगा। मेरे अलावा छह या सात और लोग भी उस चयन प्रक्रिया में हिस्सा लेने के लिए हाजिर हुए। उनमें सर्वाधिक पढ़े लिखे व्यक्ति थे श्री यतीश कुमार मिश्र, जिन्हें पहली दफा मैंने सतीश कहा क्योंकि तब तक मैंने यतीश नाम सुना ही नहीं था। वे समाज शास्त्र में एम ए थे और वहां आए लोगों में देखने में भी सबसे साफ़ सुथरे लग रहे थे। उन्हें उनके चाचा जी ने वहां के लिए रिफर किया था। अपने नाम का सही उच्चारण बताने के बाद उन्होंने मुझसे कोई संवाद नहीं किया और अपने चयन की आश्वस्ति और आत्मविश्वास के साथ अपने एकेडमिक दस्तावेजों को बारी बारी से देखते हुए तब तक बैठे रहे जब तक कि चयनकर्ता महोदय ने सर्वप्रथम उन्हें बातचीत के लिए आमंत्रित नहीं कर लिया।

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राधेश्याम तिवारी जी ने अपनी तरफ से बड़ी फिक्रमंदी के साथ एक आवेदन मुझसे लिखवाया था और उसी आवेदन पत्र को अपनी शैक्षणिक योग्यता के अंक पत्रों के साथ लेकर मैं विद्या भारती के जिला कार्यालय पहुंचा था। हालांकि उनके द्वारा लिखवाए गए आवेदन की भाषा हास्यास्पद होने की हद तक विनम्रता से भरी थी लेकिन चूंकि वे स्कूल के प्रधानाचार्य थे और मुझसे भी विनम्रता से पेश आ रहे थे इसलिए उनका लिहाज करके मैंने उसे रहने दिया। मजे की बात तो यह हुई कि यहां उस पहले से लिखकर लाए हुए आवेदन को सिरे से नकार दिया गया। यहां पूरी चयन प्रक्रिया के दौरान नियोक्ता पक्ष के तीन महानुभावों से मेरा सामना हुआ। इन तीन में से दो के व्यक्तित्व बेहद उबाऊ और थकाऊ थे। शिक्षा के काम से जुड़ी किसी संस्था के जिला कार्यालय में ऐसे व्यक्तियों का पाया जाना अपने आप में अच्छा लक्षण नहीं है, लेकिन मैं वहां संस्था को बदलने नहीं, सिर्फ कुछ महीनों के लिए नौकरी तलाशने गया था लिहाजा इसे अपने मिशन का एक पड़ाव मानकर झेलता गया। पहले पहल यही दो व्यक्ति मिले। इनमें से ही एक सज्जन जिला मंत्री जी थे। उनका ज्यादा जोर परिचय और सामाजिक मेल मिलाप पर था। परिचय और पूछताछ के बाद उन्होंने हम लोगों को दूसरे सज्जन के हवाले कर दिया। दूसरे सज्जन मिश्रा जी थे जो उसी क्षण हम लोगों को प्रशिक्षु और खुद को प्रशिक्षक मान बैठे। उनके ऐसा मानने के पीछे समुचित कारण भी था। उनके स्कूलों में जितनी रिक्तियां थीं उनकी तुलना में बहुत कम (कुल सात) उम्मीदवार आए थे तो वे किसे रिजेक्ट करते। सबको सेलेक्ट करना ही था। इसलिए उन्होंने सीधे हमें ड्राफ्टिंग पढ़ाना शुरू कर दिया। छोटे बच्चों का एक क्लासरूम था, वही रूम तत्काल हमारा ट्रेनिंग हॉल बन गया। आचार्य के रूप में नियुक्ति हेतु प्रार्थना पत्र का मजमून उन्होंने सबको एक साथ डिक्टेट करना ठीक नहीं समझा और सबको बारी बारी से अलग अलग तरीके से लाइन दर लाइन मजमून लिखाने लगे। इससे बड़ा कन्फ्यूजन पैदा हुआ। लगभग सबको अपने अपने आवेदन में काटपीट करनी पड़ी। बाद में मुझे उनके ऐसा करने का रहस्य समझ में आया। मिश्रा जी असल में एक कुंठित व्यक्ति थे। अपनी कुंठा का शमन करने के लिए ही वे प्रार्थना पत्र लिखाने की यह प्रविधि अपनाते थे। जब सबके प्रार्थना पत्र में काटकूट हो गई तो मिश्रा जी प्रसन्न हुए। यह उनके विजय का क्षण था जिसे वे ज्यादा देर तक सेलिब्रेट नहीं कर सके क्योंकि उसी समय चयन प्रक्रिया के सबसे अहम सदस्य तीसरे महानुभाव वहां आ गए और हम लोगों में से सबसे महत्वपूर्ण अभ्यर्थी यतीश जी को उनसे परिचित कराने तथा साक्षात्कार की औपचारिकता पूरी करने के लिए जिला मंत्री जी ने उन्हें अपने पास बुला लिया। उनके लिए प्रार्थना पत्र की औपचारिकता को शिथिल कर दिया गया, शेष लोग मिश्रा जी की निगहबानी में आवेदन पत्र लिखने या न लिखने के द्वंद्व का आस्वाद लेते रहे। 

कमरा वही था, बस यतीश जी बिना किसी फास्टेस्ट फिंगर फर्स्ट के ही हॉट सीट पर पहुंच गए थे। चयनकर्ताओं की त्रिमूर्ति के साथ उनके वार्तालाप को मैं ध्यान से सुनने लगा ताकि अपनी बारी आने पर कदाचित उसका कुछ सदुपयोग कर सकूं। इस बीच मैंने मिश्रा जी के फॉर्मेट वाला आवेदन पत्र भी लिख डाला। जो तीसरे महत्वपूर्ण महानुभाव आए थे, उनका व्यक्तित्व छुटभैया नेता जी वाला था। गोमती इंटर कालेज के प्रबंध तंत्र के आदमी थे। व्यस्त प्रतीत होते थे। यतीश जी का संदर्भ उन्हें ज्ञात था। प्रत्यक्ष परिचय के बाद आगे पीछे के तमाम परिचय का आदान प्रदान भी उन लोगों  के बीच हुआ। यतीश कुमार मिश्र के रूप में एक सुयोग्य आचार्य मिल जाने का उल्लास उनके ही नेतृत्व में प्रकट हुआ जिसमें जिला मंत्री जी और मिश्रा जी भी शामिल हुए।  

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छुटभैये चयनकर्ता जी ने मिश्रा जी द्वारा रचे गए औपचारिक माहौल को सीधे ही साक्षात्कार की शुरुआत करके पल भर में अनौपचारिक बना डाला था। मिश्रा जी बहुत दिनों से वहां सैंडिल घिस रहे होंगे और मकुनी की तरह पिस रहे होंगे मगर प्रबंधन की दया दृष्टि की कमी उनकी कुंठा में वृद्धि का कारण बनती होगी। सरस्वती और लक्ष्मी के द्वंद्व में लक्ष्मी ही राज करती हैं, इस व्यवस्था को शायद मिश्रा जी अंगीकार कर चुके थे। तभी तो छुटभैये चयनकर्ता के मोर्चे पर आते ही उन्होंने फौरन क्लर्क वाली जिम्मेदारी संभाल ली। अब वे पूर्वोक्त दो प्रमुख चयनकर्ताओं से आदेश लेकर यतीश जी का नियुक्ति पत्र तैयार कर रहे थे। उनकी आज्ञाकारिता की पराकाष्ठा का एक नमूना यह था कि छपे छपाए फॉर्मेट वाले नियुक्ति पत्र में कौन से पैराग्राफ (अप्रासंगिक होने के कारण) काट दिए जाएं, यह भी वे जिला मंत्री जी और दूसरे सज्जन से बार बार पूछ रहे थे। नियुक्ति पत्र की प्रतियां तैयार कर लेने के बाद प्रतियों के बीच से कार्बन निकाल कर बड़े अदब के साथ उन्होंने जिला मंत्री जी के हस्ताक्षर लिए। मैंने सोचा कि इस संस्था में मल्टीटास्किंग लोग हर जगह हैं। गिरधरपुर वाले कद्दू छाप आचार्य जी की याद अाई जो वहां बैंक की डिपॉज़िट स्लिप भर रहे थे।
इस यतीश कुमार मिश्र प्रकरण की तफ़्सील देने के पीछे मेरा उद्देश्य सिर्फ़ यह है कि आप जान सकें कि विद्या भारती कोई निष्पक्ष, न्यायप्रिय, लोकतांत्रिक मूल्यों वाली संस्था नहीं है। जहां कोई कॉम्पटीशन ही नहीं है, वहां भी ये जाति (ब्राह्मण) वाद और भाई भतीजावाद करने में कोई संकोच नहीं करते। कुछ नहीं तो अपने आदमी को लाइन में आगे कर लेने का ही सुख ले लेना। यतीश को ब्राह्मण होने और छुटभैये चयनकर्ता के परिचित का रिश्तेदार होने का अलिखित आरक्षण मिला था। 
ख़ास उम्मीदवार की चयन प्रक्रिया पूरी करने के बाद चयनकर्तागण हम आम उम्मीदवारों से मुखातिब हुए। हम लोगों के लिए उस आवेदन पत्र को लिखित परीक्षा मान लिया गया जो मिश्रा जी की कुंठा के शमन का साधन था। इस एक्सिडेंटल लिखित परीक्षा में मैं प्रथम आ गया क्योंकि जिला मंत्री जी को न केवल मेरी लिखावट और शैली अच्छी लगी थी बल्कि इस बात को उन्होंने मेरी बुद्धिमत्ता का प्रमाण माना कि जिस समय वे लोग पहले उम्मीदवार का चयन कर रहे थे उसी समय के दौरान मैंने वह आवेदन लिख डाला था। पुष्टि के लिए उन्होंने वह पुराना आवेदन पत्र मुझसे मांगा जो राधेश्याम जी ने लिखवा कर भेजा था। दोनों की तुलना करते हुए उन्होंने राधेश्याम जी की कुछ विशेषताओं का उल्लेख किया जिनसे यह अनुमान लगाना कठिन था कि वे विशेषताएं गुण थीं या अवगुण। मेरा अपना आकलन यह था कि हैं तो वे गुण ही लेकिन ईर्ष्या का अपमिश्रण होने के कारण अवगुण लग रही हैं।
कुल मिलाकर मेरे लिए राहत की बात यह थी कि अब मैं चयन प्रक्रिया में दूसरे नंबर पर आ गया था। नियुक्ति तो होनी ही थी, पर बात अब तैनाती के स्थल को लेकर फंस गई। जिला मंत्री जी का मानना था कि मेरी योग्यता का पूरा इस्तेमाल हरिसेन गंज या मऊ आइमा स्थित विद्यालयों में से किसी में बेहतर हो सकता है। वहां बेहतर वेतन की भी संभावना थी, लेकिन मेरी समस्या ये थी कि ये दोनों स्थान सोरांव से इलाहाबाद जाने वाले रास्ते पर न होकर प्रतापगढ़ वाले रास्ते पर थे - मतलब मेरे लिए बिल्कुल उल्टा होता। मैंने यही निवेदन किया कि मुझे गिरधरपुर वाले स्कूल में ही तैनात किया जाए क्योंकि फिलहाल मेरे लिए यही सुविधाजनक है। छुटभैये चयनकर्ता ने इसे मेरी मूर्खता समझकर मुंह बिचकाया लेकिन जिला मंत्री जी ने कहा - ठीक है। लेकिन वहां का वेतन हम नहीं बता सकते। वहां बच्चे कम हैं और स्थानीय प्रबंध तंत्र से कोई सहयोग मिलता नहीं, वहां राधे श्याम जी और शुक्ला जी (वही कद्दू छाप आचार्य जी जिनका नाम पहले मुझे याद नहीं आया था) जैसे लोग ही निर्वाह कर सकते हैं। 
मैं उनका संकेत समझ गया। उन्होंने मेरे लिए एक और रास्ता खुला रखने के लिए मुझसे वहीं अन्य पसंदीदा विकल्प भी भरवा लिए जिनमें हरीसेन गंज और सहकारी कताई मिल, मऊ आइमा का नाम लिखवाया ताकि कभी मेरा मन बदले तो मैं वहां ट्रांसफर करा सकूं।

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आखिरकार मेरा नियुक्ति पत्र भी तैयार हुआ। जिला मंत्री जी के हस्ताक्षर के उपरांत वह मेरे लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बन गया। पत्र की तीन प्रतियों में से दो प्रतियां मुझे सौंपने का निर्णय लेते हुए जिला मंत्री जी ने कहा कि इस तरह की डाक ले जाने का कार्य ऐसे तो शुक्ला जी (वही पके कद्दू जैसे दिखने वाले मल्टी टास्किंग आचार्य जी जिनका नाम पहले मुझे नहीं याद आ रहा था) ही करते हैं लेकिन आप को विद्यालय जाना ही है इसलिए दोनों प्रतियां आप को ही दे रहे हैं। एक प्रति आपके लिए है और एक प्रति विद्यालय के कार्यालय के लिए। राधेश्याम जी को देंगे तो वे आपको ज्वाइन करा लेंगे। 

अपनी तात्कालिक सफलता के नशे में मुझे शुक्ला आचार्य जी के जीवन की विडम्बना पर उस समय तो हंसी अाई लेकिन बाद में उन्हें एक हाथ से धोती का सिरा और साइकिल का हैंडल संभालते और (शायद बवासीर के प्रकोप के कारण) एक कूल्हा उठाए टेढ़े होकर साइकिल जोतते देखकर मन करुणा से द्रवित हो जाता था। भंवर मेघवंशी जी की आत्मकथा में RSS को कई बार ब्राह्मणवादी संगठन कहा गया है। लेकिन यहां तो ब्राह्मण भी संघ के शोषण और उत्पीड़न का शिकार हो रहा था। फिर संघ ब्राह्मणवादी कैसे हुआ? पिता जी एक छुट्टा भैंसे की कहानी सुनाते थे जिसमें एक चतुर किसान जाड़े के मौसम  में उस भैंसे को बीड़ी पिलाकर मुंह अंधेरे पुर (रहट) में नाध देता था और उजाला होने और बीड़ी का नशा उतरने से पहले मतलब भर की सिंचाई कर लेता था। शुक्ला जी जाति, धर्म, विद्वता, आचार्यत्व के नशे में संघ की गुलामी में जोते गए मजूर थे। रिक्शा चलाने वाले मजूर से भी बदतर परिस्थितियों में कार्यरत थे लेकिन उन्हें अपने शोषण की कोई खबर नहीं थी।
मैंने देखा कि कर्मचारी के शोषण का यह तरीका तो पूंजीवाद की विशेषता है। श्रम का उचित मूल्य न देकर ही तो सारे पूंजीवादी ढांचे खड़े हुए हैं। संघ परिवार की कितनी ही संस्थाएं मुफ्त के श्रम की पूंजी से बनी हैं। इसलिए मैं भंवर जी के निष्कर्ष में यह जोड़ना चाहता हूं कि RSS ब्राह्मण आधिपत्य वाला एक पूंजीवादी संगठन है। 
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ब्राह्मणवादी RSS पूंजीवादी कार्यशैली से गठजोड़ के बाद जब बलवान हो जाता है तब वह अपने फासीवादी एजेंडे को लागू करने लगता है। नागरिकता संशोधन विधेयक इसका ताज़ा उदाहरण है। भारत में यातना शिविरों की स्थापना की तैयारी शुरू की जा चुकी है। यह मनुष्यता के ह्रास का दौर है जिससे गुज़र कर ही खुद को बचाना हमारा कर्तव्य है।
नियुक्ति पत्र हासिल कर लेने के बाद सोमवार उस पर अमल करने का दिन था। मैं विद्यालय पहुंचा। शुक्ला जी बड़े बाबू की भूमिका में और राधेश्याम तिवारी जी कार्यालय प्रमुख की भूमिका में थे। मैं तो खैर विजेता था ही। मेरी सफलता पर राधेश्याम जी ने बधाई दी और स्वागत किया लेकिन शुक्ला जी उदासीन रहे - बिल्कुल बड़े बाबू की तरह। राधेश्याम जी को उसी समय एक कक्षा में पढ़ाने जाना था, वे चले गए तो शुक्ला जी ने धीमी किन्तु चुनौतीपूर्ण आवाज में मुझसे कहा - आपको अपना पहनावा बदलना होगा आलोक जी। धोती पहन लेते हैं? सच कहता तो मेरा जवाब हां होता। मुझे धोती पहननी आती थी और मैं घर पर धोती पहनता भी था। (अब भी पहनता हूं। बनियान और धोती मेरी प्रिय पोशाक रही है। पिछले दिनों गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. रामनरेश राम जी ने मेरे पुराने घर के गिरने की फेसबुक पर तस्वीर देखने के बाद फोन किया तो पिछले दिनों की स्मृति खंगालते हुए उन्होंने यही याद दिलाया कि उस पुराने घर में जब वे पहली बार आए थे तो मैं बनियान और धोती पहने हुए था।)
लेकिन उस समय मैंने शुक्ला जी के प्रश्न का उत्तर देने के बजाय उल्टे उनसे प्रश्न किया कि धोती पहनने से मेरी नियुक्ति का क्या संबंध है। वे मेरी मूर्खता पर कुछ देर मुस्कराते रहे। उस मुस्कान पर मैं क्या न्योछावर करता कि वे इस रहस्य पर से (धोती का) पर्दा हटाते। उन्होंने फौरन कुछ नहीं बताया। बस यही कहा कि प्रधानाचार्य जी ने पहले इस पर आपसे चर्चा नहीं की थी? मैंने कहा - जी नहीं। उन्होंने कहा - अभी वही बताएंगे आपको। ऐसा कहकर वे पुनः अपनी खाताबही में लीन और मेरी ओर से मौन हुए।

प्रधानाचार्य श्री राधेश्याम तिवारी जी कक्षा से लौटे तो बड़े बाबू शुक्ला आचार्य जी ने उनसे धोती कुर्ता वाली बात की। उन्होंने कहा - अरे, उसमें कोई समस्या नहीं है। थोड़े दिनों में अभ्यास हो जाएगा। मेरे कुर्ते धोती का एक सेट यहां कार्यालय में रखा ही रहता है, जब तक आलोक जी खुद खरीद नहीं लेते तब तक मेरा पहनेंगे। फिर शुरू में अगर बाहर थोड़े दिन अटपटा लगे तो ये भी अपना कुर्ता धोती यहीं कार्यालय में रख देंगे। यहां सुबह बच्चों के आने से पहले, जल्दी आकर पहन लिया करेंगे। 

उनके इन प्रस्तावों पर मुझे मन ही मन हंसी आ रही थी, लेकिन मैंने अपने चेहरे पर क्रोध के भाव प्रकट किए और पूछा कि धोती कुर्ता पहनना जरूरी क्यों है? मेरी नियुक्ति अंग्रेजी और हिंदी पढ़ाने के लिए हो रही है, मैं संस्कृत का आचार्य नहीं हूं जो धोती पहनकर पढ़ाऊं। मुझे धोती पहनना आता है और मेरे पास धोती है भी, लेकिन सवाल यह है कि धोती पहनकर पढ़ाने की जरूरत क्या है? जब बच्चे पैंट शर्ट पहन ही रहे हैं तो अध्यापक के लिए धोती कुर्ता क्यों? 

मैं राधेश्याम जी से किसी तर्कपूर्ण उत्तर की मांग कर रहा था लेकिन उन्होंने यह कहकर मुझे निराश कर दिया कि ऐसा प्रांतीय कार्यालय, गोरखपुर द्वारा जारी विद्या भारती की अध्यापक नियमावली में लिखा है और आपकी नियुक्ति की शर्त ही यही है कि आप उक्त नियमावली में दिए गए सभी नियमों का पालन करने पर सहमत हैं। मैंने कहा कि वह नियमावली कहां है, मुझे दिखाइए। उन्होंने कहा कि नियमावली जिला कार्यालय में होगी। आप गए थे, वहां आप चाहते तो देख सकते थे। मैंने कहा - कोई बात नहीं प्राचार्य जी, शुक्ला जी डाक लाने वहां जाते ही रहते हैं, उनसे मंगवा लीजिए, कल उसे पढ़ कर मैं फिर अपना विचार आपको बताऊंगा। मैं देखना चाहता हूं कि और क्या- क्या नियम उस नियमावली में हैं। सिद्धान्त तौर पर राधेश्याम जी और शुक्ला जी दोनों ही मेरी मांग से सहमत थे लेकिन व्यवहार में वे मेरी मांग पूरी नहीं कर सके। मैंने दो दिन इंतज़ार किया। बुधवार को फिर स्कूल के कार्यालय में पहुंचा। आज शुक्ला आचार्य जी कक्षा में पढ़ाने गए थे और कार्यालय में प्रधानाचार्य राधेश्याम जी अकेले थे। इस अवसर का उपयोग उन्होंने मुझे भावनात्मक रूप से प्रभावित करने में किया। उन्होंने संघ परिवार की कई ऐसी विशेषताएं बताईं जिनका मेरे लिए कोई मूल्य नहीं था। उनमें से एक बात थी - वरिष्ठ सहकर्मियों के साथ कंधे पर हाथ रखकर बात करने का अवसर। उनका कहना था कि किसी और संस्था में ऐसा व्यवहार आपको नहीं मिलेगा। राधेश्याम जी एक बुद्धिमान व्यक्ति थे। यह जानने के बाद कि मैं विचार से प्रगतिशील और तर्कशील व्यक्ति हूं, उन्होंने मुझे मेरे ही अस्त्र से पराजित किया।  

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महात्मा गांधी से मुझे हमेशा बड़ा लगाव रहा और गांधी जी को धोती से। वही धोती आज मेरे और रोजगार के बीच में सेतु भी बन सकती थी और दीवार भी। मैंने सेतु को चुना। मैंने धोती पहनकर पढ़ाना स्वीकार कर लिया। (इस समय यह लिखते हुए भी सूती धोती पहने हूं।) 

यह एक व्यावहारिक फैसला था। दुनिया में फिट होने की हारी हुई कोशिश थी। एक प्रगतिशील युवा की नज़र से यह एक अवसरवादी समर्पण था। लेकिन उससे पहले यह तार्किकता की जीत भी थी। यह सच है कि मैं विद्या भारती के शिक्षकों की सेवा नियमावली नहीं देख सका, आज तक नहीं। पराजय की बात बस यहीं तक थी। इसके आगे धोती के विरोध में कोई मजबूत तर्क मेरे पास नहीं था। इसलिए नैतिक रूप से मेरे भीतर विरोध करने का बल नहीं रहा। इसी के साथ यह उम्मीद बंधी कि अब मास्टरी हाथ में होगी। अब और अनिश्चय में रहकर मैं इस मौके को गंवाना नहीं चाह रहा था, इसलिए खुलकर राधेश्याम जी से कहा - ठीक है, मैं धोती कुर्ता पहन कर पढ़ाने को तैयार हूं। 

मेरी सहमति लेने के बाद प्रधानाचार्य जी और शुक्ला आचार्य जी ने मुझे विद्यालय ज्वाइन कराने की औपचारिक प्रक्रिया शुरू की। राधेश्याम जी ने जब फिर से मुझे एक आवेदन पत्र नुमा कागज तैयार करने को कहा तब मुझे खीझ हुई। बेमन से मैंने वह आवेदन लिखा। यह आवेदन उन्होंने शिशु मंदिर के स्थानीय प्रबंधक/ अध्यक्ष को संबोधित कराया था और इसमें अपना नियुक्ति पत्र प्रस्तुत करते हुए आचार्य उपस्थिति पंजी में हस्ताक्षर करने देने की अनुमति मांगी गई थी। मैंने कहा कि पंजी तो आपके पास ही है और प्रधानाचार्य होने के नाते विद्यालय के मुखिया भी आप हैं फिर यह आवेदन किसे दिया जाएगा। जवाब में राधेश्याम जी ने कहा कि यह औपचारिकता है, इसे पूरा करना होता है। विद्यालय की एक प्रबंध समिति है उसकी सहमति ली जाती है। मैं शाम को सोराम जाकर यह कार्य करा लूंगा। आप कल आएं। 

अब एक दिन के लिए मुझे एक ऐसी नौकरी का इंतजार करना था जिसकी तनख्वाह का कुछ अता पता नहीं था। लेकिन अनुमान था कि पांच या छह सौ रुपए महीने का आसरा हो सकता है। अगला दिन आया और मैं भी विद्यालय के कार्यालय पहुंचा। महुआ के टेढ़े पेड़ के नीचे अपनी साइकिल को टेढ़ी करके खड़ी करते समय कार्यालय में अपनी कुर्सी से खड़े होते प्रधानाचार्य जी की टेढ़ी मुस्कान का अंदाजा तब मुझे नहीं था। मुझे आता देखकर राधेश्याम जी कार्यालय से निकलकर एक कक्षा में जाने लगे। मैंने उन्हें रोका नहीं, जाने दिया। लेकिन तभी उन्होंने मुड़कर मुझे देखा और हाथ से कार्यालय में बैठने का इशारा किया। कार्यालय में और कोई नहीं था। मैं उसी भाव से एक कुर्सी पर बैठ गया जिस भाव से गंभीर रोगों के मरीज़ विशेषज्ञ डाक्टरों की ओपीडी के बाहर बैठे रहते हैं। उम्मीद और नाउम्मीदी के बीचोबीच, जिसमें मरीज़ की उम्मीद डॉक्टर के रुख की मोहताज होती है। प्रधानाचार्य जी के रुख का मोहताज मैं कार्यालय की भीतरी दीवार पर चिपके अशुद्ध वर्तनी वाले नारों के पोस्टर पढ़ रहा था और मन में तय कर रहा था कि बच्चों को सबसे पहले हिन्दी शब्दों की सही वर्तनी सिखाना है। इन पोस्टरों को बदलने के बजाय अगर बच्चों से ही इनमें सुधार करवाया जाए तो इसका असर ज्यादा होगा। इस कमरे में बैठने वाले शुक्ला जी और राधेश्याम जी के ज्ञान का स्तर इतना बुरा तो नहीं होना चाहिए कि वे बच्चों द्वारा बनाए गए पोस्टरों में शब्दों की इन अशुद्धियों को ठीक न करा सकते हों। मैंने अनुमान लगाया कि ये लोग दूसरे कामों में इस कदर व्यस्त रहते हैं कि शायद इन्हें अब तक इन पोस्टरों पर नज़र डालने का ही मौका नहीं मिला। 

मुझे बहुत ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा। कुछ कांखते, कराहते हुए शुक्ला जी कमरे में आए। उनके आने पर मैं खड़ा नहीं हुआ क्योंकि कुछ असभ्यता, उजड्डता के असर के कारण और कुछ अब उन्हें अपना समकक्ष सहकर्मी समझने के कारण मुझे कुर्सी से खड़ा होना बेकार लगा था। शुक्ला जी ने सिसकारी भरी ध्वनियों के बीच एक उलझन और अनिश्चय भरी नकुआती आवाज में कहा - आपका काम शायद हुआ नहीं भाई साहब। कई दिनों से मैं इस संस्था की विचित्र कार्यशैली को करीब से देख रहा था, इसलिए मुझ पर शुक्ला जी की बात का कोई गहरा असर नहीं हुआ। मैंने उन्हें बस जरा हेय दृष्टि से देखा। वे कुछ गुनगुनाने या मुनमुनाने लगे। मैंने उनका ध्यान पोस्टरों की अशुद्ध वर्तनी की तरफ खींचा तो लापरवाही से हंसते हुए बोले कि बच्चे हैं। इतना ही काफी है। मैंने इसका मतलब यह समझा कि इन्हें शिक्षा के श की भी समझ नहीं है। मन कड़वा हो गया। इसी कड़वेपन के बीच प्रधानाचार्य राधेश्याम जी कार्यालय में दाखिल हुए। मैंने उन्हें बस इसलिए नमस्ते किया ताकि वे मेरी नियुक्ति के मामले पर सीधे सीधे मुझे बताएं। लेकिन वे मौन रहे। अपनी कुर्सी पर बैठने के बाद वे एक पश्चाताप भरी मुस्कान के साथ मुझे निहारने लगे। मुझे यह उनकी कुटिलता जान पड़ी। फिर भी मैंने धैर्य धरा और कुछ वैसी ही प्रतिक्रिया देने की कोशिश की लेकिन दे नहीं पाया क्योंकि तब तक मुझे (कृत्रिम तौर पर) मुस्कुराना नहीं आता था।

कुछ देर की चुप्पी के बाद गहरी सांस लेकर राधेश्याम जी ने बिल्कुल अपरिचित व्यक्ति वाले अंदाज़ में कहा - और, कैसे हैं आलोक जी? यह बिल्कुल अप्रत्याशित बातचीत थी। अब मुझे शुक्ला जी द्वारा व्यक्त अंदेशे के गंभीर मर्म का आभास हुआ। मेरी दशा दीन हीन हो चली। मुंह से कुछ निकल नहीं पा रहा था। फिर भी पूरा साहस बटोरकर पूछा - मैं उपस्थिति पंजी पर हस्ताक्षर करूं? इस सवाल के जवाब में प्रधानाचार्य जी बिल्कुल बेशर्मी से मुस्कुराने लगे और नकारात्मक तरीके से सिर हिलाया। कुछ देर ऊं... की ध्वनि के बाद बोले - अभी यहां आचार्य का पद रिक्त नहीं है। प्रबंधक जी ने अभी आपको नियुक्त करने से मना किया है। मैंने पूछा कि मेरा आवेदन और नियुक्ति पत्र कहां है तो उन्होंने एक फाइल में से निकालकर मुझे दिखा दिया। मेरे आवेदन और नियुक्ति पत्र दोनों ही कागजों पर टेढ़े अक्षरों में बड़े बेडौल तरीके से लिखा था - 
"नियुक्ति निरस्त।"
***** पांडेय 

यह प्रबंधक महोदय के हस्ताक्षर थे। उनका नाम लिख पाने का साहस अभी मुझमें नहीं है। लेकिन वे रामभक्त थे। जब तक अयोध्या में रामलला का मंदिर न बन जाए तब तक दाढ़ी और बाल न कटवाने की कसम उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय खायी थी लेकिन कुछ वर्षों के भीतर ही उन्होंने इस प्रतिज्ञा को वैसे ही भुला दिया जैसे उनके बड़े नेतागण चुनावी वादों को भुला देते हैं या फिर उन्हें जुमला घोषित कर देते हैं। 
मेरी नियुक्ति को निरस्त करने का अधिकार उन्हें था या नहीं, यह प्रश्न आज तक अनुत्तरित है। जिला मंत्री के हस्ताक्षर लेने में मिश्रा जी ने जो स्वामिभक्ति खर्च की थी, उसका क्या कुछ भी मूल्य नहीं था? यह स्कूल विद्या भारती से संबद्ध था भी या नहीं? यह स्कूल ही था या कोई छद्म व्यावसायिक प्रतिष्ठान? कई प्रश्न थे। किसी का कोई उत्तर नहीं हो सकता था। आरएसएस उत्तर देने के लिए नहीं है। भंवर मेघवंशी जी के
इस निष्कर्ष को मैं हूबहू स्वीकार करता हूं। हालांकि मैंने उस दिन प्रधानाचार्य जी को उन्हीं के कार्यालय में भरपूर लताड़ा। मैंने पूछा कि आप बच्चों को क्या अनुशासन सिखाते होंगे जब आप खुद अपने ही जिला कार्यालय द्वारा जारी नियुक्ति संबंधी आदेश का पालन नहीं कर रहे हैं। जब पद रिक्त ही नहीं था तो आपने मुझे जिला कार्यालय क्यों भेजा था? आपके जिला मंत्री यदि पूछें कि आपने जिला कार्यालय द्वारा चयनित और नियुक्त आलोक को ज्वाइन क्यों नहीं कराया तो आप क्या जवाब देंगे? 

राधेश्याम तिवारी असहाय होकर मुझे देख रहे थे। मैं उनसे आधी उम्र का लड़का था, मुश्किल से अठारह साल का। और उन्हें झकझोर कर लताड़ रहा था। वे मुझे डांट कर भगा सकते थे, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। मैंने उनसे अपना नियुक्ति पत्र और आवेदन पत्र मांगा तो उन्होंने दे दिया, यह भी उनकी भलमनसाहत ही थी। उन्हें असहाय और असहज स्थिति में देखना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। मैंने कागज लिए और उबलते दिमाग के साथ बाहर निकल आया। 

घर आकर पिताजी की खूब लानत मलामत की। यह मेरी जीत और उनकी हार थी। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था। मैंने दोनों कागज़ सामने रख दिए जिनमें नियुक्ति निरस्त की ऐतिहासिक इबारत लिखी थी। पिताजी ने फौरन एक लोकतांत्रिक सलाह दी कि इसकी लिखित शिकायत फूलपुर जिला कार्यालय को इन कागजात की फोटोकॉपी के साथ करो। मैंने वैसा ही किया लेकिन जैसा भंवर मेघवंशी के साथ हुआ था, वैसा ही मेरे भी साथ हुआ। शिकायत का कोई जवाब नहीं। यह विशिष्ट RSS  कार्यशैली है। 

बहरहाल, बाद के दिनों में इस "नियुक्ति निरस्त" प्रकरण के तीन कारण मेरी समझ में आए - 

१. मैं ब्राह्मण नहीं था। विद्यालय में ब्राह्मण और क्षत्रिय बच्चे भी पढ़ते थे। आरएसएस की परंपरानुसार आचार्य के पैर छुए जाते हैं। तो यह उनका एक धर्मसंकट था।

२. यदि मुझे अध्यापक रखा जाता तो विद्यालय द्वारा आचार्यों को दिया जाने वाला वेतन गोपनीय न रह जाता। मैं आरएसएस / भाजपा का आदमी नहीं था, विश्वसनीय नहीं था। ऐसे में ब्राह्मण बनिया प्रबंधन की घोटालेबाजी के पर्दाफाश का खतरा था। 

३. यदि मैं स्कूल में पढ़ाने लगता तो कई ट्यूशन मुझे मिल जाते, इसका सीधा नुकसान कस्बे में ट्यूशन पढ़ाने वाले दो ब्राह्मण मास्टरों को होता। यह व्यावसायिक हितों का मामला था। 

बस इतना ही मुझे समझ में आया।

*****

Monday, April 22, 2019

मुसीबतज़दा औरत की डायरी


मुसीबतज़दा औरत की डायरी
 (सिमोन द बुववार की कहानी वूमन डिस्ट्रॉएड के एक अंश का हिंदी अनुवाद)
अनुवादक : आलोक कुमार श्रीवास्तव


सोमवार 13 सितम्बर, ले सैलाइंस
एक गाँव के किनारे वीराने में बसे और सदियों से समय के प्रवाह से बेअसर इस कस्बे का नज़ारा अद्भुत है। घुमावदार रास्ते पर कुछ दूर चलने के बाद मैं सदर इमारत की सीढ़ियाँ चढ़ गयी और देर तक इन वास्तु-संरचनाओं के वैभव को निहारती रही, जो बनायी तो किसी ख़ास मक़सद से गयी थीं मगर उनका कभी कोई इस्तेमाल नहीं हुआ। ठोस, मजबूत और असली होने के बावजूद, इन इमारतों का खाली पड़ा रहना हमें अचरज में डालता है अपने वीरानेपन के कारण ये विलक्षण दिखाई देती हैं। स्वच्छ आकाश तले बिछी घास की मुलायमियत और ज़मीन पर झड़ी सूखी पत्तियों की गंध ने मुझे इस बात का एहसास कराया कि मैं इसी दुनिया में हूँ, किसी कल्पनालोक में नहीं। वहीं खड़े-खड़े मैं दो सौ साल पीछे अतीत में चली गयी थी। मैं कार के पास गयी और गाड़ी में रखा सामान निकाल लायी ज़मीन पर कम्बल बिछाया, ट्रांज़िस्टर चलाया और मोज़ार्ट का संगीत सुनते हुए सिगरेट पीने लगी। मैंने देखा कि इक्का-दुक्का लोग गाड़ियों में अपने-अपने काम पर जा रहे थे। एक बड़े दरवाज़े के सामने एक ट्रक रुका और मज़दूरों ने दरवाज़ा खोलकर उसके पीछे बोरे लादे। इसके अलावा वहाँ कोई और आवाज़ नहीं हुई जिससे कि उस दोपहर के शांत वातावरण में कोई खलल पड़ती। फिर मैं काफी दूर एक अनजान नदी के किनारे तक निकल गयी जहाँ उस समय मेरे; और नदी किनारे के पत्थरों के अलावा कोई नहीं था। उन पत्थरों की ही तरह मैं अपनी ज़िंदगी से बड़ी दूर निकल आयी थी और उनके संग मिल गयी थी।
कितना अजीब है कि मैं ऐसी जगह पर हूँ और उससे भी ज्यादा अजीब है मेरा यहाँ आकर खुश होना। जब मैं पेरिस में थी तो मैंने इस यात्रा के एकांत के बारे में सोचा भी नहीं था। अब तक अगर मॉरिस नहीं होते तो बेटियाँ ही मेरी हरेक यात्रा में मेरे साथ रहतीं। मुझे लगा भी था कि इस यात्रा में मुझे कोलेट की खिलखिलाहट और लूसिएन की फरमाइशों की कमी महसूस होगी। और यहाँ खुद मुझे ही मानों अतीत के दिनों से निकली एक उपेक्षित किस्म की खुशी वापस मिल गयी है। आजादी मिल जाने पर मेरी हालत ऐसी हो जाती है मानों मैं अभी बीस साल की ही होऊँ बिलकुल वैसे ही जैसे जब मैं बीस साल की थी तब सिर्फ खुद को समय देने के लिए मैंने जो किताब लिखनी शुरू की थी, उसे छोड़ दिया था।
मॉरिस से विदा लेते समय हमेशा मेरा मन भारी हो जाता है। हालांकि सम्मेलन केवल एक हफ्ते चलेगा, फिर भी मोज़िस से नीस एयरपोर्ट जाते समय मेरा गला भर आया था। उनका भी यही हाल था। जब लाउडस्पीकर पर रोम जाने वाले यात्रियों की पुकार हुई तब उन्होंने मुझे कसकर भींच लिया। मैंने कहा – इस तरह सरेआम जान मत दो। उन्होंने कहा - प्लेन में संभलकर जाना। मेरी नज़रों से ओझल होने से पहले वो एक बार फिर मुझे देखने के लिए मुड़े। मैंने देखा कि उनकी आँखों में मेरी फिक्र थी।
प्लेन का टेक-ऑफ मुझे बड़ा नाटकीय लगा। चार इंजन वाले विमानों में टेक-ऑफ करते समय बहुत ज्यादा आवाज़ नहीं होती, लेकिन इस जेट ने बहुत ज़ोर की आवाज़ के साथ जमीन छोड़ी, जैसे आखिरी सलामी दे रहा हो।
फिलहाल तो मैं खुशी के समंदर में गोते लगा रही हूँ। बेटियों की अनुपस्थिति से मैं ज़रा भी उदास नहीं हुई – बल्कि बिल्कुल उलटा हुआ। मैं जितनी तेज़ चाहूँ उतनी तेज़ गाड़ी चलाऊँ, जितनी चाहूँ उतनी धीमी, जहाँ मन करे वहाँ रुक सकती हूँ। मैंने सोचा था कि इस हफ्ते बस घूमूँगी। इसलिए उजाला होते ही उठ जाती हूँ। बाहर किसी वफादार जानवर की तरह ओस से गीली कार खड़ी रहती है। मैं इसके शीशे पोंछकर उत्साह से भरी हुई उगते हुए सूरज की रोशनी के बीच इसे लेकर निकल जाती हूँ। गाड़ी में मेरे साथ सफेद थैला है जिसमें मिशेलिन का नक्शा, कुछ किताबें, एक कार्डिगन और सिगरेट हैं। सिगरेटें मेरी मौन सहचर हैं। यहाँ जिस छोटे-से होटल में मैं ठहरी हूँ, उसकी मालकिन से खाने का बिल माँगने पर वह नाराज़ नहीं होती।
दिन डूबने वाला है, मगर फिज़ां में अभी भी उत्साह है। यही वो कुछ दिलकश पल होते हैं जब क़ायनात इंसानी दुनियां से इस कदर एकमेक रहती है कि ऐसा मानने को जी ही नहीं करता कि वे खुश नहीं होंगे।

मंगलवार 14 सितम्बर
ज़िंदगी के प्रति मेरा समर्पण मॉरिस को बड़ा अच्छा लगता था। स्वयं से संवाद (एकांतवास) की इस छोटी-सी अवधि के दौरान यह फिर से प्रकट हो उठा है। अब जबकि कोलेट की शादी हो चुकी है और लूसिएन अमेरिका में है, मेरे पास इसे संवारने के लिए खूब समय है। मोज़िस में मॉरिस ने मुझसे कहा था, तुम अकेली ऊब जाओगी। तुम्हें कोई नौकरी ढूँढनी होगी। वह बार-बार यही बात कहते रहे थे। लेकिन मुझे कोई नौकरी नहीं करनी है। जो भी समय मेरे पास है, उसमें से कुछ समय मैं खुद अपने लिए जीना चाहती हूँ। मॉरिस और मुझे - हम दोनों को – इस एकांत का अच्छे से अच्छा इस्तेमाल करना है। हम दोनों ही इस एकांत से लम्बे समय से वंचित रहे हैं। मेरे दिमाग में तो इसको लेकर ढेरों योजनाएं हैं।

शुक्रवार 17 सितम्बर
मंगलवार को मैंने कोलेट को फोन किया। उसे ज़ुकाम था। जब मैंने कहा कि मैं वापस पेरिस चली आती हूँ तो उसने मुझे मना किया और बताया कि जीन-पियरे उसकी देखभाल ठीक से कर रहा है। लेकिन मुझे फिक्र हो रही थी इसलिए मैं उसी दिन लौट आयी। मैंने देखा कि वह काफी दुबली हो गयी थी और बिस्तर पर ही थी। उसे रोज़ शाम को बुखार आ जाता है। अगस्त में जब मैं उसके साथ पहाड़ पर गयी थी, तब भी मुझे उसकी सेहत की बड़ी चिंता थी। मैं मॉरिस के आने तक का इंतज़ार नहीं कर सकती, बल्कि मॉरिस से कहती हूँ कि वह टैल्बट को कह दें कि वह आकर देख जाए।
यहाँ मेरे ऊपर एक और आश्रिता की जिम्मेदारी है। बुधवार को डिनर के बाद जब मैं कोलेट के यहाँ से निकली तो मौसम इतना बढ़िया था कि मैं ड्राइव करते हुए लैटिन क्वार्टर तक चली गयी। एक कैफे के टैरेस पर बैठकर मैं एक सिगरेट पी रही थी। बगल की मेज पर बैठी पंद्रह-सोलह साल की एक लड़की ललचायी नज़र से मेरी जेब में रखी चेस्टरफील्ड्स सिगरेट के पैकेट को देख रही थी। उसने मुझसे एक सिगरेट माँगी। मैंने उससे बात करने की कोशिश की लेकिन वह मेरे प्रश्नों को टाल गयी और जाने के लिए उठ खड़ी हुई। तकरीबन पंद्रह साल की उस लड़की में अब मेरी दिलचस्पी बढ़ गयी थी, जो न तो स्टूडेंट थी और न ही सेक्स वर्कर। मैंने उससे कहा कि मैं तुम्हें अपनी कार में तुम्हारे घर तक छोड़ देती हूँ। पहले तो उसने इनकार किया, कुछ बताने से हिचकिचाती रही मगर अंत में उसने स्वीकार कर लिया कि उसका कोई घर नहीं है। वह उस रोज़ सुबह उस सेंटर (अनाथालय) से भागी थी जहाँ उसे पुलिस वालों ने रखवाया था। दो दिन तक मैंने उसे यहाँ अपने पास रखा। उसकी माँ दिमागी तौर पर कमज़ोर हैं और उसके सौतेले पिता उससे नफरत करते हैं। दोनों ने उसे छोड़ दिया है। उसके केस को देख रहे जज ने उससे वादा किया है कि वह उसे किसी ऐसे घर में भेज देंगे जहाँ उसे कोई काम सिखाया जाएगा। इस दौरान पिछले छ: महीने से वह अस्थायी तौर पर इस सेंटर (अनाथालय) में रह रही थी, जहाँ से वह केवल रविवार को चर्च जाने के लिए बाहर निकल पाती थी और वहाँ भी उसे कुछ करने नहीं दिया जाता था। इस केंद्र में लगभग चालीस ऐसी लड़कियाँ हैं जिनकी देखभाल तो ठीक तरह से होती है और शारीरिक रूप से वे ठीक दिखती हैं लेकिन मानसिक तौर पर वे ऊब, थकान और निराशा की शिकार हैं। रात को उन्हें नींद की एक-एक गोली दी जाती है। उसे वे किसी तरह बचा कर रख लेती हैं और किसी दिन इस तरह बचाकर रखी गयी सभी गोलियों को एक साथ निगल जाती हैं। मार्गुरीट ने मुझे बताया कि ऐसा वे इसलिए करती हैं ताकि जज का ध्यान उन पर जाए। जज उसी लड़की के मामले को निपटाने पर ध्यान देते हैं जो या तो यहाँ से भागने की कोशिश करे या फिर आत्महत्या की। भाग निकलना आसान है; अक्सर लड़कियाँ भाग जाती हैं; और अगर वे कुछ समय बाद पकड़ ली गयीं तो उन्हें कोई सज़ा नहीं दी जाती।
मैंने उससे वादा किया कि मैं उसे किसी घर में भिजवाने की हर कोशिश करूँगी। इस पर वह वापस उसी केंद्र में जाने को तैयार हो गयी। जब वह दरवाज़े से बाहर जाने लगी तो उसके झुके हुए सिर और उसकी काँपती हुई टाँगों को देखकर मेरा मन व्यथित हो उठा। मुझे  सिस्टम पर बड़ा गुस्सा आया। एक लड़की जो शक्ल-सूरत से लेकर समझदारी और बात-व्यवहार, हर चीज़ में अच्छी है, उसकी जवानी टुकड़े-टुकड़े करके बरबाद हो रही है। वह काम करना चाहती है। वह और उसके जैसी हजारों लड़कियाँ... वे काम माँग रही हैं। कल मैं जज बैरन को फोन करके इस मुद्दे पर बात करूँगी।
पेरिस कितना बेरहम शहर है ! इतना कि इन राहत देने वाले दिनों में भी इसकी बेरहमी का बोझ मुझे दबाये जा रहा है। आज की शाम मैं अजीब निराशा से घिरी हुई हूँ। मेरा मन है कि बेटियों के कमरे को आरामदेह बैठक में तब्दील कर दूँ क्योंकि अभी या तो मॉरिस के कंसल्टिंग रूम में या फिर वेटिंग रूम में बैठना पड़ता है। लूसिएन अब यहाँ नहीं रहेगी। घर शांत तो रहेगा, मगर बहुत खाली-खाली भी लगेगा। लेकिन सबसे ज्यादा चिंता मुझे कोलेट के बारे में हो रही है।

बुधवार 22 सितम्बर
मैं कोई नौकरी इसलिए नहीं करना चाहती ताकि जिन्हें मेरी ज़रूरत है, उनके लिए मैं पूरी तरह उपलब्ध रह सकूँ। मेरा ज्यादातर समय कोलेट के बिस्तर के पास गुज़रता है। उसका बुखार नहीं उतर रहा। मॉरिस का कहना है कि चिंता की कोई बात नहीं है। लेकिन टैल्बट जाँच कराना चाहता है। मेरे मन में डरावने विचार आने लगते हैं।
जज बैरन से आज सुबह मेरी मुलाक़ात हुई - बिल्कुल दोस्ताना मुलाक़ात। उनका कहना है कि मार्गुरीट ड्रिन का केस हृदय-विदारक है; और वह अकेली ही नहीं, उसकी तरह हजारों लड़कियाँ हैं। इससे भी दु:खद बात यह है कि इन बच्चों के लिए कोई जगह नहीं बनायी गयी है और इनकी सही तरीके से देखभाल करने के लिए कोई प्रशिक्षित स्टाफ नहीं है। सरकार कुछ करती नहीं है। इसलिए जुवेनाइल अदालतों और सोशल वर्करों की कोशिशों का कोई फायदा नहीं होता। मार्गुरीट जिस सेंटर में ठहरी है, वह सिर्फ एक ट्रांज़िट प्वाइंट है; तीन-चार दिन बाद उसे कहीं और भेजा जाना है। लेकिन कहाँ? कुछ मालूम नहीं। ये लड़कियाँ जिन सेंटरों में ठहरायी जाती हैं वहाँ कुछ काम-धाम या किसी प्रकार के मनोरंजन का कोई इंतज़ाम नहीं होता। मगर फिर भी जज बैरन मार्गुरीट के लिए कहीं इस तरह की जगह तलाशेंगे। उन्होंने कहा है कि वे सेंटर के कर्मचारियों से कहेंगे कि वे मुझे उससे मिलने दें। हालांकि उसके माँ-बाप ने उस पर से अपना हक छोड़ने संबंधी कागज़ पर आखिरी तौर पर दस्तख़त नहीं किए हैं मगर वे बच्ची को वापस लेने आएंगे, ऐसी कोई उम्मीद नहीं है। वे उसे नहीं चाहते और उसके लिए भी यही ठीक रहेगा कि वह उनके पास न रहे।
सिस्टम के नाकारेपन के चलते बदहाल अदालतों से मुझे कोई उम्मीद नहीं रही और मैं वहाँ से बाहर निकल आयी। किशोर अपराधियों की संख्या बढ़ती जा रही है मगर इसे रोकने का कोई उपाय नहीं किया जा रहा है।
जब मुझे ध्यान आया, मैंने खुद को संत चैपेल के दरवाज़े के सामने पाया। भीतर आकर घुमावदार सीढ़ियाँ चढ़ गयी। वहाँ विदेशी पर्यटक और एक पति-पत्नी एक दागदार काँच को हाथ में लेकर देख रहे थे। मैं कुछ समझ नहीं पायी। मैं फिर से कोलेट के बारे में सोच रही थी और चिंतित थी।
अब मुझे बड़ी चिंता हो रही है। पढ़ना मुमकिन नहीं। शायद मॉरिस से बात करके ही दिमाग का बोझ हल्का हो। आधी रात से पहले तो वह आ नहीं पाएंगे। जब से वह रोम से लौटे हैं, शाम का समय टैलबट और कोटोरियर के साथ लैब में ही बिताते हैं। उनका कहना है कि वे लोग सफलता के बहुत करीब पहुँच गये हैं। रिसर्च के लिए सब कुछ छोड़-छाड़ देने वाले व्यक्ति के समर्पण को मैं समझ सकती हूँ। लेकिन मेरी ज़िंदगी में ऐसा पहली बार हुआ है कि मुझे लग रहा है कि वह मुझसे कुछ छिपा रहे हैं।

शनिवार 25 सितम्बर
खिड़की से कोई रोशनी नहीं आ रही थी। मुझे लगा ही था कि अंधेरा होगा। पहले कभी-कभार जब मैं मॉरिस के बगैर अकेले कहीं बाहर जाती थी तो घर लौटने पर लाल परदों के बीच रोशनी की एक पतली-सी लकीर ज़रूर दिखती थी। मैं भागते हुए दो-दो सीढ़ियाँ एक साथ फाँदकर जल्दी से ताला खोलने की उतावली में रहती थी। अबकी बार मैं आराम से सीढ़ियाँ चढ़ी, भागती हुई नहीं गयी। ताले में चाबी लगायी और दरवाज़ा खोला। फ्लैट कितना खाली-खाली लग रहा था ! खाली है भी तो। जिस फ्लैट में कोई है नहीं, वह खाली ही तो होगा। लेकिन बात ये नहीं है। आम तौर पर जब मैं घर आती तो मॉरिस यहाँ ज़रूर होते थे, वो बाहर गये हों तब भी मुझे उनकी मौजूदगी का एहसास रहता था। मगर आज शाम का अनुभव दूसरा है। दरवाज़े खोलने पर आज कमरे बिल्कुल खाली महसूस हो रहे हैं। रात के ग्यारह बज रहे हैं। मॉरिस जो प्रयोग कर रहे हैं, उसका नतीज़ा कल आएगा। मुझे बड़ा डर लग रहा है। मुझे डर लग रहा है और मॉरिस यहाँ नहीं हैं। मैं जानती हूँ कि उनका रिसर्च कामयाब होगा। फिर भी, मुझे उन पर गुस्सा आ रहा है। मुझे आपकी ज़रूरत है, और आप यहाँ नहीं हैं! मन कर रहा है कि सोने जाने से पहले ये बात कागज़ पर लिखकर हॉल में रख दूँ। वर्ना दिमाग इसी में उलझा रहेगा। जब मुझे उनकी ज़रूरत महसूस होती थी, वह मेरे पास हुआ करते थे।
मैंने गमलों में पानी डाला। किताबें झाड़ी-पोंछी। इसी सब में थककर चूर हो गयी। जब मैं उनसे इस बैठक कक्ष को व्यवस्थित करने के लिए कहती थी तो इन कामों में उनकी दिलचस्पी न होने के चलते मुझे अजीब स्थिति का सामना करना पड़ता था। मुझे सच्चाई से जी नहीं चुराना। मैं हमेशा सच ही चाहती रही हूँ और मुझे वह मिला क्योंकि मैं उसे चाहती थी। ख़ैर। मॉरिस बदले हैं। उन्होंने खुद को अपने काम में झोंक दिया है। अब वो किताबें नहीं पढ़ते। अब वो म्यूज़िक नहीं सुनते। हम दोनों जब चुपचाप मोंतेवर्दी या चार्ली पार्कर को सुनते थे तो हम दोनों की चुप्पी और मॉरिस के चेहरे की एकाग्रता मुझे बहुत अच्छी लगती थी। अब हम दोनों एक साथ पेरिस या आसपास घूमने नहीं जाते। देखा जाए तो हम दोनों के बीच अब कोई वास्तविक संवाद नहीं होता। मॉरिस अब अपने सहकर्मियों की तरह मानों मशीन बनते जा रहे हैं – ऐसी मशीन जिसे सिर्फ पैसे छापने के लिए ऑन किया जाता है। ऐसा कहना गलत होगा। वह पैसे या शोहरत के पीछे बहुत नहीं भागते। लेकिन दस साल पहले जब मेरी इच्छा के खिलाफ उन्होंने रिसर्च करने का फैसला किया, तब से धीरे-धीरे (जिसका मुझे डर था) उनका व्यवहार रूखा होता गया है। यहाँ तक कि इस साल मोज़िस में भी मैंने उन्हें अपने से दूर ही पाया – हमेशा खोये-खोये-से, फौरन हॉस्पिटल और लैबोरेटरी लौटने की हड़बड़ी में बेताब, बिल्कुल बदमिज़ाज़। लेकिन यहीं पर मुझे खुद के सामने पूरी सच्चाई रखनी होगी। नीस हवाई अड्डे पर मेरा दिल भारी हो जाने की वजह पहले बीती वे मनहूस छुट्टियाँ थीं। और वीरान समुद्र-तट पर मेरी चहकती खुशी का कारण यह था कि सैकड़ों मील दूर मॉरिस एक बार फिर मेरे नज़दीक थे। (डायरी भी क्या विचित्र चीज़ है : जो बातें हम इसमें लिखते हैं, उससे ज्यादा खास बातें छोड़ देते हैं।) कोई कह सकता है कि मॉरिस को अब अपने व्यक्तिगत जीवन में दिलचस्पी नहीं रही। पिछले वसंत में कितनी आसानी से उन्होंने हमारी आल्सेस यात्रा के लिए मना कर दिया था ! लेकिन मेरी निराशा से उन्हें काफी दुख हुआ। मैंने खुशी जताते हुए कहा था, ल्यूकेमिया का इलाज़ खोजने के लिए कुछ कुर्बानी तो देनी ही होगी। मगर एक समय ऐसा भी था जब मॉरिस के लिए दवा का मतलब था इंसान के शरीर को तकलीफ से राहत दिलाना। कोचीन में पढ़ाई के दौरान, प्रोफेसरों के निस्पृह व्यवहार और विद्यार्थियों के लापरवाह मिजाज़ के चलते मैं इतनी निराश, इतनी हताश रहती थी कि जब उस लम्बे लड़के की गहरी काली आँखों में देखा तो मुझे अपनी ही जैसी वेदना और रोष दिखायी दिए थे। शायद उसी पल मुझे उससे प्यार हो गया था। अब तो मरीज़ उनके लिए सिर्फ केस हैं। मरीज़ को आराम मिले, इससे ज्यादा उनका ध्यान जानकारी इकट्ठी करने में रहता है। यहाँ तक कि अपने करीबी लोगों के साथ भी उनका रिश्ता दूरी वाला होता जा रहा है। यही बंदा था जो पैंतालीस साल की उम्र में जब मैं उससे पहली बार मिली थी, इतना ज़िंदादिल, इतना खुशमिजाज़, इतना जवान था.... हाँ, कुछ तो बदला है। जब से मैं यहाँ उनके बारे में, खुद अपने बारे में, उनकी नामौजूदगी में लिख रही हूँ, कुछ बदलाव महसूस कर रही हूँ। अगर वह ऐसा करते तो मैं खुद को ठगी हुई महसूस करती। हम दोनों ही एक दूसरे के भीतर पूरी तरह देख लिया करते थे।
अब भी हम ऐसा कर सकते हैं; ये तो मेरा गुस्सा है जिसके कारण हम अलग-अलग हैं। बहुत जल्दी ही वह मेरे इस गुस्से को छूमंतर कर देंगे। वह मुझसे थोड़ा और सब्र करने; काम के बोझ के बाद के सुकून भरे, हल्के-फुल्के दिनों के इंतज़ार को कहेंगे। पिछले साल भी वह अक्सर शाम को भी काम करते रहते थे। हाँ, मगर उस समय मेरे पास लूसिएन रहा करती थी। और सबसे बड़ी बात ये कि तब मुझे परेशान करने वाली कोई बात नहीं थी। उन्हें अच्छी तरह पता है कि इस समय मैं न तो मैं कुछ पढ़ सकती हूँ और न ही कोई रिकॉर्ड सुन सकती हूँ क्योंकि मैं डरी हुई हूँ। मैं हॉल में कोई नोट लिखकर नहीं छोड़ूँगी, बल्कि मैं सीधे उनसे बात ही करूँगी। शादी के बीस-बाईस साल बाद भी अगर कोई इतना ज्यादा चुप्पी साधे रहता है तो ये खतरनाक बात है। मेरा ख्याल है कि पिछले कुछ सालों से मैं भी अपनी बेटियों – कोलेट और लूसिएन - में बहुत ज्यादा लगी रही। शायद मॉरिस ने जितना चाहा, मैं उतनी फुरसत नहीं निकाल पायी। उन्हें चाहिए था कि खुद को काम में झोंक देने के बजाय मुझसे यह बात बताते। हम दोनों को मिलकर कोई रास्ता निकालना है।
आधी रात का वक्त है। मुझे फिर से उनसे एकांत में मिलने की ऐसी जल्दी है कि मेरी निगाह घड़ी पर ही टँगी हुई है। घड़ी की सुइयाँ आगे बढ़ती ही नहीं हैं। मुझे जोर का गुस्सा आ रहा है। मेरे दिमाग में बनी मॉरिस की छवि टुकड़े-टुकड़े हो जाती है। जो आदमी अपनी ही बीवी से सही बर्ताव नहीं कर पा रहा, वह दूसरों की बीमारी का इलाज क्या करेगा? यह उदासीनता है। यह संगदिली है। गुस्सा करने का कोई फायदा नहीं। इसे रोकना होगा। अगर कोलेट की जाँच की रिपोर्टें ठीक नहीं आती हैं तो कल मुझे खुद पर काबू करने की अपनी पूरी की पूरी शक्ति की ज़रूरत पड़ेगी। इसलिए अब मैं सोने जाती हूँ।


रविवार 26 सितम्बर
 हो गया। मेरे साथ ये काण्ड हो गया।

सोमवार 27 सितम्बर
हाँ, ये मैं ही हूँ। मेरे ही साथ ये काण्ड हुआ है। बिल्कुल उसी तरह जैसे आम तौर पर होता है। मुझे खुद को इस सच्चाई का सामना करने के लिए तैयार करना है और इसके कारण पैदा हुए उस रोष को दबाना है, जिससे कल का मेरा पूरा दिन बर्बाद हुआ। मॉरिस ने मुझसे झूठ बोला : हाँ, बिल्कुल वैसे ही जैसे और लोग बोलते हैं। मुझे बताए बिना ही मॉरिस यह सब करते रहे होंगे। हालांकि देर हो चुकी है, लेकिन इस ईमानदारी के लिए मैं उनकी एहसानमंद हूँ।
आखिरकार मैं शनिवार को सोने गयी। थोड़ी-थोड़ी देर पर उठकर मैं दूसरे बिस्तर को छूकर देख लेती थी – चादर पर एक भी सिल्वट नहीं। (जब मॉरिस अपने कंसल्टिंग रूम में काम कर रहे होते हैं तब मैं उनसे पहले सोने चली जाती हूँ। सपने में मुझे पानी की धार की आवाज़ सुनायी देती है, यू डी कोलोन की हल्की-सी खुशबू आती है; मैं जाकर देखती हूँ तो वह चादर ओढ़े लेटे हैं। यह देखकर बहुत खुश होती हूँ।) बाहर वाले दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैंने पुकारा - मॉरिस! सुबह के तीन बज रहे थे। तीन बजे तक वे लोग काम नहीं कर रहे होंगे; वे शराब पी रहे होंगे और गपबाजी का रहे होंगे। मैं उठकर बैठ गयी। ये घर आने का वक्त है? कहाँ थे आप?’  
वह कुर्सी पर बैठ गये। उनके हाथ में व्हिस्की का गिलास था।
मुझे मालूम है कि तीन बज रहे हैं।
कोलेट बीमार है, घबराहट के मारे मेरा बुरा हाल है और आप तीन बजे घर आ रहे हैं। आप सब लोग तीन बजे तक काम नहीं कर रहे थे न?’
क्या कोलेट की तबियत बहुत ज्यादा खराब है?’
वह ठीक नहीं है। आपको कोई परवाह ही नही है! मतलब ये कि चूँकि आप पूरी इंसानियत की सेहत पर काम कर रहे हैं इसलिए अपनी बीमार बेटी की फिक्र नहीं करेंगे?’
गुस्सा मत करो। उन्होंने कातर दृष्टि से मुझे देखा। और मैं मानों पिघल गयी, वैसे ही जैसे हमेशा जब वह मुझे अपने आगोश में लेते हैं तब पिघल जाती हूँ। नरम पड़कर मैंने पूछा, बताइए न, आप इतनी देर से घर क्यों आये?’
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।
शराब पी रहे थे? पोकर खेल रहे थे? सब लोग मिलकर कहीं बाहर घूमने गये थे? या आपको वक्त का अंदाज़ा ही नहीं रहा?’ वह चुप ही रहे, मानों यह सायास चुप्पी हो। इस दौरान व्हिस्की का गिलास उनकी उँगलियों के बीच घूमता रहा। मैंने उन्हें अपशब्द इसलिए कहे ताकि उन्हें गुस्सा आये और सफाई में वह कुछ कहें। बात क्या है? क्या आपकी ज़िंदगी में कोई दूसरी औरत है?’
मेरी तरफ अपलक देखते हुए उन्होंने कहा, हाँ मोनीक, मेरी ज़िंदगी में कोई औरत है।
(हमारे सर के ऊपर नीला आसमान था और पैरों के नीचे नीला सागर। हमारे दूसरी ओर  अफ्रीका का सपाट घुमावदार तट था। उन्होंने मुझे अपनी तरफ खींच लिया था। अगर तुमने मुझे धोखा दिया तो मैं अपनी जान दे दूँगा। अगर आपने मुझे धोखा दिया तो मुझे जान देने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। मैं दुख से ही मर जाऊँगी। ये पंद्रह साल पहले की बात है। पंद्रह साल क्या होते हैं? वैसी ही एक गिनती जैसे दो दूने चार। आई लव यू। आई लव यू अलोन। सच नहीं बदलता – वक्त का इस पर कोई असर नहीं पड़ता।)     
कौन?’
नोएल गेरा। 
नोएल! क्यों?’
उन्होंने बस कंधे उचका दिए। जवाब बेशक मुझे पता था – क्योंकि वह खूबसूरत है, तेज़-तर्रार है, चुलबुली है, इस्तेमाल के लिए उपलब्ध है। जिन अदाओं का कोई खास मतलब नहीं होता, लेकिन जो मर्दों को रिझा लेती हैं, वह उसके पास हैं। क्या इन्हें ऐसी कोई ज़रूरत है?
वह मुस्कराए। ये अच्छा हुआ कि तुमने मुझसे पूछा। तुमसे झूठ बोलना मुझे बहुत बुरा लग रहा था।
कब से आप मुझसे झूठ बोल रहे हैं?’
अचानक वह अचकचा उठे। मैंने मोज़िस में तुमसे झूठ बोला था। और जब से वापस आया हूँ, तुमसे झूठ बोल रहा हूँ।
इस बात को पाँच हफ्ते हो गए। क्या मोज़िस में ये उसी के बारे में सोच रहे थे?
जब आप पेरिस में अकेले रुकते थे तब क्या उसके साथ सोते थे?’
हाँ।
आप उससे अक्सर मिलते हैं?’
अरे नहीं। तुम्हें तो पता है कि मैं रिसर्च में लगा हुआ हूँ...
आप ने मुझे तभी क्यों नहीं बताया?’
वे झेंप रहे थे। दुख भरी आवाज़ में बोले, तुम कहा करती थीं कि तुम इस दुख से मर जाओगी...
ये तो कहने की बात है।
उसी पल मेरा मन हुआ कि चिल्ला पड़ूँ कि मुझे इस बात से मरना नहीं है। इस प्रसंग की यह सबसे अफसोसनाक़ बात थी। नीले आकाश तले साथ-साथ अफ्रीका घूमते हुए हमने जो वादे किए थे वो कोरे वादे थे। मैं फिर लेट गयी। इस आघात ने मुझे हिलाकर रख दिया था। इस चोट से मेरा दिमाग भन्ना गया था। मेरे साथ ये क्या हो गया है, इसे समझने के लिए मुझे ज़रा फुरसत और एकांत की ज़रूरत थी। मैंने कहा चलो सो जाते हैं।
गुस्से के कारण मैं जल्दी जाग गयी। सोते हुए ये कितने निष्कपट दिख रहे हैं। नींद में होने के कारण फिर से जवां दिख रहे माथे पर आ गये उलझे बालों में कैसे मासूम दिख रहे हैं। (अगस्त में जब मैं बाहर गयी थी, इनके बगल में वह औरत लेटी रही होगी – इस बात पर मैं यकीन ही नहीं कर पा रही हूँ! कोलेट के साथ मैं पहाड़ों पर घूमने क्यों गयी? कोलेट ने मुझे जाने को बाध्य किया हो, ऐसा नहीं था। बल्कि मैंने ही जाने की ज़िद की थी।) पाँच हफ्तों से ये मुझसे झूठ बोल रहे थे। आज शाम हमने एक महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ाया है। उनकी तरफ से तो ये रिसर्च की बात थी मगर सच्चाई ये थी कि उस समय ये तुरंत नोएल के घर से आ रहे थे। मेरा मन हो रहा था कि इन्हें झकझोरूँ, ज़लील करूँ, इन पर चिल्लाऊँ। पर मैंने खुद को काबू में किया। एक चिट लिखकर अपने तकिए पर रख दिया : शाम को मुलाक़ात होगी। मुझे पूरा यकीन था कि कहने-सुनने से ज्यादा उन पर मेरी नामौज़ूदगी का असर होगा। अगर मैं हूँ ही नहीं तो जवाब किसको दोगे? बिना कुछ सोचे-विचारे मैं निकल पड़ी। सड़क जिधर भी जाती थी, मैं चलती गयी। मुझ पर एक ही धुन सवार थी : इन्होंने मुझे धोखा दिया। मेरे दिमाग में उनकी छवियाँ चुभ रही थीं – वे छवियाँ जिनमें मॉरिस की आँखें नोएल पर जमी हैं, मॉरिस के चेहरे पर मुस्कान है। मैंने उन छवियों को दिमाग से निकाल फेंका। जिस तरह वह मुझे देखते हैं, वैसे उसको नहीं। मैं दुखी नहीं होना चाहती थी; मैं दुखी नहीं हुई; लेकिन मेरा गला कड़वाहट से भर गया। इन्होंने मुझे धोखा दिया। मैंने कहा था, मैं दुख से ही मर जाऊँगी। हाँ, मगर उन्होंने मुझसे यह कहलवाया था। एक दूसरे के प्रति समर्पण के लिए मुझसे कहीं ज्यादा बेताब वह थे। ऐसा रिश्ता जिसमें कोई जोखिम, कोई भटकाव न हो। हम सेंट बर्ट्रेंड-डी-कमिंग्स के पास की छोटी सड़क पर ड्राइव कर रहे थे, तभी इन्होंने मुझसे पूछा था – क्या तुम हमेशा मेरा साथ निभाओगी? जीवन भर सिर्फ मुझसे तुम्हारा काम चल  जाएगा?’ मेरे जवाब में माकूल जोश न देखकर वह भड़क उठे थे। (लेकिन उस पुरानी सराय के हमारे कमरे की स्थिति में भी क्या ही गजब का संयोग था – बीस साल पहले के उस रोज़ से एक दिन पहले की बात है - खिड़की के जरिए मधुमक्खी के छत्ते से आती शहद की गंध के बीच माहौल ज़बर्दस्त था।) मॉरिस मेरे लिए पर्याप्त रहे हैं। मैंने हर पल सिर्फ उन्हीं के लिए जिया है। और सिर्फ एक क्षणिक अनुभव के लिए उन्होंने हमारे वादे के साथ गद्दारी की है। मैंने खुद से कहा, मैं उनके साथ इस रिश्ते को फौरन तोड़ने पर ज़ोर दूँगी...। मैं कोलेट के फ्लैट पर गयी। दिन भर मैं उसकी देखभाल करती रही, लेकिन मेरे भीतर कुछ खौल रहा था। बहुत टूटी हुई मैं घर आयी। मैं इस रिश्ते को खत्म करने के लिए कहने जा रही हूँ। लेकिन पूरी ज़िंदगी प्यार और समझदारी के साथ बिताने के बाद यह कहने का क्या मतलब रह जाता है? जो चीज़ मैंने उनके लिए नहीं चाही, उसे खुद अपने लिए भी कभी नहीं चाहा।
उन्होंने मुझे अपनी बाहों में लिया। वह काफी व्याकुल दिख रहे थे। कोलेट के यहाँ उन्होंने कई बार टेलीफोन किया था और वहाँ से उन्हें कोई जवाब नहीं मिला था। (मैंने फोन की घंटी को बंद कर दिया था ताकि कोलेट को परेशानी न हो।) बेचैनी के मारे उनका दिमाग बेकाबू था।
लेकिन तुम्हें नहीं पता, मैं खुद ये बात तुम्हें बताने वाला था।
‘’मुझे सब पता है।
मैंने उनकी बेचैनी को महसूस किया और गुस्सा हुए बगैर उनकी बात सुनी। झूठ बोलकर उन्होंने बेशक गलती तो की थी लेकिन मुझे इस बात को शुरुआती लापरवाही से समझना था – वह अपनी गलती मानने की हिम्मत नहीं जुटा पाए थे क्योंकि तब उन्हें यह भी स्वीकार करना पड़ता कि उन्होंने झूठ बोला। ऐसे लोग जो वफादारी को जीवन का आदर्श गुण मानते हैं, उनके लिए यह और भी कठिन होता है – लगभग नामुमकिन। हम लोग इसी किस्म के लोग हैं। (मैं खुद क़ुबूल करती हूँ कि किसी झूठ को छुपाने के लिए मैंने भी कोई खतरनाक झूठ बोला होता।) मैंने झूठ को कभी स्वीकार नहीं किया है। लूसिएन और कोलेट ने पहले-पहल जब जब झूठ बोला था तो मैं हक्का-बक्का रह गयी थी। मैं यह यकीन कर ही नहीं पा रही थी कि सभी बच्चे अपनी माँओं से झूठ बोलते हैं। मुझसे नहीं ! मैं वैसी माँ नहीं हूँ जिससे झूठ बोला जाए; मैं वैसी बीवी नहीं जिससे झूठ बोला जाए। यह व्यर्थ मिथ्याभिमान है। सभी स्त्रियाँ यही सोचती हैं कि वे सबसे अलग हैं; कुछ ख़ास हैं; सब यही समझती हैं कि कुछ चीज़ें उनके साथ कभी नहीं होंगी; लेकिन वे सब गलत साबित होती हैं।
आज के दिन मैंने बहुत-सा वक्त सोचने में बिताया है। (क्या संयोग है कि लूसिएन अमेरिका में है। मुझे उससे मदद लेनी चाहिए थी। वह मुझे कभी शांति से न रहने देती।) फिर मैं इसाबेल से बात करने चली गयी। हमेशा की तरह, उसने मेरी मदद की। मुझे डर था कि कहीं वह मेरा पक्ष न समझ पाए, क्योंकि उसने और चार्ल्स ने आज़ादी की शर्त पर शादी की है, मेरी और मॉरिस की तरह वफ़ादारी की शर्त पर नहीं। लेकिन उसने मुझे बताया कि इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ा है – पाँच साल पहले उसे लगा था कि चार्ल्स उसे छोड़ने वाला है। उसने मुझे सब्र रखने को कहा। वह मॉरिस की बहुत इज्जत करती है। उसे यह बात सामान्य लगती है कि मॉरिस ने शौक के लिए ऐसा किया होगा, पहले तो उन्होंने मुझसे छुपाया होगा मगर आखिरकार वो इससे ऊब जाएंगे। इस तरह के रिश्ते बस चार दिन की चाँदनी होते हैं। नोएल भी जब उम्रदराज़ होगी तो मॉरिस की आँखों में उसके लिए जो आकर्षण है, वह जाता रहेगा। लेकिन अगर मैं चाहती हूँ कि इस घटना का हमारे प्यार पर असर न पड़े तो मुझे न तो पीड़ित दिखना चाहिए और न ही झगड़ा करना चाहिए। उसने मुझसे कहा, समझदार बनो, खुशमिजाज़ बनो। और सबसे ज़्यादा ज़रूरी है कि रिश्ते को दोस्ताना रखो। इसी तरीके से उसने अंतत: चार्ल्स को वापस हासिल किया था। सब्र करने के मामले में मैं बहुत अच्छी नहीं हूँ लेकिन मुझे अपनी पूरी कोशिश करनी होगी। सिर्फ रणनीतिक तौर पर ही नहीं बल्कि मुझे ईमानादारी से सब्र रखना होगा। मैं जैसा चाहती थी, मैंने वैसा जीवन जिया। अब मुझे जीवन से समझौता करना होगा। अगर शुरुआती बाधा से ही मैं डगमगा गयी तो मैंने अपने बारे में जो कुछ भी सोच रखा है, सब बेकार चला जाएगा। मैं समझौतावादी नहीं हूँ। मैंने पापा से विद्रोह किया, जिसके लिए मॉरिस मेरी कद्र करते हैं; लेकिन मुझे भी दूसरों को समझना होगा और उनके हिसाब से खुद को ढालना होगा। इसाबेल बिल्कुल ठीक कहती है। शादी के बाईस साल बाद भी विवाहेतर संबंध होना मर्दों के लिए बिल्कुल सामान्य बात है। अगर मैं इसे पचा नहीं पाती तो असामान्य मैं हूँ, मेरा आचरण बचकाना है।
इसाबेल के यहाँ से निकलने के बाद मेरा मन मार्गुरीट से मिलने जाने का नहीं था; लेकिन उसने मुझे एक छोटा-सा मार्मिक पत्र लिखा था और मैं उसे मायूस नहीं करना चाहती थी। विज़िटिंग रूम की मुर्दनी और उन लड़कियों के बुझे-बुझे चेहरे। उसने मुझे खुद के बनाये कुछ चित्र दिखाए। चित्र बढ़िया थे। उसका मन साज-सज्जा का काम सीखने या कम से कम विंडो ड्रेसर बनने का है। इससे उसे सभी आयोजनों के मौके पर काम करने को मिलेगा। मैंने उसे जज द्वारा किए गए वादे के बारे में बताया। मैंने उसे रविवार को अपने साथ ले जाने की अनुमति लेने के लिए जो कार्रवाई की थी, वह सब भी बताया। उसे मुझ पर भरोसा है; वह मुझे बहुत चाहती है; वह सब्र रखेगी और इंतज़ार करेगी लेकिन बहुत ज्यादा समय तक नहीं।
आज शाम मैं मॉरिस के साथ बाहर जा रही हूँ। इसाबेल की सलाह और अखबार में छपने वाले मिस लोनलीहार्ट के कॉलम के मुताबिक, जिसमें बताया गया है कि अपने पति को फिर से हासिल करने के लिए प्रसन्नचित और बन-ठन कर रहें और उनके साथ घूमने जाएं - सिर्फ आप दोनों। मुझे मॉरिस को फिर से नहीं हासिल करना है, मैंने उन्हें कभी खोया ही नहीं। मगर फिर भी मुझे उनसे ढेर सारे सवाल पूछने हैं और पूरी बातचीत तभी सहज तरीके से हो सकेगी जब हम बाहर खाना खाएं। कुल मिलाकर मैं उनके लिए इसे ज़ुर्म कुबूल करने का कोई औपचारिक आयोजन नहीं बनाना चाहती।
एक बात मेरे दिमाग में खटक रही है – उनके हाथ में व्हिस्की का गिलास क्यों था? मैंने बुलाया था – मॉरिस! चूँकि मैं भोर के तीन बजे जगी थी, उन्हें लगा होगा कि मैं उनसे सवाल पूछूँगी। आम तौर पर वह मुख्य दरवाज़ा इतनी ज़ोर से नहीं बंद करते हैं।


मंगलवार 28 सितम्बर
मेरे हिस्से की तमाम ड्रिंक अभी बची हुई थी, मगर मॉरिस ने हँसते हुए मुझे बताया कि मैं नशे में खूबसूरत दिख रही हूँ। कैसी अजीब बात है : हम फिर से जवानीं के ज़माने की रातों का अनुभव कर सकें, इसके लिए मॉरिस को मुझे धोखा देना पड़ा। रोज़-रोज़ का पचड़ा बहुत बुरी चीज़ है। झटके लगने पर आदमी जाग जाता है। सन ’46 से अब के सेंट-जर्मैन-डी-प्रेस में काफी बदलाव आ चुका है। अब यहाँ एक अलग ही किस्म के लोग जाते हैं। ज़रा उदास-से होकर मॉरिस ने कहा – ये दूसरा ही ज़माना है। पिछले करीब पंद्रह सालों से मैंने किसी नाइट क्लब में कदम ही नहीं रखा था, इसलिए मेरे लिए सब कुछ रोमांचक था। हमने डांस किया। नाचते वक्त एक पल ऐसा आया जब उन्होंने मुझे कसकर भींच लिया और कहा, हमारे  बीच कुछ भी तो नहीं बदला है। जो भी जी में आया, हमने हर तरह की बात की। लेकिन चूँकि मैं नशे में थी इसलिए उन्होंने जो कुछ कहा वह मुझे याद नहीं है। कुल मिलाकर वैसा ही हुआ जैसा मैंने सोचा था। नोएल एक बेहतरीन वकील है लेकिन महत्वाकांक्षा की शिकार है। वह ख़ुदमुख़्तार औरत है – तलाकशुदा, एक बेटी की माँ – उन्मुक्त, स्वतंत्र, आधुनिक, हमेशा व्यस्त रहने वाली। मेरे बिल्कुल विपरीत। मॉरिस जानना चाहते थे कि क्या उस किस्म की औरत के लिए वे आकर्षक हो सकते हैं। जब कीयाँ से मेरा प्यार चल रहा था तब मैंने खुद से वह सवाल पूछा था क्या मैं इस किस्म के लड़के को.... मैंने अपनी ज़िंदगी में सिर्फ एक ही बार फ्लर्ट किया, और जल्दी ही उसे बंद भी कर दिया। ज्यादातर जवान मर्द खुद जैसे दिखते हैं, हकीकत में ठीक उसके विपरीत होते हैं। मॉरिस के मामले में भी ऐसा ही था। नोएल ने उन्हें तसल्ली दी। और अंतत: ये सीधी चाहत का भी सवाल है – उसे देखकर मर्दों का मन ललचा तो जाता ही है।       
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