क्यों हमारे लिए है अभिशाप?
क्या न गोवर्धन उठाने
आयेंगे श्रीकृष्ण अपने आप?
डूबते हैं हम नहीं, मरते नहीं
मरने का कुछ jatan भी करते नहीं
हाँ, टपकते छप्परों औ गलगलाती भूमि पर
सब सहते हैं चुपचाप ,
क्या न बादल सोख लेंगे समंदर की ही तरह
लक्ष्मण चढ़ा कर चाप!
जड़ से उखड़े दरख्तों की ही तरह
साजिशन पलटाये तख्तों की तरह
एकदम से आम अपनी ज़िन्दगी यह
तिस पे बदसूरत घिनाती गंदगी यह
छोडती है कबीलाई
या महानगरी घुटन की छाप ,
क्या न आयेंगे यहाँ कमलेश्वर
शैलेश मटियानी , कोई राजेंद्र यादव
कलम लेकर मिटाने संताप !!
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