Thursday, September 27, 2012

Gazal


गज़ल

 
अब मैं धीरे-धीरे अपनी किस्मत लिखता हूँ

हासिल के खाते में उनकी खिदमत लिखता हूँ

 

उनकी खिदमत जिसमें आँखें बूढ़ी हो आईं

बूढ़ी आँखों की अनदेखी हसरत लिखता हूँ

 

हसरत भरी निगाह बचा कर रक्खी सालों-साल

उन्हीं नज़ारों की खातिर अब रहमत लिखता हूँ

 

कागज़ पर अशआर और अल्फाज़ उतर आते

जब दीवानेपन में आ मैं वुसअत लिखता हूँ

 

मुस्तकबिल का लेखा जो तैयार कर रहा हूँ

उसमें अपनी हर चाहत को नफरत लिखता हूँ

 

और कलम जब-जब सुस्ताने का मन करता है

तब-तब मैं कागज़ पर केवल हरकत लिखता हूँ

 

इधर ज़िंदगी में जो कुछ तब्दीली आई है

उससे खुश होकर सोनम-सी बरकत लिखता हूँ

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