[प्रिय कवि नीरज पाण्डेय ने मातृभाषा दिवस के मौके पर अपनी माँ-बोली अवधी में यह फगुआ लिखा है।
पढ़ज्जा औ होलियाज्जा। होलिउ अउतिनि बा।]
बिदा करा
घर जाई भोजइतिन
बिदा करा
घर जाई...
कउने रंग
से ढांकी खुद का
कउने रंग
से ढांकी खुद का
कउने रंगे ओढ़ाई
हो कउने रंगे ओढ़ाई भोजइतिन
बिदा करा घर जाई...
सब रंगन
की हड़तालन मां
हड़तालन मां, हड़तालन मां
रंग गवा
मेहराई
मोरा रंग
गवा मेहराई भोजइतिन
बिदा करा
घर जाई...
कंडी
उपरी ओद परी बा
लकड़ी डिंगरी
घुन से भरी बा
घुन से भरी
बा, घुन से भरी बा
सरपत-नरकट
बोदा होइगा
कैसे
होली जराई भोजइतिन
बिदा करा
घर जाई...
जेकरे
खातिर पेट जरत है
पेट जरत
है जिउ कलपत है
बीच
डगरिया छोड़ि के भागा
ऊ होइगा
हरजाई
हो ऊ
होइगा हरजाई भोइइतिन
बिदा करा
घर जाई...
अस फगुआ
हम कबहुं न खेले
कबहुं न
खेले, कबहुं न खेले
सांसत मां
सब खेल-खेलाड़ी
कि देखतइ
छूटइ रोवाई
हो देखतइ
छूटइ रोवाई भोजइतिन
बिदा करा
घर जाई...
बिदा करा
घर जाई भोजइतिन
बिदा करा
घर जाई...