ईद
के ठीक एक दिन पहले की बात है ।
रोज
की तरह उस दिन भी मैं अपने आफिस के तमाम सहकर्मियों से हाय-हेलो करता हुआ बिल्डिंग
के थर्ड फ्लोर के अपने चैम्बर में पहुंचा था। दरवाजा पुश करते ही जब मेरे कानों
में रफीक की खनकती आवाज नहीं टकराई तो अनायास ही मेरी नजरें उसे बाथरूम के गलियारे
में ढूँढ़ने लगी,
‘‘रफीक........।’’
‘‘नमस्कार
साहब....।’’
यह आवाज साहेब लाल चपरासी की थी जो चैम्बर के पीछे टैरेस पर
हम लोगों के लिए कुर्सियां लगा रहा था, ‘‘आज
रफीक बाबू अभी नहीं आये हैं।’’
‘‘अरे!
ऐसा कैसे हो सकता है!’’ मैने कुर्सी संभाला, ‘‘लगता है आज वह टै्फिक जाम में फंस गया।’’
‘‘कल
ईद भी तो है साहब।’’ साहेब लाल टेबुल पर अखबार
रखकर किचेन की तरफ बढ़ते हुए बोला था, ‘‘आज
वह खरीददारी में जुटे होंगे।’’
इसके
तुरन्त बाद आनन्द बाबू और रामकेवल भाई एक साथ पहुंचे थे। मेरी तरह उन्होंने भी
रफीक को आवाज लगायी। साहेब लाल ने उनसे भी वही बात दोहराई। मैंने अपनी मौजूदगी की
सूचना टैरेस से उन्हें दे दी। टैरेस पर अखबार पढ़ना हम लोगों का रूटीन-सा हो गया था।
हम चारों लोग और हमारे बॉस त्यागी आफिस में बैठने से पहले टैरेस पर चाय पीकर अखबार
पढ़ते और आफिस कार्य के इतर कुछ राजनैतिक-गैरराजनैतिक बातें करते।
अमूमन
त्यागी सबसे बाद में पहुंचता। त्यागी के पहुंचते ही साहेब लाल चाय लेकर हाजिर हो
जाता। त्यागी की चाय बिना चीनी की होती जिसे वह बिल्कुल ठण्डी करके पीता था।
चैम्बर
का दरवाजा खुला तो हम समझे कि रफीक आ गया लेकिन वह त्यागी था- नाटा कद, थुल-थुल गोरा शरीर, पचास से ऊपर की उम्र, सफेद झक बाल, क्लीन शेव चेहरा, चेहरे पर ताजगी,
अंगुलियों में तरह-तरह के पत्थरों से जड़ित अंगूठियां। हमने खड़े होकर उसका अभिवादन
किया। हमेशा की तरह मुस्कुराते हुए उसने अपनी नाक पर चश्मे को ठीक किया। होंठ, नाक को सिकोड़ते हुए अखबार मेरे हाथ से खींच कर वह बोल-बोल कर पढ़ने लगा।
त्यागी
को अखबार बोल कर पढ़ने की आदत थी। उसकी मजबूरी यह है कि वह घर पर न ही अखबार पढ़
सकता और न ही टी0वी0
देख सकता। उसकी पत्नी दोनों वक्त पूजा घर में बैठकर देवी की पूजा करती।
उसकी
पत्नी का शरीर काफी मोटा, थुल-थुल और नाटे कद का है
जिस पर तरह-तरह के गहने लदे होते हैं। आंखो में मोटा काजल और होंठों पर गहरी लिपस्टिक।
वह हर वक्त खाली समय में घर के अन्दर-बाहर रेंगती रहती है। हमेशा वह घर के नौकरों
और आने वालों को शक की निगाह से चुपचाप घूरती रहती है। उसके मन में हमेशा एक डर-सा
बना रहता है कि कहीं कोई उसका कुछ चुरा न ले जाये। उसे किसी पर तनिक भी विश्वास
नहीं। शाम को त्यागी जब घर पहुंचता है तो वह पूछती है, ‘‘आज कितना इन्तजाम हुआ?’’
उस
दिन के अखबार में त्यागी की सभी मनपसन्द खबरें मौजूद थी। मसलन- रिश्वत प्रकरण, पाकिस्तान के संघर्ष विराम की घोषणा और देश के कुछ हिस्सों में हिंसा।
साहेब
लाल ने सबके सामने चाय रखा। रफीक की खाली कुर्सी के सामने भी। अभी लोग चाय की पहली
चुस्की लिये ही थे कि त्यागी का ठहाका गूंजा, ‘‘जिसको रिश्वत लेने का सहूर नहीं उसे भी मिनिस्टिर बना दिया। क्या खाक चलेगा
देश।’’
त्यागी
के आने के पहले ही हम आपस में बातें कर लिये थे कि आज दोपहर तक उसे अखबार से
फुर्सत नहीं मिलने वाली। वह इन खबरों को बार-बार पढ़ेगा और हमसे उन पर कमेंट्स
लेगा। हम लोग एक-एक करके कुर्सी छोड़कर टैरेस के किनारे खड़े हो गये और चुपचाप रफीक
का रास्ता निहारने लगे। उसका कहीं दूर-दूर तक पता नहीं था। ऐसा उस दिन पहली बार
हुआ था। जिस दिन हम चारों में से किसी को भी एकाएक आफिस नहीं आना होता उस दिन फोन
से सूचना एक दूसरे को दे देते। रफीक ने फोन न करके हमारी चिन्ता को बढ़ा दिया था।
हमने उसको मोबाइल पर कई बार ट्राई भी किया तो स्विच ऑफ मिला। वैसे भी रफीक बाइक चलाते वक्त मोबाइल का स्विच
ऑफ किये रहता है। हमने उसके घर फोन किया तो अब्बू ने बताया कि वह रोज के ही वक्त
घर से निकला है।
हमारा
चैम्बर में बैठने का समय हो गया था। हम तीनों ने अपना-अपना टेबल सम्भालकर
कम्प्यूटर ऑन कर लिया था। कुछ ही देर बाद हमारे पीछे-पीछे त्यागी भी चैम्बर में
पहुंचा था। एक कुर्सी पर बैठते हुए उसने बहुत ही इत्मीनान से पूछा, ‘‘अच्छा आप यह बताइये कि सीमा पर संघर्ष विराम से हमारे देश को
कितना लाभ होगा?’’
‘‘सर!
यह तो राज-काज है। ऐसी बातें तो होती रहती हैं।’’ मैंने मुस्कुराते हुए बेहद शालीनता से कहा।
त्यागी
मेरे सामने से हटकर रामकेवल भाई के सामने बैठ गया और मुस्कुराते हुए उन्हें घूरने
लगा,
‘‘रामकेवल जी! मैं आपको भी सुनना चाहता हूँ।”
रामकेवल
भाई का हाथ माउस से हटकर ठोढ़ी पर टिक गया, ‘‘माफ कीजिएगा सर! मैं आपसे किसी भी तरह की राजनैतिक बहस नहीं करना चाहता हूँ
क्योंकि आप मेरी बात पर रियेक्ट हो जाते हैं जिससे मेरा नुकसान होता है।’’
‘‘आप
बोलिये तो- आपको नुकसान होने का भ्रम है।’’
‘‘सर!
लाभ-हानि की बातें तो सिर्फ बनिया करते हैं। देश किसी बनिये की दुकान तो है नहीं
जिसे हर वक्त तराजू पर तौला जाय। मगर अफसोस है सर जिस तेजी से देश में बनियागिरी
का विस्तार हो रहा है उसमें आपका सवाल गैरवाजिब भी नहीं है।’’
त्यागी
गरदन हिलाकर मंद-मंद मुस्कराया था, ‘‘आप लोगों की यही
संकीर्ण सोच देश को अब तक पीछे किये हुए थी। अब जब देश ने प्रगति की रफ्तार पकड़ी
तो आप लोगों की फिलासफी रास्ते का रोड़ा बनकर खड़ी हो जा रही है।’’
यदि
रफीक रहता तो यही बात उससे भी पूछता। वह बेहद मासूमियत से कहता, ‘‘मैं क्या जानूं सर! मैं तो अभी बच्चा हूँ।’’
त्यागी
अभी आनन्द बाबू से कुछ पूछता इसके पहले ही वह पूरे शायराना अंदाज में बोल पड़ा था, “क्षमा बड़न को चाहिए, छोटन को उत्पात......।’’
‘‘....चुप।’’ आनन्द का वाक्य अभी पूरा ही नहीं हुआ था कि त्यागी चीख पड़ा, ‘‘इसी कविता ने आज पूरे देश को कायर बना डाला है। इन उत्पातियों को तो वक्त दर
वक्त इतनी लाठियां मारनी चाहिए जिससे इनकी कमर ही टूट जाय। ये कभी हमारी तरफ आंख
उठाकर देखने की हिम्मत न कर सकें।’’ इसके बाद मुसलमानों और देश
की सेक्यूलर राजनीति को धारा-प्रवाह गाली, ‘‘सीमा पर हमारे बच्चे रोज शहीद हो रहे हैं उन शहीदो में कितने मुसलमान हैं...? देश में आये दिन आतंकी घटनायें हो रही हैं क्यों इस देश का मुसलमान उसके खिलाफ
सड़क पर नहीं उतरता है? मस्जिदों से उनके खिलाफ फतवे भी जारी
नहीं होते और न ही कोई मुसलमान इसकी निन्दा करता है। आखिर क्यों.....? मदरसों में क्या चल रहा है, क्या किसी से छिपा है।
आखिर क्यों मदरसों में राष्ट्रगान नहीं गाया जाता और राष्ट्रीय पर्वों पर तिरंगा
भी नहीं फहराया जाता? आखिर क्यों....? ... आखिर क्यों?
इसके बावजूद देश की राजनीति उनके तलवे चाटती है’’।
‘‘क्योंकि
इस देश का मुसलमान बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद आप लोगों से डर गया है।’’ रामकेवल भाई ने पूरी दृढ़ता से बोला था, ‘‘उसकी देशभक्ति पर आप लोगों ने इतने प्रश्नचिन्ह लगाये हैं कि उसी प्रश्नचिन्ह
के रूप में उसका गला फंसा हुआ है और वह खामोश होकर पेण्डुलम की तरफ झूल रहा है।’’
‘‘उनका
इस तरह से झूलना ही आपके अच्छे दिन हैं सर।’’ आनन्द ने व्यंग्य किया।
त्यागी
तिलमिला गया। कुर्सी से उठकर अपने चैम्बर में जाते हुए वह दांत भींचकर धमकी दिया, ‘‘इसे देश को मुसलमानों से अधिक आप जैसे लोगों से खतरा है। जरूर एक दिन आप लोग
इस देश को मुसलमानों को सौंप देंगे। मेरा वश चले तो मुसलमानों से पहले आप जैसे
लोगों को पाकिस्तान भेज दूँ, लेकिन किया क्या जाये।
गद्दी पाते ही अपने भी भंड़ुवे की भाषा बोलने लगते हैं।’’
इस
तरह की बातें त्यागी बेहिचक रफीक के सामने भी करता। रफीक चुपचाप गर्दन झुकाकर
सुनता और बीच-बीच में थूक सटक कर गला तर कर लिया करता।
त्यागी
के जाने के बाद काफी देर तक चैम्बर में सन्नाटा छाया रहा जिसे बीच-बीच में
कम्प्यूटर की आवाज भंग कर देती थी।
अभी
मुश्किल से पन्द्रह या बीस मिनट हुए होंगे त्यागी चैम्बर का दरवाजा पुश करते हुए
पुनः दाखिल हुआ। उसके बायें हाथ में चश्मा और दाहिने हाथ में अखबार था। वह विचित्र
मुद्रा में आनन्द को चेतावनी देते हुए आगे बढ़ रह था, ‘‘.....और सुन लीजिए मिस्टर आनन्द! आज पच्चीस तारीख हो गयी इसके बाद तीन दिनों की
छुट्टी है फिर भी किसी तरह इस महीने की आखिरी तक पूरे सात महीनों की पेंण्डिग और
पुरानी फाइलें जो आपने चुरा कर रखा है, मेरी
मेज पर पहुंच जानी चाहिए। वरना मैं आपके खिलाफ कोई भी कार्रवाई कर सकता हूँ....।
यहां तक कि फाइल चोरी के आरोप में आपके ऊपर पुलिस में रिपोर्ट भी की जा सकती है।’’
हम
लोग तो सन्न रह गये लेकिन आनन्द भी उसी तेवर में बोला, ‘‘सर! मैं भी यही चाहता हूँ कि वे सारी फाइलें अदालत के सामने रखी जाएं।’’
त्यागी
क्रोध से बेतहाशा चीख पड़ा। उसकी आंखें और चेहरा धीरे-धीरे लाल होने लगा। वह किसी
हिंसक जानवर की तरह रेंगते हुए आनन्द की तरफ बढ़ा। उसका यह विकराल रूप हम पहली बार
देख रहे थे। बाकायदा उसके ऊपर पागलपान का दौरा पड़ा था। उसका शरीर पसीने से लथपथ और
मुंह से सफेद झाग बहने लगी। वह किसी भेड़िये की तरह गुर्राया, ‘‘....मैं एक बार नहीं हजार बार स्वीकार कर रहा हूँ कि वे सारे बाउचर फर्जी हैं।
पूरी फाइल झूठ का पुलिंदा है.... फिर भी उसे पास करना जरूरी है।’’ वह अखबार को आनन्द के चेहरे पर पीट-पीट कर चीखता रहा, ‘‘पूरे देश में करप्शन की गंगा बह रही है। मिनिस्टर-चीफ मिनिस्टिर सरेआम रिश्वत
ले रहे हैं..... रिश्वत हमारी जिन्दगी का जरूरी हिस्सा बन चुकी है.... अपने को
जिन्दा रखने के लिए रिश्वत जरूरी है....। कान खोल कर सुन लो मिस्टर आनन्द, मुझे अभी जीना है..... जीने के लिए मुझे हर हालात में चार महीने के अन्दर
बेटे के हास्पिटल बनवाने के लिए उसे एक
करोड़ देना है।’’
इसके
बाद उसकी आवाज घों-घों करने लगी। उसके शरीर में एकाएक तेज कम्पन हुआ और वह धड़ाम से
फर्श पर गिर पड़ा। चश्मा छिटकर दूर गिरा और अखबार के पन्ने पंखे की तेज हवा में
इधर-उधर उड़ने लगे। हम सभी उसको संभालने के लिए एक साथ दौड़ पड़े। उसका सीना धौंकनी
की तरह चल रहा था और आंखें पहले से ज्यादा उबल पड़ी थीं- मुंह से सफेद झाग। उसके
भारी शरीर को हम चारों मिलकर भी संभाल नहीं पाये थे। उसे चित्त लिटाकर उसके सफारी
सूट का बटन खोला। साहेब लाल दौड़ कर पानी लाया। मैं रूमाल भिगोकर उसके चेहरे को साफ
करने लगा। उसका माथा गर्म तवे की तरह तप रहा था। हम लोग त्यागी की हालत देखकर घबरा
गये थे। हमारी समझ में नहीं आ रहा था कि अब हम करें क्या...?
लगभग
दस मिनट के बाद धीर-धीरे त्यागी की हालत सुधरने लगी। मैंने साहेब लाल को तुरन्त
चाय बनाने को कहा। त्यागी ने दो-तीन बार पलक झपकाकर इधर-उधर का मुआयना किया और
उठने की कोशिश करने लगा। हमने उसे सहारा देकर कुर्सी पर बिठाया। वह मेज के सहारे माथा
पकड़कर खामोश पड़ा रहा। हम लोग भी दीवाल व मेज के सहारे अपना हाथ सीने पर बांधकर
चुपचाप खड़े रहे। चैम्बर खामोशी और तनाव से भरा हुआ था।
‘‘सर!
आपको किसी डाक्टर के पास ले चलें?’’ मैंने धीरे से
पूछा। त्यागी ने कुछ बोला नहीं। वह हाथ से इन्कार का इशारा करके पूर्ववत पड़ा रहा।
कुछ देर बाद रामकेवल भाई ने कहा, ‘‘सर! चाय ठण्डी हो
चुकी है।’’
वह
एक झटके से कुर्सी पर सीधा हुआ और चाय को एक ही घूंट में पीकर आराम से सफारी की
बटन बंद करके आंख पर चश्मा चढ़ाया और बेहद सहजता से चैम्बर से बाहर निकल गया।
हम
लोग राहत की सांस लेकर अपनी-अपनी कुर्सी संभाल लिये। हमारे दिमाग में अजीब किस्म
की हलचल मची हुई थी। कोई किसी से कुछ बोल नहीं रहा था। दिमाग में त्यागी के
विभिन्न रूप मिक्स होकर उभरने लगे। सच कहूं तो उस दिन मुझे त्यागी पर बहुत दया आ
रही थी।
खासकर
उस समय से जब से हमारे विभाग में निजी क्षेत्र की कम्पनियों ने तेजी से कब्जा जमा
लिया है तबसे त्यागी कुछ ज्यादा ही चिड़चिड़ा हो गया है। इसी झल्लाहट में उससे और
आनन्द में प्रायः नोक-झोंक होती रहती है। कभी-कभी वह आनन्द को चैम्बर में बुलाकर
फाइल को लेकर फटकार लगाता। जबकि आनन्द पर इसका तनिक भी असर नहीं पड़ता बल्कि उसकी
जिद और अधिक बढ़ जाती।
आनन्द
को जब भी उसने फटकार लगाया है उसके घंटे भर के अन्दर ही वह हमारे चैम्बर में आ
जाता। पहले वह हमारे सामने की चेयर पर बैठकर चुपचाप नाक, होंठ सिकोड़ता, नाक पर चश्में को ठीक करता और साहेब
लाल को चाय बनाने के लिए कहता। इसके बाद वह काफी विनम्रता से मुस्कराते हुए बोलता, ‘‘लगता है,
आनन्द बाबू मुझसे नाराज हैं?’’
सभी
लोग चुपचाप अपने काम में लगे रहते। त्यागी किसी जिम्मेदार बाप की तरह हमें समझाने
लगता,
‘‘देखो भाई! अभी तुम लोग बच्चे हो। तुम लोगों ने ठीक से
दुनिया अभी देखी ही कहां? मैने तो तीस साल गुजार
दिये इस विभाग में। मैने इसका बचपन भी देखा है.. जवानी भी देखी है.... और अब इसका
बुढ़ापा भी देख रहा हूँ। इसकी सांस कब रुक जायेगी, कुछ नहीं कहा जा सकता। तुम लोग हर बात में जो नैतिकता के जुमले बोलते हो, ये सब उस जमाने के लिए था जब सार्वजनिक क्षेत्र के विभागों को लोग पूजा घर
मानते थे। आज वे पूजा घर पूरी तरह से वेश्या के कोठे में बदल गये हैं। यदि तुम लोग
किसी वेश्या के कोठे पर बैठ कर उससे नैतिकता की बाते करोगे तो लोग तुम पर हंसेंगे
और वेश्या तुम्हें धक्के मारकर कोठे से बाहर कर देगी।’’
त्यागी
जब इस तरह की बातें करता तो उसके चेहरे पर गजब का आकर्षण होता और उसकी आवाज किसी संन्यासी
के प्रवचन की तरह लगती। वह धारा प्रवाह बोलता। इस बीच वह किसी को बोलने का मौका भी
नहीं देता।
‘‘तुम
लोगों को युग के हिसाब से अपने परिवार की जिम्मेदारियों का एहसास नहीं है। क्या
कभी तुम लोगों ने सोचा है कि इस कमर तोड़ मंहगाई में सिर्फ सेलरी के भरोसे अपने
परिवार का स्टेटस मेन्टेन कर सकते हो? उनकी
डिमाण्ड पूरी कर सकते हो...? बच्चों को हायर एजूकेशन दे
सकते हो?
यही नहीं,
शहर में कायदे का एक घर भी तो नहीं बनवा सकते। मैं जानता हूँ तुममें से कोई भी ऐसा
नहीं कर सकता। यदि मैंने भी नैतिकता का लबादा ओढ़कर नौकरी किया होता तो अपने बेटे
पर सत्तर-अस्सी लाख रुपये खर्च करके उसे डाक्टर नहीं बना पाता। तब वह बेरोजगारी से
जूझते हुए आवारागर्दी करता और मुझे जी भर कर गालियां देता। मैं पच्चास लाख खर्च
करके अपनी बेटी की शादी क्लास टू के अधिकारी से नहीं कर पाता। या तो मैं उसे किसी
चपरासी के पैर में बांध देता या वह किसी रोज किसी लफंगे के साथ घर से भाग जाती और
मेरी पत्नी रस्सी के फंदे में झूलती मिलती।
वह
कुछ पल के लिए रुकता और फिर उसी तरह शुरू हो जाता, ‘‘इसीलिए,
मैं तुम लोगों को बार-बार कहता हूँ कि समय की नब्ज को
पहचानो। देश,
समाज और धर्म के ठेकेदारों को देखो। सभी करप्शन में आकण्ठ
डूबे हुए हैं। फिर भी वे सबसे ज्यादा नैतिकता का दम भरते हैं। किसी को वनवास
मिला...?
सभी तो निर्विघ्न राज कर रहे हैं। जिस तरह बड़े पूंजीपति
सार्वजनिक क्षेत्र में घुस रहे हैं उनके
सामने हमारा यह निगम कितने दिन टिकेगा। जरा कल्पना करो तुम लोग, कल यह किसी के हाथों बिक जाय या इसे दिवालिया घोषित कर दिया जाय तो तुम्हारी स्थिति कहां
होगी....?
आखिर
में वह आनन्द की आंखों में पूरी गम्भीरता से झांकते हुए उसे समझाने लगता, ‘‘....इसीलिए,
मैं बार-बार कहता हूँ आनन्द बाबू कि जिद छोड़ दो। किसी भी
तरह की जिद इन्सान को पतन के रास्ते पर ले जाती है। इतिहास गवाह है कि जिसने भी
जिद की उसका नाश हुआ। गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं- हे वत्स!
जिद इंसान को कायर बनाती है। उसे अपने लक्ष्य को प्राप्त करने से रोकती है इसलिए
हे अर्जुन! सबसे पहले तुम अपनी जिद का नाश करो, तभी तुम्हारा लक्ष्य पूरा होगा...।’’
ऐसा
कहते हुए वह आहिस्ता से हमारे चैम्बर से बाहर निकल जाता। उसके तमाम क्वेश्चन मार्क
मुझे देर तक परेशान करते रहते हैं। मेरी आंखों के सामने वह बार-बार कई-कई रूपों
में उभरने लगते। कभी वह उलटकर छत का हुक बन जाता, जिसमें खुदकशी का फंदा लटका होता तो कभी वह मेरे कलेजे में जा घुसता और मैं
छटपटाने लगता। मैं सारी-सारी रातें अपने भविष्य के भय से सो नहीं पाता।
मैने
आनन्द से विनती भी किया था, ‘‘आनन्द बाबू त्यागी
की बातों में रत्ती भर भी झूठ नहीं है। एक अकेले तुम इस विभाग को कैसे बचा सकते
हो।’’
मेरी
आंखों में आंखें डालकर पूरे आत्मविश्वास से भरे आनंद ने कहा था, ‘‘तुम्हें पता है कि हमारे संगठन में लाखों लोग हैं और रोज तेजी से हजारों की
संख्या में जुड़ रहे हैं। फिर भी तुम मुझे अकेला समझ रहे हो।” हम चुपचाप उसकी बातें
सुनते रहते,
“हमें यह कभी नहीं भूलना चाहिए के समाज का हर एक धूर्त, पाखण्डी और हत्यारा अपने चेहरे और जबान से मासूम होता है। वह फरेबी हमें इस
तरह से समझाता है कि लगता है कि वह हमारे मन की बात कर रहा है। जबकि उसके फरेब में
फंसकर उसके सामने हम आत्मसमर्पण कर देते हैं तो समझो यही उसकी सबसे बड़ी जीत और
हमारी हार होती है। त्यागी भी उसी जमात का है।’’
पिछले
दो साल से आनन्द एक स्वयंसेवी संस्था से जुड़ा है। जो सोशल साइट पर करप्शन के खिलाफ
आन्दोलन चला रहे हैं। सोशल साइट ही उसके संगठन का दफ्तर है। सामाजिक जीवन से जुड़े
सेलेब्रेटी जिनका राजनीति में कोई सीधा हस्तक्षेप नहीं हैं ऐसे तमाम लोग उससे
जुडे़ हैं। संगठन का लोगो है- फोर-डी वर्सेस फोर-सी। उसका स्लोगन है- डेमोक्रेसी, डेवलपमेंट,
डिसासिव एण्ड ड्रीमफुल सोसायटी के लिए लड़ो। करप्शन, कम्युनिलिज्म, कास्टीजम एण्ड क्रीमिनाल्टी के खिलाफ
लड़ो।
(फाइट
फार फोर-डी-फाइट अगेनस्ट फोर-सी)
आनन्द
जब से इस संगठन से जुड़ा है तबसे वह लगातार इस कोशिश में रहता कि हम तीनों लोग भी उससे
जुड़ जाएं। मेरी तो इन सब बातों में कभी दिलचस्पी ही नहीं रही। रफीक तो अभी बच्चा
है। रामकेवल भाई जरूर उससे बहस किया करते। एक दिन रामकेवल भाई ने आनन्द को समझाते
हुए कहा,
‘‘करप्शन एक राजनैतिक मुद्दा है जिसे सिर्फ स्पष्ट विचारधारा
के राजनीतिक मंच ही सुलझा सकते हैं। जबकि तुम्हारा संगठन राजनीति को पूरी तरह से
नकारता है। उसकी कोई विचाराधारा ही नहीं है। सिर्फ वह घड़ी के पेण्डुलम की तरह
दायें-बायें घूम रहा है।’’
‘‘जब
देश की राजनीति ही पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुकी है तब उससे उम्मीद ही कैसे की जा
सकती है। वह कुछ दिखावा करके जनता को जरूर बेवकूफ बना सकती है।’’ आनन्द ने बोला, ‘‘आज के युवा वर्ग का
राजनीति से मोहभंग हो चुका है। उसी का सामूहिक स्वर ही हमारा संगठन है। वह मानने
लगा है कि उसके भविष्य के निर्माण में देश की राजनीति की कोई भूमिका नहीं बची है।
मिस्र इसका ताजा उदाहरण है।’’
‘‘हमारा
यह देश मिस्र नहीं है, यहां की आर्थिक-राजनैतिक परिस्थितियां
बिल्कुल भिन्न हैं। यह तुम मत भूलो कि युवा वर्ग पर तुम इतना इतरा रहे हो उसका एक बड़ा हिस्सा बाबरी
मस्जिद ध्वंस के गर्भ से पैदा हुआ है। जिसने नफरत और अलगाव की जहरीली गैस में सांस
लिया है। साम्राज्यवाद ने उसे पढ़ा लिखाकर बाजार के हवाले कर दिया है। आज बाजार
उन्हीं के कंधो पर सवार होकर हमारे घर के हर कोने तक पहुंच आया है। बाजार और
भ्रष्टाचार दोनों जुड़वे भाई हैं। ये दोनों एक दूसरे के बगैर जी ही नहीं सकते।’’
‘‘इसका
मतलब कि आपको आज की युवा शक्ति पर भरोसा नहीं है?’’
‘‘यकीन
मानो,
मुझे इस पर पूरा भरोसा है। लेकिन उसके अपरिपक्व राजनैतिक
समझ को लेकर एक डर भी है कि कहीं भावुकता में आकर वह किसी गलत रास्ते पर न चल पड़े।
यदि ऐसा हुआ तो देश का भविष्य गहरे अवसाद में डूब जायेगा।’’
‘‘मैं
समझा नहीं...।’’
‘‘सत्तर
के दशक में हमारी युवा पीढ़ी का आक्रोश गुमराह हो चुका है। काश ऐसा न हुआ होता तो
आज देश का स्वरूप कुछ और होता। जबकि आज की अपेक्षा वह युवा राजनैतिक रूप से काफी
समृद्ध था। उसके अन्दर समाज के प्रति समर्पण और सब्र दोनों था। आज के युवा वर्ग के
पास इन दोनों की कमी है। वह चाहता है कि रात में फेसबुक पर एक क्लिक करे और सुबह
क्रांति उसका दरवाजा खटखटाने लगे।’’
चैम्बर
में एक अजीब किस्म का सन्नाटा पसरा हुआ था। काम करने में ऊब महसूस हो रही थी। फिर
भी सभी लोग कम्प्यूटर की स्क्रीन पर नजरें
गड़ाये हुए थे। इस सन्नाटे को तोड़ने की गरज से मैंने रफीक के न आने की चर्चा शुरू
ही करना चाहा तभी आनन्द बोल पड़ा, ‘‘अभी तक रफीक आया
नहीं। अपनी मोबाइल की स्विच आफ करके पता नहीं आज हमें वह कौन सी सरप्राइज देना
चाहता है।’’
‘‘एक
काम करते हैं...।’’ रामकेवल भाई की बात अभी
पूरी भी नहीं हुई थी कि त्यागी दरवाजा पुश करके बहुत ही इत्मीनान से बोला, ‘‘देखो भाई! मैं बताना भूल गया था, सुबह मुझे किसी ने फोन किया था कि ऑफिस आते वक्त रफीक का एक्सीडेंट हो गया
है। उसे लोगों ने लाइफ लाइन हास्पिटल में भरती करा दिया है। जरा तुम लोग उसके घर
सूचना दे दो।’’
हम
सभी स्तब्ध! एक दूसरे का मुंह निहारने लगे। इतना कहकर त्यागी दरवाजे से बाहर हो
गये। दरवाजे के काले शीशे के उस पार हम उसे देर तक देखते रहे। मानों कोई हिंसक
जानवर हमें घायल करके अपनी गुफा में घुस रहा हो। आनन्द का चेहरा धीरे-धीरे लाल होने लगा और वह गुस्से में दांत भींचते हुए
बोला,
‘‘देख लिया तुम लोगों ने यह कितना कमीना है। इसे अभी ख्याल
आया। उस पर भी इस तरह से सुना रहा है जैसे उसकी सगाई का संदेश लेकर आया है।’’
हम
बिना समय गंवाए हास्पिटल पहुंचे थे।
अस्पताल
के सामने जुलाहों की बस्ती उमड़ पड़ी थी। सभी के चेहरे मायूस थे। इधर-उधर लोग आपस
में खुसुर-फुसुर बातें कर रहे थे। कुछ लोग रफीक के अब्बा को घेरकर खड़े थे। जैसे ही
उनकी नजर हम पर पड़ी वह झट से कान पर पड़ी बुझी बीड़ी उतारकर सुलगाने लगे थे।
‘‘रफीक
कैसा है...।’’
हमारे मुंह से लगभग एक साथ निकला।
उनकी
आंखें डबडबा आयीं। होठ को बार-बार दांत से कुतरने लगे। कण्ठ अवरुद्ध हो चुका था।
रामकेवल भाई उनका हाथ अपने हाथ में लेकर उनकी पीठ सहलाने लगे। किसी तरह भर्राई
आवाज में वह बोले, ‘‘बब्बू को अभी होश नहीं आया
है। डाक्टर साहब ने बोला है कि यदि छत्तीस घंटे तक होश नहीं आयेगा तो उसके सिर का
आपरेशन करना पड़ेगा.... आपरेशन की फीस सुनकर तो मेरे परान सूख गये बाबू ... इतना
पैसा आयेगा कहां से.......?
वह
फफक कर रो पडे़।
‘‘चच्चा
आप बिल्कुल चिन्ता मत कीजिए। बब्बू के इलाज का सारा खर्च हम मिलकर उठायेंगे, आप सिर्फ सब्र रखिये।’’ आनन्द ने रूमाल से उनका चेहरा पोंछते हुए बोला था।
अब्बू
के साथ जब हम रफीक के कमरे में पहुंचे तो उसको देखकर हमारे कलेजे में हूक-सी उठी।
उसके माथे पर पट्टी बंधी हुई थी। ड्रिप चढ़ रही थी और नाक में ऑक्सीजन की नली लगी
हुई थी। उसकी बूढ़ी अंधी माँ उसे टटोलते हुए कुछ बुदबुदा रही थी। हमारे आने की आहट
पाकर वह क्षण भर के लिए रुकी और गरदन उठा कर बोली, ‘‘बब्बू के अब्बा! एकदम मत घबराना। मैंने मकदूम बाबा को चादर चढ़ाने की मन्नत मांग दी है। बब्बू ठीक
हो जायेगा।’’
रात
को रामकेवल भाई और आनन्द हास्पिटल में ही रुक गये थे। आराधना के बुखार की वजह से
मुझे लोग जबरदस्ती घर भेज दिये थे। हमने अपने-अपने घर देर रात को सूचना दिया था।
सभी आने के लिए आतुर थे लेकिन उन्हें रात में आने से मना कर दिया गया। उस रात
हमारे घर खाना नहीं बना, किसी
ने कुछ नहीं खाया। बच्चे तक दूध पीने से इन्कार कर दिये। घर में मायूसी की चादर तन
गयी थी।
सारी
रात मैं सो नहीं पाया। हर पल रफीक के बूढ़े बाप का फफकता हुआ चेहरा और उसकी माँ की
आंखो की सफेदी मुझे बेचैन कर दे रही थी। बार-बार किसी अनहोनी के डर से दिल कांप
जाता। हर आधे घंटे पर फोन करके उसकी खबर लेता, लेकिन कोई राहत नहीं।
दरअसल, रफीक हमारा सहकर्मी ही नहीं बल्कि हमारे परिवार का सगा सदस्य हो गया था। उसकी
शायरी,
कामेडी और भोलापन हमारे घर के किचन तक पहुंच गये थे। उसके
हाथ की तरह-तरह की खीर लाजवाब हुआ करती थी। हम जिस घरेलू काम को दो दिन भूल जाते
तो रफीक की मोबाइल पर तीसरे दिन घंटी बज जाती- भैया जी, गैस खत्म हो गयी है... भैया जी, बच्चों की फीस नहीं जमा
है..... भैया जी ...।
रफीक
हम लोगों से काफी खुला था। अपनी चुहल में घर की सारी बातें भी बता देता था। लेकिन
कोई ऐसी बात जरूर थी जिसे वह हमसे छिपाता भी था। कभी-कभी वह खोया-खोया सा रहता। जब
उसका सब्र टूटने लगता तो वह मेज को तबले की तरह बजाकर कोई दर्द भरा नगमा गाने
लगता। उसका गला बेहद सुरीला था। हिन्दी, उर्दू
की मिश्रित नगमों से वह समां बांध देता। किसी एक दिन जैसे ही उसने अपनी गजल खत्म की, रामकेवल भाई ने हंसते हुए कहा था, ‘‘रफीक,
अब तू शादी कर ले भाई! नहीं तो किसी दिन तेरी सुसाइड नोट
पढ़ने को मिलेगी।’’
रफीक
ने तपाक से उनके होठों पर अपनी अंगुली रख दिया था, ‘‘नहीं भाई नहीं! ऐसा मत कहो। मुझे तो जीना है। मुझे तलाश है दुनिया की दो
खूबसूरत आंखों की जिनसे मेरी अम्मी जी भर कर मुझे देख सके। मुझे अब्बू के फेफड़ों
में सुख की इतनी हवा भरनी है जिससे टी0बी0 हमेशा के लिए उनका साथ छोड़ दे।’’
रफीक
को बताने में कभी झिझक नहीं लगी कि कैसे उसकी अम्मी की सात संतानें आठ-दस साल के
होने के बाद एक-एक करके किसी न किसी बीमारी की वजह से चल बसे। जब उसकी अम्मी को
संतान न होने की उम्मीद बची थी,
रफीक उस वक्त पैदा हुआ था। इस बीच अपनी संतानों के गम में उसकी दोनों आंखो में सफेदी
उतर आयी थी। वह कभी रफीक की सूरत को नहीं देख सकी थी। वह रफीक को हमेशा अपने पास
रखने की कोशिश करती। उसे बार-बार टटोलती-सहलाती और चूमती। कभी-कभी उसके अब्बू से
पूछती,
‘‘बब्बू के अब्बा! रफीक देखने में कैसा लगता है।’’
अब्बू
अपनी मरी हुई सातों संतानों के एक-एक अंग को जोड़कर रफीक की खूबसूरत शक्ल बना देते
जिसे वह अपनी अंधी आंखो में बसा लेती। एकान्त में वह उसी शक्ल की कल्पना में हंसती, रोती और लोरियां गुनगुनाती।
रफीक
बहुत भावुक होकर बताता कि भोर की अज़ान के घंटे भर पहले अम्मी उसके अब्बू के साथ
करघे पर बैठ जाती। करघे की मधुर संगीत की लय अपनी आदिम राग से कबीर बानी गाते हुए
सदियों के दर्द को जुलाहा बस्ती पर झीनी चादर की तरह उड़ेल देती। उनके विचिलित कर
देने वाले सुर से लोग अपना रिश्ता बना लिये थे। घरों के दरवाजे-खिड़कियां धीरे-धीरे
खुलने लगते और हर घर-आंगन कबीर बानी गुनगुनाने लगता।
इस
बेचैन कर देने वाले माहौल में रफीक अपने भविष्य के ताने-बाने को बुनता रहता।
खैर!
रात के ठीक एक बजे आनन्द का फोन आया।
रफीक
को होश आ चुका था। होश आने पर वह सिर्फ अपनी अम्मी को अपलक काफी देर तक निहारा था।
उसकी आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे थे।
अम्मी के होंठ बुदबुदाने लगे और अब्बू एक कोने में चटाई बिछाकर नमाज अदा करने लगे
थे।
दूसरे
दिन सुबह हम तीनों लोग लगभग एक ही साथ अपने परिवार सहित अस्पताल पहुंचे थे। रफीक
की हालत में काफी सुधार था। उसके नाक से आक्सीजन की नली निकाल दी गयी थी मगर ड्रिप
अभी चल रही थी। वह हमें देखकर मुस्कुराया था।
मेरे
पहुंचने के बाद पता चला कि रात में त्यागी भी अस्पताल पहुंचा था। रफीक को होश आने
पर ही घर वापस लौटा था। उसने रफीक के अब्बू से अकेले में देर तक बातें की थीं और
लौटते समय उन्हें जबरदस्ती दस हजार रुपये भी दिये थे।
ईद
के बावजूद पूरे दिन लोगों का आना-जाना लगा रहा था। बीच में अब्बू नमाज पढ़ने के लिए
चले गये थे। हमारे घर की महिलाओं के बीच रफीक की अम्मी एक कोने में बुरका ओढे़
गठरी की तरह चुपचाप गुमसुम पड़ी थी। लोगों के बातें करने पर वह सिर्फ मुलुर-मुलुर बारी-बारी से सबका मुंह निहारती- बिल्कुल
असहज और घुटन में।
नमाज
अदा करने के बाद अब्बू जब वापस लौटे थे तो उनके चेहरे पर सकून था। कल वाला चेहरा
तो बिल्कुल ही नहीं था। यह ईद के त्योहार का असर था या रफीक की हालत का सुधार या
कुछ और....। वह आने के कुछ ही देर बाद बातों का सिलसिला त्यागी की तरफ मोड़ दिये थे, ‘‘.....सच कहूं तो साहेब! आज मैं बहुत खुश हूँ। खुदा ने इस बार हमारी ईद में चार-चाँद
लगा दिया। उसने चाँद के साथ हमारे पास एक फरिश्ता भी भेज दिया। अरे भाई! इसके लिए
खुदा को कोई बहाना चाहिए न।’’
हम
लोग चुपचाप अब्बू का चेहरा देखते रहे। जिस पर परम तृप्ति के भाव साफ झलक रहे थे।
उन्होंने कान पर से बुझी बीड़ी उतारी लेकिन अस्पताल का एहसास होते ही उसे फिर कान
पर रख दिये,
‘‘सच कहूं तो साहेब! खुदा की इस मेहरबानी से आज हमारी गरदन
पूरे जुलाहा बस्ती में ऊंची हो गयी है। अभी तक किसी जुलाहे के घर इतना बड़ा आदमी
नहीं पहुंचा था। रात को इतना समय भी दिया, हमें जिन्दगी जीने का शऊर भी समझाया... सचमुच वह महान इंसान है..।’’
काफी
देर तक अब्बू त्यागी की तारीफ करते रहे थे। हम लोग तो मन ही मन मुस्कुराते हुए सुन
रहे थे लेकिन आनन्द ऊबने लगा था। उसके चेहरे पर खिन्नता फैलने लगी। किसी के आ जाने
पर अब्बू कमरे से बाहर निकले। उसी समय रामकेवल भाई ने रफीक से मजाक किया, ‘‘आखिर त्यागी ने अब्बू को अपने जादू में बांध ही लिया।’’
रफीक
काफी देर तक छत को निहारता रहा,
फिर वह गम्भीरता से बोला, ‘‘यह जादू नहीं हकीकत
है भाई! मुझे लगता है कि त्यागी को समझने में हम भूल कर रहे हैं। समय को देखकर
समाज ने अपना आदर्श बदल लिया है और हम अपने बचकाने जोश में पुराने आदर्शों को ढो
रहे हैं। त्यागी का दिल साफ है। उसके अन्दर छल-कपट नहीं है। उसके पास जिन्दगी जीने
का तजुर्बा है। इसका हमें अपने भविष्य के
हित में उपयोग करना चाहिए।’’
हम
भी धीरे-धीरे ऊबने लगे थे।
बकरीद
के तीसरे दिन से रफीक पुनः आफिस आने लगा था। उस दिन को हम सेलीब्रेट करना चाहते
थे। रोज की तरह उस दिन भी हम टैरेस पर बैठे थे। अखबार में छपी एक केन्द्रीय मंत्री
के करीबी के घोटालों की खबर को त्यागी जोर-जोर से पढ़ रहा था। वह पढ़ते-पढ़ते यकायक रुक
गया। कुछ देर तक वह अखबार को घूरता रहा फिर कंधे को कुर्सी के सहारे पीछे लटका कर
किसी गहन सोच में डूब गया। हम लोग चुपचाप एक दूसरे को निहारने लगे। एकाएक वह झटके
से उठा और अखबार को मेज पर रखते हुए लगभग आदेश के स्वर में बोला, ‘‘आनन्द बाबू! आप अपनी सारे डाक्यूमेंट्स की फाइलें लेकर मेरे चैम्बर में आइये।’’
इतना
कहकर वह तेजी से अपने चैम्बर में घुस गया था।
हमारे
स्पेशल प्रोग्राम को एकाएक ग्रहण लग गया। आनन्द चुपचाप टहलते हुए बार-बार अपने सिर
को झटका देता रहा। हमारी तरफ एक नजर देखते हुए चैम्बर में घुसा और डाक्यूमेंट्स की
सारी फाइलें लेकर बाहर निकल गया।
हम
लोग भी चैम्बर में आकर अपना-अपना कम्प्यूटर ऑन करके चुपचाप बिना वजह उसे छेड़ते
रहे। लगभग दो घंटे के बाद आनन्द हाथ में मिठाई का पैकेट लेकर चहकते हुए चैम्बर में
घुसा था,
‘‘रिलेक्स यार रिलेक्स! मिठाई खाओ। आज मेरे गले से फंदा निकल
गया।’’
हम
लोग उसकी खुशी में शामिल तो जरूर हुए लेकिन हमारा दिल यह विश्वास नहीं कर पा रहा
था कि आनन्द सचमुच खुश है। क्योंकि ऐसे मौकों पर वह हमेशा अतिरिक्त खुशी का इजहार
करता है। मेरे अन्दर एक भय बार-बार दस्तक देने लगा कि अब किसकी बारी है? मैं या रामकेवल भाई- रफीक तो अभी बच्चा है।
लंच
के बाद साहेब लाल ने एक तेज धमाका किया, ‘‘रफीक
बाबू! आपको साहेब ने बुलाया है।’’
हम
अवाक! एक दूसरे का मुंह निहारने लगे थे। रफीक ने हम तीनों की आंखो में झांकते हुए
इशारों से पूछा था कि क्या करे वह? हम लोग बिना कुछ बोले गरदन
झुका लिये थे। कुछ देर बाद रफीक चैम्बर से बाहर निकल गया था। उसके जाते ही आनन्द
के चेहरे पर तनाव बढ़ गया और वह कुर्सी पर पसर कर चिन्ता में डूब गया था। काफी देर
बाद उसके मुंह से निकला था, ‘‘गाड ब्लेस यू
रफीक..... गाड ब्लेस यू...।’’
रफीक
को त्यागी ने थोड़े ही दिनो में ही अपने रंग में पूरी तरह से रंग दिया था। अब वह
बच्चा नहीं रहा। उसकी हर बात से त्यागी खुश हो जाता। उसके समय का एक बड़ा हिस्सा
त्यागी के साथ गुजरने लगा था। वह तमाम तरह के दलालों, ठेकेदारों से घिरा रहता। उनसे वह घंटों खुसुर-पुसर बातें करता और आये दिन उनकी
दावतों में शरीक होता। इसके बावजूद हम रफीक को अपने से अलग नहीं कर सके थे। ऐसा भी
नहीं था कि हमने कभी उसे इसका आभास न कराया हो। हमने कई बार उसको समझाया लेकिन हर
बार उसने कंधे उचकाकर हमें अनसुना कर दिया था। इधर कुछ दिनों से वह हमें जवाब भी
रूखेपन से देने लगा था। अभी पिछले महीने आनन्द ने उसे पूरी गम्भीरता से कहा था, ‘‘रफीक! तुमसे कुछ बात करनी है।’’
‘‘कुछ
क्यों,
बहुत कुछ कहो।’’ रफीक
ने हंसते हुए कहा था, ‘‘मैंने कभी मना किया क्या?’’
‘‘रफीक
तुम जिस रास्ते पर इतनी तेजी से दौड़ रहे हो। उसकी मंजिल जानते हो?’’
काफी
देर तक रफीक आंखें बन्द करके अपने चेयर पर झूलता रहा था। थोड़ी देर बाद बेहद ठण्डे
स्वर में बोला,
‘‘मुझे मालूम है अपनी मंजिल। मैं इस रास्ते पर और तेज दौड़ना
चाहता हूँ। यही रास्ता मेरे सपनों को पूरा करेगा आनन्द बाबू। आप जिन आदर्शों को
गले से लगाकर बार-बार दुहाई देते हैं वे आदर्श आपके हो सकते हैं मेरे नहीं।
क्योंकि उन्होंने कभी पीढ़ी-दर-पीढ़ी की दरिद्रता को नहीं भोगा है और न ही भविष्य
में उनके दरिद्र होने का कोई खतरा है।’’
वह
कुछ पलों के लिए शांत हुआ था। फिर उसने चैम्बर की छत पर आंखें गड़ाये हुए बोला, ‘‘आनन्द बाबू! यह सच है कि आप की सोच का दायरा काफी बड़ा है। मैं आपकी चिन्ता से
वाकिफ हूँ। मगर आपमें और मुझमें एक बुनियादी फर्क है।’’ इसके बाद वह आनन्द की आंखो में झांकते हुए बोला था, ‘‘आनन्द बाबू! जिस दिन हमारे विभाग में ताला लग गया उस दिन हमारे जैसे लोग कहां
जायेंगे?
ऐसा होने पर आपकी सात पीढ़ियां जुलाहा तो नहीं बनेगी लेकिन
मेरी सात पीढ़ी कभी सरकारी नौकरी के सपने भी नहीं देख सकेंगी।’’
इतना
कहकर वह तेजी से चैम्बर के बाहर निकल गया था।
इस
घटना के बाद रफीक हमेशा हमारे सामने झेंपा रहता। उसके चेहरे पर शर्म और ग्लानि की
स्याह चादर हमेशा चिपकी रहती। तमाम नजदीकियों के बावजूद वह हमसे लगातार दूर होता
जा रहा था। फिर भी हमारे परिवार में इसका आभास अभी नहीं हुआ था। हाँ, आकांक्षा ने एक दिन जरूर कहा था कि रफीक अंकल के पास अब नये जोक्स नहीं है।
हमारे
ऑफिस का माहौल दिन-प्रतिदिन दमघोंटू होता जा रहा था। जिस दफ्तर को हम दुनिया की
सबसे खूबसूरत जगह मान बैठे थे आज वह अंधेरी, अंतहीन सुरंग में बदल जायेगी, हमने इसकी कभी कल्पना नहीं
की थी। हम कहीं भी रहें,
कितना भी थके हों,
हम भागकर आफिस पहुंचते और हमारी थकान मिट जाती। सच कहें तो हम चारों को अपने ऑफिस
से मोहब्बत हो गयी थी। काम के बोझ को हमने कभी महसूस ही नहीं किया था। हमने तमाम
छुट्टियां आफिस में ही बिताई और लगातार सोलह-सोलह घंटे काम किया है। फिर भी हम कभी
थके नहीं।
वे
दिन तो अब सिर्फ सोचने को रह गये। अब तो आफिस में घंटे दो घंटे भी लगातार बैठना
मुश्किल हो गया है। यही इच्छा बार-बार होती है कि कौन-सा बहाना मिले कि चैम्बर से
निकलकर भाग जाऊं। भागूं भी तो कहां, कहीं भी तो चैन नहीं
मिलता। हमारा जीवन खण्ड-खण्ड बिखरने लगा है। हर वक्त दिल में कचोट और चेहरे पर
खिन्नता।
इसी
बीच किसी रोज रफीक ने आफिस के तनाव को हमारे घर में पहुंचा दिया था। उसने प्रतिभा
भाभी और आराधना के सामने पूरी घटना का सिलसिलेवार बयान किया था और सिफारिश भी किया
था कि अबकी बार उसे माफ कर दिया जाय। फिर वह ऐसी गलती नहीं करेगा।
रात
में हम तीनों लोगों की लगभग एक ही तरह से क्लास ली गयी थी। जिसका निष्कर्ष यहीं
निकला था कि रफीक जो कर रहा है। वह जमाने के हिसाब से बिल्कुल सही और जरूरी है। हम
पुराने खयाल के जाहिल लोग हैं। जो खाते पीते किसान परिवार से निकलकर सकून की
जिन्दगी जीना चाहते हैं और समाज में आगे बढ़ने के लिए रिस्क लेने से डरते हैं।
इस
बात को लेकर दूसरे दिन रामकेवल भाई ने रफीक को गम्भीरता से टोका था। उस दिन के बाद
से उसने चुपचाप हमसे सम्बन्ध तोड़ लिया था। हमारे घर आना भी छोड़ दिया। फोन आने पर
कोई बहाना बना कर टाल देता। बच्चे उसको मैसेज करते- रफीक अंकल हमारे घर कब आओगे?
इधर
एक हफ्ते से वह कुछ ज्यादा ही उदास रहने लगा था। वह अपने मिलने वालों से भरसक दूरी
बनाकर रहता। त्यागी उसे बार-बार अपने चैम्बर में बुलाता और जब वह वापस लौटता तो और
अधिक उदास हो जाता। चुपचाप हथेली में चेहरा थामकर वह गुमसुम बैठा रहता। जब उसकी
उलझन ज्यादा बढ़ जाती तो अपनी अम्मी को फोन कर लेता, ‘‘अम्मी....ठीक हो.... क्या कर रही हो..... खाना खायी.... दवा ली..... थोड़ा आराम
कर लो... मैं ठीक हूँ।’’ फिर वह हमें यतीम बच्चे की
तरह अपलक निहारने लगता। जब उसकी आंखे नम होने लगतीं तो चुपचाप वह बाथरूम में घुस
जाता।
उस
दिन हम तीनों अपने कम्प्यूटर पर नजरें गड़ाये हुए थे। रफीक ने चुपचाप हमें
बारी-बारी से निहारा था। उसकी आंखों में गहरी वेदना साफ झलक रही थी। वह बार-बार
अपने होंठों को चबा रहा था। सब कुछ महसूस करते हुए भी हम खामोश रहे। वह धीरे से
उठा और मेरी टेबल के सामने आकर फोन डायल किया था, ‘‘भाभी... मैं रफीक बोल रहा हूँ।’’ उसके स्वर में हल्का-सा
कम्पन था। उधर की आवाज आराधना की थी, ‘‘....अच्छा
ही हूँ भाभी.... थोड़ा बीच में सयाना हो गया था। अब फिर से बच्चा हो जाना चाहता
हूँ। भाभी! मैं आपके हाथ का गाजर का हलुआ भरपेट खाना चाहता हूँ। इस साल अभी मुझे
ईद की गिफ्ट भी नहीं मिली। हाँ अब इस बार मुझे जींस चाहिए। सभी लोग ठीक हैं......
आप लोग मुझसे नाराज हैं तो क्या मेरी अम्मी से भी नाराज हैं.... अब आप लोग उन्हें
भी तो फोन नहीं करतीं... अम्मी आप लोगों को बहुत याद करती है... बहुत याद करती है।
ठीक है भाभी इस सण्डे को मैं जरूर आऊंगा।’’
हम
लोग खामोश होकर उसे देखते रहे। उसने अपनी और दोनों भाभियों से इसी तरह से बातें
किया और सण्डे की शाम को सबके साथ मेरे घर खाना खाने का वादा भी किया था। उसकी
आवाज में अजीब किस्म की थरथराहट थी। वह फोन रखने के बाद सीधे बाथरूम में घुसा था
और जब वापस लौटा तो उसकी आंखें सुर्ख लाल थीं।
इस
बीच हम हाथ बांधे चुपचाप बैठे रहे। कुछ देर बाद रामकेवल भाई ने बहुत ही गम्भीर
आवाज में बोला,
‘‘इस आफिस से मैं अब निजात पाना चाहता हूँ।’’
उनकी
इस घोषणा से हम लोग सन्न रह गये। उनके चेहरे पर और आंखों में दृढ़ता थी, ‘‘मैं इस कब्र के भीतर अब और काम नहीं कर सकता। मेरे अन्दर धीरे-धीरे कोई राक्षस
बैठ रहा है। जिसकी छाया से मेरा घर हमेशा डरा-सहमा रहता है। आज मैंने बिना वजह उत्कर्ष को थप्पड़ मारा है। यह भी हो सकता है कि
कल उसकी छोटी-सी गलती पर मैं उसका गला ही दबा दूँ। मिस्टर आनन्द! यह सब तुम्हारी वजह से हो रहा है। या तो तुम हमारे
पुराने दिन वापस कर दो या मैं अपना ट्रांसफर कराकर कहीं और चला जाऊं।’’
इसी
तरह के बोध से मैं भी दबा था। लेकिन मैं किसी से कह नहीं पा रहा था। किसी एक दिन
आराधना ने चिन्ता जाहिर की थी, ‘‘इधर तुम कुछ
उखड़े-उखड़े से लगते हो। तुम हर छोटी सी बात में गुस्सा करने लगे हो। हर बात का
सिर्फ एक उत्तर-चलो देखा जायेगा। क्यों नहीं किसी डाक्टर से चेकअप करा लेते?’’
आनन्द
सिर झुकाकर देर तक सोचता रहा था। रफीक आहिस्ता से उठा और रामकेवल भाई के पीछे जाकर
उन्हें बांहो में भर लिया। उनकी गरदन पर अपना सिर झुकाकर फफक कर रोने लगा।
वह
रोता रहा। हम खामोश रहे और आनन्द सिर झुकाये सोचता रहा। जब वह रोकर अपने दिल को
हल्का कर लिया तो कुर्सी खींच कर हमारे सामने बैठ गया। उसने भी आनन्द से रिक्वेस्ट
किया,
‘‘प्लीज आनन्द! किसी भी तरह से हमारे पुराने दिन वापस कर दो।
मेरे अब्बू भी बार-बार कहने लगे हैं कि मैं काफी कमजोर हो गया हूँ। मेरे चेहरे की
रौनक गायब होती जा रही है। वह मुझे लेकर काफी चिन्तित हैं। अम्मी भी अब कुछ ज्यादा
ही मेरे शरीर को टटोलने लगी हैं। उनके दुलार, प्यार से मैं डरने लगा हूँ। वह मुझे रात में सोने नहीं देती। वह बार-बार मुझे
पुकारती रहती हैं। मानों मैं अकेले छोड़कर उसे कहीं चुपके से चला गया हूँ।’’
कुछ
देर की खामोशी के बाद आनन्द ने मुस्कुराते हुए हमसे एक सवाल किया था ‘‘क्या सचमुच इन हालात के लिए मैं ही जिम्मेदार हूँ?’’
उसके
इस सवाल का हमारे पास कोई जवाब नहीं था। हमारी चुप्पी को तोड़ते हुए आनन्द ने फिर
बोला था,
‘‘अब सिर्फ एक ही रास्ता है जिससे पुराने दिन वापस लौट सकते
हैं। हम अपने उसूलों और समाज के प्रति जिम्मेदारियों को त्यागी के पास गिरवी रख
दें। उससे हम कम्प्रोमाइज करके उसके हाथों की कठपुतली बन जायें।’’
हमें
यह अच्छी तरह से मालूम था कि यह आनन्द के लिए नामुमकिन है। हमने आहिस्ता से अपनी
नजरें उठायीं। आनन्द ने फिर बोला, ‘‘चलो, जब मेरी ही वजह से तीन परिवार डिस्टर्ब हो गये हैं तो त्यागी के इस घिनौने खेल
में मैं शामिल होने के लिए तैयार हूँ।’’
यह
बात हमारे लिए बिल्कुल अविश्वसनीय थी। पिछले पन्द्रह वर्षों से आनन्द की जिद को हम
देख रहे थे। उसने समर्पण करना तो सीखा ही नहीं था। तब हम यही समझे थे कि वह
रामकेवल भाई की चेतावनी और रफीक का इस कदर टूट कर रोने का असर था।
रफीक
ने बताया था कि कल सेटरडे को त्यागी की मैरिज एनवर्सरी है। उसी मौके पर त्यागी के
सामने आनन्द अपना प्रस्ताव रखेगा।
सेटरडे
की दोपहर।
मध्य
जाड़े की खिली धूप में हम त्यागी के बंगले के सामने लॉन में खड़े थे। हम चारों के
अलावा आनन्द का एक दोस्त भी था- आशुतोष। वह आनन्द से मिलने के लिए दिल्ली से आया
था। हमने उसको भी साथ ले लिया था। सबके हाथों में ताजे फूलों का गुलदस्ता था। रफीक
गाढ़े हरे रंग के सूट पर मैरून कलर की टाई पहन रखा था। उस दिन वह बेहद खूबसूरत लग
रहा था। बंगले का दरवाजा त्यागी ने ही खोला था। हमने इस तरह से पहुंचकर सचमुच उसे
सरप्राइज कर दिया था।
बातचीत
पूरी तरह से घरेलू माहौल में हुई थी। पहले आनन्द ने आशुतोष का संक्षिप्त परिचय
दिया। फिर वह किसी अपराधी की तरह अपने अंदाज में कान पकड़ कर माफी मांगने लगा, ‘‘सारी सर! माफ कर दीजिए। मैं आपको समझ नहीं पाया। अब यह एहसास हुआ कि जीवन में
तरक्की के लिए आपकी ही बाते सही हैं। अब आप जैसा कहेंगे वैसा ही होगा।’’
‘‘वैसा
ही तो हो रहा है।‘‘ त्यागी ने ठहाका लगाया, ‘‘क्यों रफीक...?’’
‘‘..... लेकिन
अभी मैं बच्चा हूं सर! मैं सब कुछ नहीं समझ पाता। मुझे टेंशन हो जाती है। हम चाहते
हैं कि इस टेंशन को हम चारों लोग शेयर कर लें।’’
त्यागी
की बातों के बीच में ही आनन्द ने बहुत ही करीने से आशुतोष को इन्ट्रोड्यूज किया था, ‘‘सर! आपको यह जानकर बेहद खुशी होगी कि यह मिस्टर आशुतोष सिर्फ मेरे मित्र ही
नहीं बल्कि हमारी तरफ से आपकी मैरिज एनवर्सरी के मौके पर खास तोहफा हैं।’’
आनन्द
के तोहफे वाली बात हमारे लिए किसी पहेली से कम नहीं थी। उसने आशुतोष को त्यागी के
सामने बैठाकर बेहद संजीदगी से बात शुरू किया, ‘‘सर! यह राजधानी की एक बहुत बड़ी फर्म के सेल्स रिप्रजेन्टेटिव हैं। इनकी फर्म
देश के बड़े-बड़े विभागों में सप्लाई देती है और मनचाहा एस्टीमेट फाइल तैयार करती
है। सबसे बड़ी बात तो यह कि इनकी फर्म का नेकटवर्क इतना व्यापक और मजबूत है कि कोई जांच एजेन्सी हाथ लगाने से
डरती है। सर,
जब हमें करप्शन ही करना है तो क्यों छोटे लोगों के साथ करें
जहां हमेशा डर बना रहता है।’’
इसके
बाद आशुतोष अपना ब्रीफकेस खोलकर त्यागी को कनविन्स करने लगा। उसने त्यागी का
विश्वास जीतने के लिए उसके सामने तमाम डाक्यूमेंट्स रखे। त्यागी किसी घाघ अफसर की
तरह उसे खूब,
ठोंकपीटकर परखने लगा। वह बीच में बेहयाई की हंसी हंसते हुए बोला, ‘‘मुझे करप्शन का तरीका मत समझाइये आशुतोष बाबू। मैंने तो नौकरी ही करप्शन की कर
रखी है।’’
आशुतोष
उसकी हर बात को ‘यस सर’ - ‘यस सर’
कहता रहा। उसने त्यागी को यह भी समझाया, ‘‘सर! आपका तरीका पुराना हो चुका है, मै
आपको आई0टी0 युग का करप्ट बनाना चाहता हूँ। जहां मुनाफा ज्यादा और खतरा बिल्कुल नहीं है।’’
रामकेवल
भाई उठ कर लान में चले गये थे।
काफी
देर की जद्दोजहद के बाद आशुतोष ने आनन्द को मीडियेटर बनाकर उसे कनविन्स कर लिया।
त्यागी अगले वित्तीय वर्ष का परचेजिंग टेण्डर आशुतोष की फर्म को देने के लिए राजी
हो गया। इसके बदले उसने आशुतोष से दो लाख रुपये एडवान्स भी तुरन्त लिया।
हम
चुपचाप यह ड्रामा देखते रहे।
त्यागी
हमें गेट तक छोड़ने आया था। उसने सभी को पूरी गर्मजोशी से हाथमिलाकर विदा किया था।
आशुतोष
को दिल्ली की ट्रेन पर बैठाने के बाद उस दिन हम लोग खूब मस्ती किये किये थे। एक
अरसे बाद सिनेमा हाल में कामेडी फिल्म देखी गयी। इसके बाद हाइवे पर तेज रफ्तार में
लम्बी ड्राइविंग। चांदनी रात में खेत और गांव बड़े रूमानी लग रहे थे। गांव के ढाबे
पर अपनी-अपनी पसन्द का खाना खाया गया। खाने से पहले अलाव के किनारे चारपाई पर
बैठकर रफीक ने अपने जीवन की सबसे शानदार ग़ज़ल को बेहद दिलकश आवाज में सुनाया था। उस
ग़ज़ल में एक जन्नत की हूर थी। जो नीले आसमां से सफेद लिबास पहन हीरे-जवाहरात मणियों
के गहनों से लदी चांदनी के रथ पर बैठकर जमीं पर उतरी थी। कभी वह ऊँचे पहाड़ां से
उसे पुकारती तो कभी तपते रेगिस्तान से। कभी दूधिया झरनों के बीच से तो कभी फूलों
की घाटियों से। कभी वह भयावह जंगलों में ढूंढ़ती तो कभी समन्दर की कोख से। लेकिन यह
अभागा नजाने किस दुनिया में खो गया कि इसे ढूंढ़ते-ढूंढ़ते वह धुंध में धीरे-धीरे
विलीन हो गयी थी।
सभी
लोग वाह-वाह किये थे। मैं उसकी पीठ पर एक हल्की सी चपत मारकर बोला था, ‘‘अब तो इस जन्नत की हूर को अपने घर ले आओ। कब तक अम्मी से चूल्हा फुंकवाओगे।’’
रफीक
खाने पर टूट पड़ा था। उस दिन हम समझे थे कि अब हमारे पुराने दिन वापस लौट आये हैं।
सण्डे
की शाम।
रफीक
को छोड़कर सभी लोग परिवार सहित मेरे घर आ चुके थे। हम लोग ड्राइंग रूम में बाते
करने में मशगूल थे। बच्चे लाबी में वीडियो गेम में और महिलायें किचेन में।
धीरे-धीरे रात के आठ बज गये। रफीक नहीं आया। आनन्द ने बोला, “अरे भाई,
रफीक को फोन करो, देखो कहां रह गया। आज भी उसके साथ कोई हादसा तो नहीं हुआ?’’
मैं
बार-बार फोन लगाता रहा। कभी उसकी मोबाइल इंगेज होती तो कभी स्विच आफ। उसके घर पर
फोन किया तो अब्बू ने बताया, ‘‘बाबू, आज बहुत सबेरे ही उसे बड़े साहेब ने बुलाया। उसने दोपहर का खाना भी नहीं खाया।
शाम को फोन करके अपनी अम्मी को बताया कि वह रात में आपके यहां खाना खाकर आयेगा। सब
ठीक तो है न। कोई बात तो नहीं?’’
‘‘नहीं
चचा,
कोई बात नहीं है, किसी
काम से वह रुक गया होगा।’’
रात
के नौ बजे रफीक का फोन आया, ‘‘मैं त्यागी जी के
बंगले पर हूँ। काफी व्यस्त हूँ। मुझे देर भी हो सकती है। ऐसा होने पर तुम लोग खा
लेना। मैं आऊंगा जरूर...।’’
रात
के दस बजे तक रफीक का इंतजार हुआ। इसके बाद लोग खाना खाकर अपने-अपने घर चले गये।
आराधना बार-बार दरवाजा खोलकर सड़क निहारती। फिर अन्दर आकर उसे कोसने लगती। यह क्रम
देर रात तक चला। उसने रफीक के लिए जींस कल ही खरीद ली थी और गाजर का हलुआ सबेरे ही
तैयार कर लिया था। मैंने तो सबके साथ ही खा लिया था। रफीक को बिना खिलाये आराधना
कैसे खाती। आकांक्षा ने भी नहीं खाया। उसने साफ कह दिया था, ‘‘मैं रफीक अंकल के साथ खाऊंगी।”
उसके
रफीक अंकल नहीं आये। दोनो माँ-बेटी उपवास करके सोयीं।
मण्डे
की सुबह।
पूरे
शहर को घने कोहरे ने अपने आगोश में दबोच रखा था। अपने अगल-बगल के सिवाय कुछ और
देखना नामुमकिन था। ऐसा लग रहा था कि प्रकृति का बेटा कहीं खो गया है। उसके वियोग
में वह सिसक-सिसक कर रो रही है। जिससे उसकी आंखों में बलगम उतर आया है और उसके
आंसू टप-टप जमीन पर चू रहे हैं। फिर भी उसके दुख से बेपरवाह लोग अपने नियमित कामों
में व्यस्त थे।
आफिस
में हम तीन लोगों के अलावा और कोई नहीं था। रफीक और त्यागी अभी नहीं पहुंचे थे।
साहेब लाल चाय का दूध लेने के लिए सड़क पर गया था। आफिस के अन्दर दूधिया रोशनी थी।
आनन्द सैटेरडे की पहेली को आज हमें बता रहा था। उसके चेहरे पर दृढ़ता और आवाज में
अतिरिक्त आत्मविश्वास झलक रहा था। उसने अपने पॉकेट से मोबाइल सेट निकाला। आनन्द की
मुट्ठी में कैद सेट की स्क्रीन पर पिक्चर
चलने लगी थी। स्क्रीन पर त्यागी बड़ी निर्लज्जता से रिश्वत की बार्गेनिंग कर रहा
था। वह नोटों की गड्डी आशुतोष के हाथ से लेकर अपनी पत्नी के आंचल में डाल रहा था।
जिसे वह बार-बार अपने माथे से लगा रही थी। त्यागी फाइल पर साइन कर रहा था। हमने उस
दिन जो भी देखा था वह सब कुछ आज फिर स्क्रीन पर देख रहे थे।
‘‘त्यागी
को तुम मार डालोगे....? मैंने कहा था।
‘‘उसका
मरना जरूरी है भाई।’’ आनन्द बेहद इत्मीनान से
मोबाइल पाकेट में रखते हुए बोला था, ‘‘यदि अब भी वह
जिन्दा रहा तो हमारा विभाग मर जायेगा। हम मर जायेंगे। हमारा परिवार मर जायेगा।’’
‘‘लेकिन
आनन्द! एक बात समझ में नहीं आ रही है कि जब करप्शन को लेकर पूरे देश में काफी
हंगामा है। समय-समय पर मीडिया में तरह-तरह के स्टिंग आपरेशन आ रहे हैं। फिर भी
त्यागी तुम्हारे जाल में फंस कैसे गया। यह बात कुछ हजम नहीं हो रही है?’’
‘‘यही
तो बात है।’’
आनन्द ने मुस्कराते हुए बोला था, ‘‘मैं तुम लोगों से कई बार कह चुका हूँ कि करप्शन एक अय्याशी है। जिसकी मादकता
करप्ट इंसान को कभी तृप्त ही नहीं होने देती। बल्कि हर बार उसकी प्यास को बढ़ा देती
है। एक समय ऐसा आता है जब वह अपने को दुनिया का सबसे चालाक व्यक्ति समझने लगता है।
यहीं पर वह सनकी होकर मासूम लोगों की हत्या करने लगता है या खुद आत्महत्या कर लेता
है।’’
काफी
देर चुप रामकेवल भाई ने बोला, ‘‘आनन्द बाबू! देश
जासूसों की बदौलत नहीं चलता। जासूस हमेशा सत्ता के हथियार होते हैं। जासूसी करप्शन
का भी हथियार हो सकती है। मुझे अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है। जब किसी संगठन के पास
कोई नीति नहीं होती तो वे इसी तरीके का काम करते हैं और तब उसकी नीयत पर भी संदेह होने
लगता है।’’
‘‘रामकेवल
भाई! आप हमें डिमोरलाइज कर रहे हैं।’’ आनन्द
नाराज होकर बोला था।
‘‘आप
इस तरीके को अपनी बहुत बड़ी जीत मान रहे हो। अभी तक वह न तो मीडिया में आयी और न ही
सोशल मीडिया में। जरा आप अपने संगठन की वेबसाइट तो देखो।’’
वेबसाइट
में इसका कोई जिक्र नहीं था।
‘‘आशुतोष
को फोन करो।’’
आशुतोष
का फोन स्विच आफ।
‘‘अब
मुझे तुम्हारे आशुतोष पर संदेह होने लगा है। कहीं ....।’’
रामकेवल
भाई ने अभी अपनी बात पूरी ही नहीं की थी कि फोन की घंटी घनघना उठी। मैंने ही हाथ
बढ़ाकर रिसीवर को उठाया था। रिसीवर में पहले चीखने-चिल्लाने का कोहराम सुनाई दिया
था। उसके बाद की आवाज को सुनकर मुझे करंट-सा झटका लगा। रिसीवर हाथ से छूट गया।
मेरी आंखों के सामने तारे छिटक गये। उन तारों में पल भर के लिए एक भयानक तस्वीर
उभरी- छत की हुक से लटकी हुई लाश।
‘‘क्या
हुआ..... क्या हुआ....? वे दोनों एक साथ चीख पड़े
थे। मेरा शरीर निरन्तर शून्य होता जा रहा था। क्वेश्चन मार्क की शक्ल का रिसीवर
हवा में झूल रहा था। जिसमें से अभी भी लगातार आवाज आ रही थी, ‘‘साहब,
बब्बू ने खुदकशी कर ली.... बब्बू ने खुदकशी कर ली साहब.....
बब्बू ने ....।
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(चकबंदी, छोटे ठाकुर, गुलइची, भोर का सपना, रज्जब अली आदि चर्चित कहानियों के लेखक हेमंत जी तहबरपुर, आजमगढ़ में रहते हैं। जन संस्कृति मंच, उ.प्र. के उपाध्यक्ष हैं। पहला कहानी संग्रह प्रकाशनाधीन है। हंस, कथा, समकालीन जनमत, पल-प्रतिपल, गाँव के लोग आदि पत्रिकाओं में उनकी कहानियां प्रमुखता से प्रकाशित हो चुकी हैं। क्वेश्चन मार्क 'कथा-21' में पहले प्रकाशित हो चुकी है। दफ्तरों के भीतर साम्प्रदायिक राजनीति के हमले से खोखले होते समाज को देखने का एक मौका यह कहानी मुहैया कराती है। मोबाइल नं. 09793591905)