Sunday, July 24, 2011

अधिक पानी का बरसना

अधिक पानी का बरसना
क्यों हमारे लिए है अभिशाप?
क्या न गोवर्धन उठाने
आयेंगे श्रीकृष्ण अपने आप?

डूबते हैं हम नहीं, मरते नहीं
मरने का कुछ jatan भी करते नहीं
हाँ, टपकते छप्परों औ गलगलाती भूमि पर
सब सहते हैं चुपचाप ,
क्या न बादल सोख लेंगे समंदर की ही तरह
लक्ष्मण चढ़ा कर चाप!

जड़ से उखड़े दरख्तों की ही तरह
साजिशन पलटाये तख्तों की तरह
एकदम से आम अपनी ज़िन्दगी यह
तिस पे बदसूरत घिनाती गंदगी यह
छोडती है कबीलाई
या महानगरी घुटन की छाप ,
क्या न आयेंगे यहाँ कमलेश्वर
शैलेश मटियानी , कोई राजेंद्र यादव
कलम लेकर मिटाने संताप !!

Monday, July 4, 2011

कविता : बाबा की नौटंकी


योगा और दवाई वाले बाबा अपने एक
बुला-बुला कर दिखा रहे थे देख तमाशा देख
टी वी को मुंह चिढ़ा रहा था हंस कर बाराबंकी
देश बिचारा देख रहा था बाबा की नौटंकी

बाबा के सIरे अनुयायी मिल कर आये दिल्ली
सरकारी भडुए सब उनकी रहे उड़ाते खिल्ली
देर रात, सरकारी हमला हुआ, पिट गयी जनता
बाबा को भागना पड़ा ऐसे ज्यों भीगी बिल्ली