Monday, December 14, 2020

एक विस्मरणीय संस्मरण : आलोक कुमार श्रीवास्तव

मैं बी.ए. द्वितीय वर्ष की परीक्षा दे चुका था। तृतीय वर्ष के लिए अंग्रेज़ी और हिन्दी विषयों का चुनाव भी मन में कर चुका था। जून का महीना भी बीत चुका था। मेरी उम्र भी 18 वर्ष हो चुकी थी। जन्म से ही एक बिल्कुल साधनविहीन परिवार का अब तक का अनुभव दिमाग को धनोपार्जन की युक्तियों की तरफ मोड़ देता था। अपनी ज़रूरत का कुछ हिस्सा ट्यूशन से प्राप्त पैसों से पूरा हो सकता था लेकिन परिवार के प्रति लगाव और जिम्मेदारी का भाव नैतिकता की मांग बनकर वैसा करने से रोक देता था। कुल चार जीवित भाई बहनों में मैं अंतिम था लेकिन तब तक किसी की शादी नहीं हुई थी। पिता जी वही पितृसत्तात्मक समाज के प्रतिनिधि थे - बेटियों को घर से बाहर निकलने देने के विरोधी। उन दिनों वे दुष्ट होने की हद तक जड़ व्यक्ति थे। तुलसीदास का रामचरितमानस ही उन दिनों उनका पथ प्रदर्शक ग्रंथ था। दोनों बहनों ने 1992 में इंटरमीडिएट पास किया था लेकिन पिता जी ने अगले सात आठ वर्षों तक उन्हें न तो कुछ पढ़ने लिखने दिया और न ही घर से बाहर निकलने दिया। वे जब भी घर से निकलीं तो या तो शौच जाने के लिए या फिर फाइनली अपनी अपनी ससुराल जाने के लिए। सन् 1992 के अंत में बाबरी मस्जिद भी तोड़ी गई थी। यह कट्टरपंथी हिन्दू संगठनों के उत्कर्ष का समय था। पिता जी RSS और विश्व हिन्दू परिषद के नेताओं के सम्पर्क में रहते थे। हमारे गांव में भी राम लिखी ईंट अाई थी जिस पर लोगों द्वारा यथाशक्ति पैसे और अनाज चढ़ाए गए थे। धर्म की तो जय हो रही थी मगर हमारी हालत बेहद दयनीय होती जा रही थी। बी ए का छात्र होने और बालिग होने के बाद मैंने पिताजी को कभी कभी आड़े हाथों लेना शुरू किया जो अभी तक जारी है। उस समय की जीवन की विषम स्थितियों से निकलने का एक ही रास्ता नजर आता था कि मैं कुछ नियमित आय का रोज़गार पकड़ूं। अध्यापन में रुचि थी। एक दिन पिता जी को चुनौती दे दी कि तुम्हारे इन हिन्दू नेताओं का एक स्कूल भी तो चलता है, उसमें मुझे पढ़ाने का मौका क्यों नहीं मिल सकता? पहली बार पिताजी मेरी चुनौती पर गंभीर हुए क्योंकि मैं एक तो मेहनती और अनुशासनप्रिय था, दूसरे लड़का था। उन दिनों उच्च शिक्षा की कक्षाओं के सत्र विलम्ब से चलते थे। जून, जुलाई, अगस्त महीनों तक परीक्षाएं होना आम बात थी। सितंबर से पहले बी ए की कक्षाएं कदापि शुरू नहीं होती थीं। लेकिन प्राइमरी स्तर के नर्सरी स्कूल पक्का जुलाई में शुरू हो जाते थे। मेरी योजना जुलाई से सितंबर - अक्टूबर तक इन्हीं महीनों का इस्तेमाल स्कूल में अध्यापन का अनुभव प्राप्त करने और कुछ अधिक पैसे कमाने के लिए करने की थी। 

RSS वालों का स्कूल सरस्वती शिशु मंदिर हमारे गांव से कस्बे जाने वाले रास्ते पर ही पड़ता था। एक लालच यह भी था कि स्कूल में पढ़ाऊंगा तो सोरांव के बनियों के बच्चों के ट्यूशन भी मिल सकेंगे। पिता जी ने अपने संघी परिचितों से बात करके मुझे शिशु मंदिर में अध्यापकों के चयन की प्रक्रिया बताकर अपने को इस प्रसंग से अलग कर लिया। कारण यह था कि वे यह नहीं जाहिर होने देना चाहते थे कि एक पिता के तौर पर वे अपने बच्चों के खर्चे नहीं पूरे कर पा रहे हैं। इससे उनका ईगो हर्ट होता। वे तो आखिर परिवार रूपी राष्ट्र के प्रमुख थे, अपनी विफलता का ढिंढोरा क्यों पिटवाते? बहरहाल, मैंने इस थोड़े से ही सहयोग के लिए उनका आभार माना और अपने रोजगार की तलाश के मिशन पर निकल पड़ा।
....

जुलाई का पहला हफ्ता था। सरस्वती शिशु मंदिर, गिरधरपुर में बच्चों की आमद अभी बहुत कम थी। प्रवेश प्रकिया शुरू ही हुई थी और आचार्य जी लोगों को आसपास के गाँवों में जाकर ‘पात्र’ विद्यार्थियों की तलाश करनी थी। गाँवों में शिक्षा से वंचित बच्चे तो बहुत थे लेकिन सबको शिशु मंदिर में प्रवेश नहीं मिल सकता था। सबसे पहले तो कोई मुसलमान बच्चा वहाँ पढ़ने नहीं जा सकता था। उसके बाद गरीबों और दलितों का नम्बर था। कुछ दलित बच्चों को प्रवेश केवल उनके अभिभावकों की ऊँची हैसियत और अमीरी को देखकर दिया जाता था साथ ही स्कूल में ऐसे बच्चों को मांसाहार न करने और नियमित पूजा-पाठ करने के निर्देश दिए जाते थे। मैंने अब तक इस स्कूल को रास्ते से आते-जाते ही देखा था, कभी भीतर नहीं गया था। उस बाहरी प्रेक्षण के आधार पर मेरी जानकारी यही थी कि वहाँ सबसे ज्यादा सोरांव कस्बे के बनियों के बच्चे पढ़ते हैं और इसके बाद सरांय बाजू, धामापुर, जंगलपुर, गिरधरपुर और रइया गाँवों से आने वाले ब्राह्मण (एकाध ठाकुर भी) और शेष ओबीसी समुदाय के लोगों के बच्चों का नम्बर आता था।

स्कूल का शिक्षक बनने से जुड़ी औपचारिकताओं को समझने के लिए मैं स्कूल के कार्यालय में गया। वहाँ दो लोग बैठे थे। एक थे छरहरे और फुर्तीले दिखने वाले प्राचार्य श्री राधेश्याम तिवारी और दूसरे थे पके कद्दू की तरह दिखने वाले नाटे-मोटे-कंजे आचार्य जी, जिनका नाम अभी बिल्कुल याद नहीं आ रहा है। यह ज़रूर याद आ रहा है कि वे ज्यादातर स्कूल के क्लर्क का काम करते थे, हालांकि थे मल्टी-टास्किंग। रास्ते से गुज़रते हुए मैंने उन्हें कई अलग-अलग काम करते हुए देखा था। उस समय वे उस दिन जमा हुई एक बच्चे की फीस को स्टेट बैंक की सोरांव शाखा में जमा करने के लिए डिपॉज़िट स्लिप भर रहे थे। चूँकि मैं अकेला गया था इसलिए मुझे अपना परिचय भी देना था और आने का उद्देश्य भी बताना था। उन दिनों मैं कतई विनम्र नहीं था और उजड्ड होने की हद तक स्ट्रेट फॉरवर्ड था। मैंने बड़े रूखे तरीके से बातचीत की शुरुआत की थी लेकिन प्राचार्य जी ने उस पर अपनी सभ्यता, विनम्रता और उदारता की चिकनाई चुपड़कर हमारे संवाद को सार्थक बना दिया। उनके अच्छे व्यवहार के कारण मेरा आत्मविश्वास भी बढ़ा और मैं अपने मंतव्य को पूरी तरह सामने रख सका।

सरस्वती शिशु मंदिर, गिरिधरपुर, सोराम, प्रयाग के प्राचार्य श्री राधेश्याम तिवारी ने मुझे अपना मुरीद बना लिया। मैं उन्हें मित्र समझने लगा। (हालांकि उनके द्वारा सोरांव को सोराम और इलाहाबाद को प्रयाग लिखने और बोलने का मुरीद मैं न बन सका। उल्लेखनीय है कि सोरांव का नाम आज भी सोरांव ही है और इलाहाबाद का नाम तब प्रयागराज नहीं था।) जिस मैत्रीपूर्ण भाषा में उन्होंने मुझे विद्या भारती का अध्यापक बनने की प्रक्रिया और चरण का परिचय दिया, उससे मेरे मन में यही धारणा बनी कि यह एक व्यवस्थित प्रक्रिया है और इसके चरणों को पूरा करके मैं अध्यापक बन सकता हूँ।                   

...

किसी काम की प्रक्रिया जितनी घुमावदार हो, वह काम उतना ही महान लगने लगता है। शिशु मंदिर का अध्यापक बनने की प्रक्रिया राधेश्याम तिवारी जी ने मुझे उतनी ही घुमावदार बताई थी जितने से मुझमें थोड़ा महानता बोध तो जगे ही साथ ही मैं शिशु मंदिर को कोई आम स्थानीय स्कूल न समझ बैठूं। उन्होंने बताया कि यदि आपका चयन हो जाता है तो नियुक्ति जिला कार्यालय के माध्यम से होगी। चयन के लिए परीक्षा और साक्षात्कार देने जिला कार्यालय ही जाना होगा और संगठन के जिला मंत्री जी स्वयं लिखित परीक्षा में सफल अभ्यर्थियों का साक्षात्कार लेते हैं। जिला तो मैं इलाहाबाद को ही जानता था जो कि सरकारी तौर पर भी हम लोगों का मुख्यालय था और सामाजिक तौर पर भी। लेकिन जिस संस्था में मैं बतौर अध्यापक घुसने जा रहा था, उसका जिला मुख्यालय इलाहाबाद नहीं बल्कि फूलपुर था। फूलपुर मेरी जानकारी में एक तहसील  और एक लोक सभा क्षेत्र तो था लेकिन जिला मुख्यालय के रूप में उसका नाम पहली बार मेरे सामने आया। अटपटेपन का यह पहला अनुभव था। आगे और भी अटपटे अनुभव होने बाकी थे।

विद्या भारती का जिला कार्यालय (RSS के प्रशासनिक ढांचे के अनुसार) गोमती इंटर कालेज, फूलपुर में था और जिला मंत्री लालजी द्विवेदी या तिवारी वहीं बैठते थे। सरस्वती शिशु मंदिर, गिरधरपुर के प्रधानाचार्य राधेश्याम तिवारी जी ने इस पूरे प्रसंग को मेरे लिए जिला स्तरीय घटना बना दिया था और मैंने इस घटना का सामना करने के लिए समुचित तैयारी भी की। हिंदी और अंग्रेजी व्याकरण की जो भी गाइडें, कुंजियां, किताबें घर में मिलीं, सबको तेजी से पढ़ गया। साक्षात्कार के लिए सामान्य ज्ञान की बातों पर गौर किया। अख़बार पढ़ा। उपकार प्रकाशन, आगरा की एक छोटे आकार की किताब में दिए गए तथ्यों को इतनी गहराई से पढ़ा और आत्मसात किया कि वे आज भी याद हैं। 

राधेश्याम जी द्वारा दी गई जानकारियों और दिशानिर्देशों के हिसाब से मैं चयन प्रक्रिया में शामिल होने उसी हफ्ते के शनिवार को फूलपुर के लिए निकला। इससे पहले कभी फूलपुर नहीं गया था। यूं तो साइकिल से ही जाना ठीक रहता, लेकिन बरसात होने पर भीग जाने और बरसात न होने पर पसीने से भीग जाने के डर से बस पकड़ी क्योंकि यह इंटरव्यू में शामिल होने का मामला था। हालांकि फूलपुर पहुंचने पर उस सनसनी को महसूस न कर पाने पर मुझे निराशा हुई, जो राधेश्याम जी ने चयन प्रक्रिया के नाम पर मेरे मन में बैठा दी थी। वहां तो बड़ा नीरस माहौल था। पहले तो लगा कि नाहक ही यहां आ गया क्या, यहां तो कोई पुछत्तर ही नहीं है। पर कुछ समय बिताने के बाद माहौल समझ में आने लगा। मेरे अलावा छह या सात और लोग भी उस चयन प्रक्रिया में हिस्सा लेने के लिए हाजिर हुए। उनमें सर्वाधिक पढ़े लिखे व्यक्ति थे श्री यतीश कुमार मिश्र, जिन्हें पहली दफा मैंने सतीश कहा क्योंकि तब तक मैंने यतीश नाम सुना ही नहीं था। वे समाज शास्त्र में एम ए थे और वहां आए लोगों में देखने में भी सबसे साफ़ सुथरे लग रहे थे। उन्हें उनके चाचा जी ने वहां के लिए रिफर किया था। अपने नाम का सही उच्चारण बताने के बाद उन्होंने मुझसे कोई संवाद नहीं किया और अपने चयन की आश्वस्ति और आत्मविश्वास के साथ अपने एकेडमिक दस्तावेजों को बारी बारी से देखते हुए तब तक बैठे रहे जब तक कि चयनकर्ता महोदय ने सर्वप्रथम उन्हें बातचीत के लिए आमंत्रित नहीं कर लिया।

...

राधेश्याम तिवारी जी ने अपनी तरफ से बड़ी फिक्रमंदी के साथ एक आवेदन मुझसे लिखवाया था और उसी आवेदन पत्र को अपनी शैक्षणिक योग्यता के अंक पत्रों के साथ लेकर मैं विद्या भारती के जिला कार्यालय पहुंचा था। हालांकि उनके द्वारा लिखवाए गए आवेदन की भाषा हास्यास्पद होने की हद तक विनम्रता से भरी थी लेकिन चूंकि वे स्कूल के प्रधानाचार्य थे और मुझसे भी विनम्रता से पेश आ रहे थे इसलिए उनका लिहाज करके मैंने उसे रहने दिया। मजे की बात तो यह हुई कि यहां उस पहले से लिखकर लाए हुए आवेदन को सिरे से नकार दिया गया। यहां पूरी चयन प्रक्रिया के दौरान नियोक्ता पक्ष के तीन महानुभावों से मेरा सामना हुआ। इन तीन में से दो के व्यक्तित्व बेहद उबाऊ और थकाऊ थे। शिक्षा के काम से जुड़ी किसी संस्था के जिला कार्यालय में ऐसे व्यक्तियों का पाया जाना अपने आप में अच्छा लक्षण नहीं है, लेकिन मैं वहां संस्था को बदलने नहीं, सिर्फ कुछ महीनों के लिए नौकरी तलाशने गया था लिहाजा इसे अपने मिशन का एक पड़ाव मानकर झेलता गया। पहले पहल यही दो व्यक्ति मिले। इनमें से ही एक सज्जन जिला मंत्री जी थे। उनका ज्यादा जोर परिचय और सामाजिक मेल मिलाप पर था। परिचय और पूछताछ के बाद उन्होंने हम लोगों को दूसरे सज्जन के हवाले कर दिया। दूसरे सज्जन मिश्रा जी थे जो उसी क्षण हम लोगों को प्रशिक्षु और खुद को प्रशिक्षक मान बैठे। उनके ऐसा मानने के पीछे समुचित कारण भी था। उनके स्कूलों में जितनी रिक्तियां थीं उनकी तुलना में बहुत कम (कुल सात) उम्मीदवार आए थे तो वे किसे रिजेक्ट करते। सबको सेलेक्ट करना ही था। इसलिए उन्होंने सीधे हमें ड्राफ्टिंग पढ़ाना शुरू कर दिया। छोटे बच्चों का एक क्लासरूम था, वही रूम तत्काल हमारा ट्रेनिंग हॉल बन गया। आचार्य के रूप में नियुक्ति हेतु प्रार्थना पत्र का मजमून उन्होंने सबको एक साथ डिक्टेट करना ठीक नहीं समझा और सबको बारी बारी से अलग अलग तरीके से लाइन दर लाइन मजमून लिखाने लगे। इससे बड़ा कन्फ्यूजन पैदा हुआ। लगभग सबको अपने अपने आवेदन में काटपीट करनी पड़ी। बाद में मुझे उनके ऐसा करने का रहस्य समझ में आया। मिश्रा जी असल में एक कुंठित व्यक्ति थे। अपनी कुंठा का शमन करने के लिए ही वे प्रार्थना पत्र लिखाने की यह प्रविधि अपनाते थे। जब सबके प्रार्थना पत्र में काटकूट हो गई तो मिश्रा जी प्रसन्न हुए। यह उनके विजय का क्षण था जिसे वे ज्यादा देर तक सेलिब्रेट नहीं कर सके क्योंकि उसी समय चयन प्रक्रिया के सबसे अहम सदस्य तीसरे महानुभाव वहां आ गए और हम लोगों में से सबसे महत्वपूर्ण अभ्यर्थी यतीश जी को उनसे परिचित कराने तथा साक्षात्कार की औपचारिकता पूरी करने के लिए जिला मंत्री जी ने उन्हें अपने पास बुला लिया। उनके लिए प्रार्थना पत्र की औपचारिकता को शिथिल कर दिया गया, शेष लोग मिश्रा जी की निगहबानी में आवेदन पत्र लिखने या न लिखने के द्वंद्व का आस्वाद लेते रहे। 

कमरा वही था, बस यतीश जी बिना किसी फास्टेस्ट फिंगर फर्स्ट के ही हॉट सीट पर पहुंच गए थे। चयनकर्ताओं की त्रिमूर्ति के साथ उनके वार्तालाप को मैं ध्यान से सुनने लगा ताकि अपनी बारी आने पर कदाचित उसका कुछ सदुपयोग कर सकूं। इस बीच मैंने मिश्रा जी के फॉर्मेट वाला आवेदन पत्र भी लिख डाला। जो तीसरे महत्वपूर्ण महानुभाव आए थे, उनका व्यक्तित्व छुटभैया नेता जी वाला था। गोमती इंटर कालेज के प्रबंध तंत्र के आदमी थे। व्यस्त प्रतीत होते थे। यतीश जी का संदर्भ उन्हें ज्ञात था। प्रत्यक्ष परिचय के बाद आगे पीछे के तमाम परिचय का आदान प्रदान भी उन लोगों  के बीच हुआ। यतीश कुमार मिश्र के रूप में एक सुयोग्य आचार्य मिल जाने का उल्लास उनके ही नेतृत्व में प्रकट हुआ जिसमें जिला मंत्री जी और मिश्रा जी भी शामिल हुए।  

...

छुटभैये चयनकर्ता जी ने मिश्रा जी द्वारा रचे गए औपचारिक माहौल को सीधे ही साक्षात्कार की शुरुआत करके पल भर में अनौपचारिक बना डाला था। मिश्रा जी बहुत दिनों से वहां सैंडिल घिस रहे होंगे और मकुनी की तरह पिस रहे होंगे मगर प्रबंधन की दया दृष्टि की कमी उनकी कुंठा में वृद्धि का कारण बनती होगी। सरस्वती और लक्ष्मी के द्वंद्व में लक्ष्मी ही राज करती हैं, इस व्यवस्था को शायद मिश्रा जी अंगीकार कर चुके थे। तभी तो छुटभैये चयनकर्ता के मोर्चे पर आते ही उन्होंने फौरन क्लर्क वाली जिम्मेदारी संभाल ली। अब वे पूर्वोक्त दो प्रमुख चयनकर्ताओं से आदेश लेकर यतीश जी का नियुक्ति पत्र तैयार कर रहे थे। उनकी आज्ञाकारिता की पराकाष्ठा का एक नमूना यह था कि छपे छपाए फॉर्मेट वाले नियुक्ति पत्र में कौन से पैराग्राफ (अप्रासंगिक होने के कारण) काट दिए जाएं, यह भी वे जिला मंत्री जी और दूसरे सज्जन से बार बार पूछ रहे थे। नियुक्ति पत्र की प्रतियां तैयार कर लेने के बाद प्रतियों के बीच से कार्बन निकाल कर बड़े अदब के साथ उन्होंने जिला मंत्री जी के हस्ताक्षर लिए। मैंने सोचा कि इस संस्था में मल्टीटास्किंग लोग हर जगह हैं। गिरधरपुर वाले कद्दू छाप आचार्य जी की याद अाई जो वहां बैंक की डिपॉज़िट स्लिप भर रहे थे।
इस यतीश कुमार मिश्र प्रकरण की तफ़्सील देने के पीछे मेरा उद्देश्य सिर्फ़ यह है कि आप जान सकें कि विद्या भारती कोई निष्पक्ष, न्यायप्रिय, लोकतांत्रिक मूल्यों वाली संस्था नहीं है। जहां कोई कॉम्पटीशन ही नहीं है, वहां भी ये जाति (ब्राह्मण) वाद और भाई भतीजावाद करने में कोई संकोच नहीं करते। कुछ नहीं तो अपने आदमी को लाइन में आगे कर लेने का ही सुख ले लेना। यतीश को ब्राह्मण होने और छुटभैये चयनकर्ता के परिचित का रिश्तेदार होने का अलिखित आरक्षण मिला था। 
ख़ास उम्मीदवार की चयन प्रक्रिया पूरी करने के बाद चयनकर्तागण हम आम उम्मीदवारों से मुखातिब हुए। हम लोगों के लिए उस आवेदन पत्र को लिखित परीक्षा मान लिया गया जो मिश्रा जी की कुंठा के शमन का साधन था। इस एक्सिडेंटल लिखित परीक्षा में मैं प्रथम आ गया क्योंकि जिला मंत्री जी को न केवल मेरी लिखावट और शैली अच्छी लगी थी बल्कि इस बात को उन्होंने मेरी बुद्धिमत्ता का प्रमाण माना कि जिस समय वे लोग पहले उम्मीदवार का चयन कर रहे थे उसी समय के दौरान मैंने वह आवेदन लिख डाला था। पुष्टि के लिए उन्होंने वह पुराना आवेदन पत्र मुझसे मांगा जो राधेश्याम जी ने लिखवा कर भेजा था। दोनों की तुलना करते हुए उन्होंने राधेश्याम जी की कुछ विशेषताओं का उल्लेख किया जिनसे यह अनुमान लगाना कठिन था कि वे विशेषताएं गुण थीं या अवगुण। मेरा अपना आकलन यह था कि हैं तो वे गुण ही लेकिन ईर्ष्या का अपमिश्रण होने के कारण अवगुण लग रही हैं।
कुल मिलाकर मेरे लिए राहत की बात यह थी कि अब मैं चयन प्रक्रिया में दूसरे नंबर पर आ गया था। नियुक्ति तो होनी ही थी, पर बात अब तैनाती के स्थल को लेकर फंस गई। जिला मंत्री जी का मानना था कि मेरी योग्यता का पूरा इस्तेमाल हरिसेन गंज या मऊ आइमा स्थित विद्यालयों में से किसी में बेहतर हो सकता है। वहां बेहतर वेतन की भी संभावना थी, लेकिन मेरी समस्या ये थी कि ये दोनों स्थान सोरांव से इलाहाबाद जाने वाले रास्ते पर न होकर प्रतापगढ़ वाले रास्ते पर थे - मतलब मेरे लिए बिल्कुल उल्टा होता। मैंने यही निवेदन किया कि मुझे गिरधरपुर वाले स्कूल में ही तैनात किया जाए क्योंकि फिलहाल मेरे लिए यही सुविधाजनक है। छुटभैये चयनकर्ता ने इसे मेरी मूर्खता समझकर मुंह बिचकाया लेकिन जिला मंत्री जी ने कहा - ठीक है। लेकिन वहां का वेतन हम नहीं बता सकते। वहां बच्चे कम हैं और स्थानीय प्रबंध तंत्र से कोई सहयोग मिलता नहीं, वहां राधे श्याम जी और शुक्ला जी (वही कद्दू छाप आचार्य जी जिनका नाम पहले मुझे याद नहीं आया था) जैसे लोग ही निर्वाह कर सकते हैं। 
मैं उनका संकेत समझ गया। उन्होंने मेरे लिए एक और रास्ता खुला रखने के लिए मुझसे वहीं अन्य पसंदीदा विकल्प भी भरवा लिए जिनमें हरीसेन गंज और सहकारी कताई मिल, मऊ आइमा का नाम लिखवाया ताकि कभी मेरा मन बदले तो मैं वहां ट्रांसफर करा सकूं।

...

आखिरकार मेरा नियुक्ति पत्र भी तैयार हुआ। जिला मंत्री जी के हस्ताक्षर के उपरांत वह मेरे लिए एक महत्वपूर्ण दस्तावेज़ बन गया। पत्र की तीन प्रतियों में से दो प्रतियां मुझे सौंपने का निर्णय लेते हुए जिला मंत्री जी ने कहा कि इस तरह की डाक ले जाने का कार्य ऐसे तो शुक्ला जी (वही पके कद्दू जैसे दिखने वाले मल्टी टास्किंग आचार्य जी जिनका नाम पहले मुझे नहीं याद आ रहा था) ही करते हैं लेकिन आप को विद्यालय जाना ही है इसलिए दोनों प्रतियां आप को ही दे रहे हैं। एक प्रति आपके लिए है और एक प्रति विद्यालय के कार्यालय के लिए। राधेश्याम जी को देंगे तो वे आपको ज्वाइन करा लेंगे। 

अपनी तात्कालिक सफलता के नशे में मुझे शुक्ला आचार्य जी के जीवन की विडम्बना पर उस समय तो हंसी अाई लेकिन बाद में उन्हें एक हाथ से धोती का सिरा और साइकिल का हैंडल संभालते और (शायद बवासीर के प्रकोप के कारण) एक कूल्हा उठाए टेढ़े होकर साइकिल जोतते देखकर मन करुणा से द्रवित हो जाता था। भंवर मेघवंशी जी की आत्मकथा में RSS को कई बार ब्राह्मणवादी संगठन कहा गया है। लेकिन यहां तो ब्राह्मण भी संघ के शोषण और उत्पीड़न का शिकार हो रहा था। फिर संघ ब्राह्मणवादी कैसे हुआ? पिता जी एक छुट्टा भैंसे की कहानी सुनाते थे जिसमें एक चतुर किसान जाड़े के मौसम  में उस भैंसे को बीड़ी पिलाकर मुंह अंधेरे पुर (रहट) में नाध देता था और उजाला होने और बीड़ी का नशा उतरने से पहले मतलब भर की सिंचाई कर लेता था। शुक्ला जी जाति, धर्म, विद्वता, आचार्यत्व के नशे में संघ की गुलामी में जोते गए मजूर थे। रिक्शा चलाने वाले मजूर से भी बदतर परिस्थितियों में कार्यरत थे लेकिन उन्हें अपने शोषण की कोई खबर नहीं थी।
मैंने देखा कि कर्मचारी के शोषण का यह तरीका तो पूंजीवाद की विशेषता है। श्रम का उचित मूल्य न देकर ही तो सारे पूंजीवादी ढांचे खड़े हुए हैं। संघ परिवार की कितनी ही संस्थाएं मुफ्त के श्रम की पूंजी से बनी हैं। इसलिए मैं भंवर जी के निष्कर्ष में यह जोड़ना चाहता हूं कि RSS ब्राह्मण आधिपत्य वाला एक पूंजीवादी संगठन है। 
...

ब्राह्मणवादी RSS पूंजीवादी कार्यशैली से गठजोड़ के बाद जब बलवान हो जाता है तब वह अपने फासीवादी एजेंडे को लागू करने लगता है। नागरिकता संशोधन विधेयक इसका ताज़ा उदाहरण है। भारत में यातना शिविरों की स्थापना की तैयारी शुरू की जा चुकी है। यह मनुष्यता के ह्रास का दौर है जिससे गुज़र कर ही खुद को बचाना हमारा कर्तव्य है।
नियुक्ति पत्र हासिल कर लेने के बाद सोमवार उस पर अमल करने का दिन था। मैं विद्यालय पहुंचा। शुक्ला जी बड़े बाबू की भूमिका में और राधेश्याम तिवारी जी कार्यालय प्रमुख की भूमिका में थे। मैं तो खैर विजेता था ही। मेरी सफलता पर राधेश्याम जी ने बधाई दी और स्वागत किया लेकिन शुक्ला जी उदासीन रहे - बिल्कुल बड़े बाबू की तरह। राधेश्याम जी को उसी समय एक कक्षा में पढ़ाने जाना था, वे चले गए तो शुक्ला जी ने धीमी किन्तु चुनौतीपूर्ण आवाज में मुझसे कहा - आपको अपना पहनावा बदलना होगा आलोक जी। धोती पहन लेते हैं? सच कहता तो मेरा जवाब हां होता। मुझे धोती पहननी आती थी और मैं घर पर धोती पहनता भी था। (अब भी पहनता हूं। बनियान और धोती मेरी प्रिय पोशाक रही है। पिछले दिनों गोरखपुर विश्वविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. रामनरेश राम जी ने मेरे पुराने घर के गिरने की फेसबुक पर तस्वीर देखने के बाद फोन किया तो पिछले दिनों की स्मृति खंगालते हुए उन्होंने यही याद दिलाया कि उस पुराने घर में जब वे पहली बार आए थे तो मैं बनियान और धोती पहने हुए था।)
लेकिन उस समय मैंने शुक्ला जी के प्रश्न का उत्तर देने के बजाय उल्टे उनसे प्रश्न किया कि धोती पहनने से मेरी नियुक्ति का क्या संबंध है। वे मेरी मूर्खता पर कुछ देर मुस्कराते रहे। उस मुस्कान पर मैं क्या न्योछावर करता कि वे इस रहस्य पर से (धोती का) पर्दा हटाते। उन्होंने फौरन कुछ नहीं बताया। बस यही कहा कि प्रधानाचार्य जी ने पहले इस पर आपसे चर्चा नहीं की थी? मैंने कहा - जी नहीं। उन्होंने कहा - अभी वही बताएंगे आपको। ऐसा कहकर वे पुनः अपनी खाताबही में लीन और मेरी ओर से मौन हुए।

प्रधानाचार्य श्री राधेश्याम तिवारी जी कक्षा से लौटे तो बड़े बाबू शुक्ला आचार्य जी ने उनसे धोती कुर्ता वाली बात की। उन्होंने कहा - अरे, उसमें कोई समस्या नहीं है। थोड़े दिनों में अभ्यास हो जाएगा। मेरे कुर्ते धोती का एक सेट यहां कार्यालय में रखा ही रहता है, जब तक आलोक जी खुद खरीद नहीं लेते तब तक मेरा पहनेंगे। फिर शुरू में अगर बाहर थोड़े दिन अटपटा लगे तो ये भी अपना कुर्ता धोती यहीं कार्यालय में रख देंगे। यहां सुबह बच्चों के आने से पहले, जल्दी आकर पहन लिया करेंगे। 

उनके इन प्रस्तावों पर मुझे मन ही मन हंसी आ रही थी, लेकिन मैंने अपने चेहरे पर क्रोध के भाव प्रकट किए और पूछा कि धोती कुर्ता पहनना जरूरी क्यों है? मेरी नियुक्ति अंग्रेजी और हिंदी पढ़ाने के लिए हो रही है, मैं संस्कृत का आचार्य नहीं हूं जो धोती पहनकर पढ़ाऊं। मुझे धोती पहनना आता है और मेरे पास धोती है भी, लेकिन सवाल यह है कि धोती पहनकर पढ़ाने की जरूरत क्या है? जब बच्चे पैंट शर्ट पहन ही रहे हैं तो अध्यापक के लिए धोती कुर्ता क्यों? 

मैं राधेश्याम जी से किसी तर्कपूर्ण उत्तर की मांग कर रहा था लेकिन उन्होंने यह कहकर मुझे निराश कर दिया कि ऐसा प्रांतीय कार्यालय, गोरखपुर द्वारा जारी विद्या भारती की अध्यापक नियमावली में लिखा है और आपकी नियुक्ति की शर्त ही यही है कि आप उक्त नियमावली में दिए गए सभी नियमों का पालन करने पर सहमत हैं। मैंने कहा कि वह नियमावली कहां है, मुझे दिखाइए। उन्होंने कहा कि नियमावली जिला कार्यालय में होगी। आप गए थे, वहां आप चाहते तो देख सकते थे। मैंने कहा - कोई बात नहीं प्राचार्य जी, शुक्ला जी डाक लाने वहां जाते ही रहते हैं, उनसे मंगवा लीजिए, कल उसे पढ़ कर मैं फिर अपना विचार आपको बताऊंगा। मैं देखना चाहता हूं कि और क्या- क्या नियम उस नियमावली में हैं। सिद्धान्त तौर पर राधेश्याम जी और शुक्ला जी दोनों ही मेरी मांग से सहमत थे लेकिन व्यवहार में वे मेरी मांग पूरी नहीं कर सके। मैंने दो दिन इंतज़ार किया। बुधवार को फिर स्कूल के कार्यालय में पहुंचा। आज शुक्ला आचार्य जी कक्षा में पढ़ाने गए थे और कार्यालय में प्रधानाचार्य राधेश्याम जी अकेले थे। इस अवसर का उपयोग उन्होंने मुझे भावनात्मक रूप से प्रभावित करने में किया। उन्होंने संघ परिवार की कई ऐसी विशेषताएं बताईं जिनका मेरे लिए कोई मूल्य नहीं था। उनमें से एक बात थी - वरिष्ठ सहकर्मियों के साथ कंधे पर हाथ रखकर बात करने का अवसर। उनका कहना था कि किसी और संस्था में ऐसा व्यवहार आपको नहीं मिलेगा। राधेश्याम जी एक बुद्धिमान व्यक्ति थे। यह जानने के बाद कि मैं विचार से प्रगतिशील और तर्कशील व्यक्ति हूं, उन्होंने मुझे मेरे ही अस्त्र से पराजित किया।  

...

महात्मा गांधी से मुझे हमेशा बड़ा लगाव रहा और गांधी जी को धोती से। वही धोती आज मेरे और रोजगार के बीच में सेतु भी बन सकती थी और दीवार भी। मैंने सेतु को चुना। मैंने धोती पहनकर पढ़ाना स्वीकार कर लिया। (इस समय यह लिखते हुए भी सूती धोती पहने हूं।) 

यह एक व्यावहारिक फैसला था। दुनिया में फिट होने की हारी हुई कोशिश थी। एक प्रगतिशील युवा की नज़र से यह एक अवसरवादी समर्पण था। लेकिन उससे पहले यह तार्किकता की जीत भी थी। यह सच है कि मैं विद्या भारती के शिक्षकों की सेवा नियमावली नहीं देख सका, आज तक नहीं। पराजय की बात बस यहीं तक थी। इसके आगे धोती के विरोध में कोई मजबूत तर्क मेरे पास नहीं था। इसलिए नैतिक रूप से मेरे भीतर विरोध करने का बल नहीं रहा। इसी के साथ यह उम्मीद बंधी कि अब मास्टरी हाथ में होगी। अब और अनिश्चय में रहकर मैं इस मौके को गंवाना नहीं चाह रहा था, इसलिए खुलकर राधेश्याम जी से कहा - ठीक है, मैं धोती कुर्ता पहन कर पढ़ाने को तैयार हूं। 

मेरी सहमति लेने के बाद प्रधानाचार्य जी और शुक्ला आचार्य जी ने मुझे विद्यालय ज्वाइन कराने की औपचारिक प्रक्रिया शुरू की। राधेश्याम जी ने जब फिर से मुझे एक आवेदन पत्र नुमा कागज तैयार करने को कहा तब मुझे खीझ हुई। बेमन से मैंने वह आवेदन लिखा। यह आवेदन उन्होंने शिशु मंदिर के स्थानीय प्रबंधक/ अध्यक्ष को संबोधित कराया था और इसमें अपना नियुक्ति पत्र प्रस्तुत करते हुए आचार्य उपस्थिति पंजी में हस्ताक्षर करने देने की अनुमति मांगी गई थी। मैंने कहा कि पंजी तो आपके पास ही है और प्रधानाचार्य होने के नाते विद्यालय के मुखिया भी आप हैं फिर यह आवेदन किसे दिया जाएगा। जवाब में राधेश्याम जी ने कहा कि यह औपचारिकता है, इसे पूरा करना होता है। विद्यालय की एक प्रबंध समिति है उसकी सहमति ली जाती है। मैं शाम को सोराम जाकर यह कार्य करा लूंगा। आप कल आएं। 

अब एक दिन के लिए मुझे एक ऐसी नौकरी का इंतजार करना था जिसकी तनख्वाह का कुछ अता पता नहीं था। लेकिन अनुमान था कि पांच या छह सौ रुपए महीने का आसरा हो सकता है। अगला दिन आया और मैं भी विद्यालय के कार्यालय पहुंचा। महुआ के टेढ़े पेड़ के नीचे अपनी साइकिल को टेढ़ी करके खड़ी करते समय कार्यालय में अपनी कुर्सी से खड़े होते प्रधानाचार्य जी की टेढ़ी मुस्कान का अंदाजा तब मुझे नहीं था। मुझे आता देखकर राधेश्याम जी कार्यालय से निकलकर एक कक्षा में जाने लगे। मैंने उन्हें रोका नहीं, जाने दिया। लेकिन तभी उन्होंने मुड़कर मुझे देखा और हाथ से कार्यालय में बैठने का इशारा किया। कार्यालय में और कोई नहीं था। मैं उसी भाव से एक कुर्सी पर बैठ गया जिस भाव से गंभीर रोगों के मरीज़ विशेषज्ञ डाक्टरों की ओपीडी के बाहर बैठे रहते हैं। उम्मीद और नाउम्मीदी के बीचोबीच, जिसमें मरीज़ की उम्मीद डॉक्टर के रुख की मोहताज होती है। प्रधानाचार्य जी के रुख का मोहताज मैं कार्यालय की भीतरी दीवार पर चिपके अशुद्ध वर्तनी वाले नारों के पोस्टर पढ़ रहा था और मन में तय कर रहा था कि बच्चों को सबसे पहले हिन्दी शब्दों की सही वर्तनी सिखाना है। इन पोस्टरों को बदलने के बजाय अगर बच्चों से ही इनमें सुधार करवाया जाए तो इसका असर ज्यादा होगा। इस कमरे में बैठने वाले शुक्ला जी और राधेश्याम जी के ज्ञान का स्तर इतना बुरा तो नहीं होना चाहिए कि वे बच्चों द्वारा बनाए गए पोस्टरों में शब्दों की इन अशुद्धियों को ठीक न करा सकते हों। मैंने अनुमान लगाया कि ये लोग दूसरे कामों में इस कदर व्यस्त रहते हैं कि शायद इन्हें अब तक इन पोस्टरों पर नज़र डालने का ही मौका नहीं मिला। 

मुझे बहुत ज्यादा इंतजार नहीं करना पड़ा। कुछ कांखते, कराहते हुए शुक्ला जी कमरे में आए। उनके आने पर मैं खड़ा नहीं हुआ क्योंकि कुछ असभ्यता, उजड्डता के असर के कारण और कुछ अब उन्हें अपना समकक्ष सहकर्मी समझने के कारण मुझे कुर्सी से खड़ा होना बेकार लगा था। शुक्ला जी ने सिसकारी भरी ध्वनियों के बीच एक उलझन और अनिश्चय भरी नकुआती आवाज में कहा - आपका काम शायद हुआ नहीं भाई साहब। कई दिनों से मैं इस संस्था की विचित्र कार्यशैली को करीब से देख रहा था, इसलिए मुझ पर शुक्ला जी की बात का कोई गहरा असर नहीं हुआ। मैंने उन्हें बस जरा हेय दृष्टि से देखा। वे कुछ गुनगुनाने या मुनमुनाने लगे। मैंने उनका ध्यान पोस्टरों की अशुद्ध वर्तनी की तरफ खींचा तो लापरवाही से हंसते हुए बोले कि बच्चे हैं। इतना ही काफी है। मैंने इसका मतलब यह समझा कि इन्हें शिक्षा के श की भी समझ नहीं है। मन कड़वा हो गया। इसी कड़वेपन के बीच प्रधानाचार्य राधेश्याम जी कार्यालय में दाखिल हुए। मैंने उन्हें बस इसलिए नमस्ते किया ताकि वे मेरी नियुक्ति के मामले पर सीधे सीधे मुझे बताएं। लेकिन वे मौन रहे। अपनी कुर्सी पर बैठने के बाद वे एक पश्चाताप भरी मुस्कान के साथ मुझे निहारने लगे। मुझे यह उनकी कुटिलता जान पड़ी। फिर भी मैंने धैर्य धरा और कुछ वैसी ही प्रतिक्रिया देने की कोशिश की लेकिन दे नहीं पाया क्योंकि तब तक मुझे (कृत्रिम तौर पर) मुस्कुराना नहीं आता था।

कुछ देर की चुप्पी के बाद गहरी सांस लेकर राधेश्याम जी ने बिल्कुल अपरिचित व्यक्ति वाले अंदाज़ में कहा - और, कैसे हैं आलोक जी? यह बिल्कुल अप्रत्याशित बातचीत थी। अब मुझे शुक्ला जी द्वारा व्यक्त अंदेशे के गंभीर मर्म का आभास हुआ। मेरी दशा दीन हीन हो चली। मुंह से कुछ निकल नहीं पा रहा था। फिर भी पूरा साहस बटोरकर पूछा - मैं उपस्थिति पंजी पर हस्ताक्षर करूं? इस सवाल के जवाब में प्रधानाचार्य जी बिल्कुल बेशर्मी से मुस्कुराने लगे और नकारात्मक तरीके से सिर हिलाया। कुछ देर ऊं... की ध्वनि के बाद बोले - अभी यहां आचार्य का पद रिक्त नहीं है। प्रबंधक जी ने अभी आपको नियुक्त करने से मना किया है। मैंने पूछा कि मेरा आवेदन और नियुक्ति पत्र कहां है तो उन्होंने एक फाइल में से निकालकर मुझे दिखा दिया। मेरे आवेदन और नियुक्ति पत्र दोनों ही कागजों पर टेढ़े अक्षरों में बड़े बेडौल तरीके से लिखा था - 
"नियुक्ति निरस्त।"
***** पांडेय 

यह प्रबंधक महोदय के हस्ताक्षर थे। उनका नाम लिख पाने का साहस अभी मुझमें नहीं है। लेकिन वे रामभक्त थे। जब तक अयोध्या में रामलला का मंदिर न बन जाए तब तक दाढ़ी और बाल न कटवाने की कसम उन्होंने बाबरी मस्जिद विध्वंस के समय खायी थी लेकिन कुछ वर्षों के भीतर ही उन्होंने इस प्रतिज्ञा को वैसे ही भुला दिया जैसे उनके बड़े नेतागण चुनावी वादों को भुला देते हैं या फिर उन्हें जुमला घोषित कर देते हैं। 
मेरी नियुक्ति को निरस्त करने का अधिकार उन्हें था या नहीं, यह प्रश्न आज तक अनुत्तरित है। जिला मंत्री के हस्ताक्षर लेने में मिश्रा जी ने जो स्वामिभक्ति खर्च की थी, उसका क्या कुछ भी मूल्य नहीं था? यह स्कूल विद्या भारती से संबद्ध था भी या नहीं? यह स्कूल ही था या कोई छद्म व्यावसायिक प्रतिष्ठान? कई प्रश्न थे। किसी का कोई उत्तर नहीं हो सकता था। आरएसएस उत्तर देने के लिए नहीं है। भंवर मेघवंशी जी के
इस निष्कर्ष को मैं हूबहू स्वीकार करता हूं। हालांकि मैंने उस दिन प्रधानाचार्य जी को उन्हीं के कार्यालय में भरपूर लताड़ा। मैंने पूछा कि आप बच्चों को क्या अनुशासन सिखाते होंगे जब आप खुद अपने ही जिला कार्यालय द्वारा जारी नियुक्ति संबंधी आदेश का पालन नहीं कर रहे हैं। जब पद रिक्त ही नहीं था तो आपने मुझे जिला कार्यालय क्यों भेजा था? आपके जिला मंत्री यदि पूछें कि आपने जिला कार्यालय द्वारा चयनित और नियुक्त आलोक को ज्वाइन क्यों नहीं कराया तो आप क्या जवाब देंगे? 

राधेश्याम तिवारी असहाय होकर मुझे देख रहे थे। मैं उनसे आधी उम्र का लड़का था, मुश्किल से अठारह साल का। और उन्हें झकझोर कर लताड़ रहा था। वे मुझे डांट कर भगा सकते थे, पर उन्होंने ऐसा नहीं किया। मैंने उनसे अपना नियुक्ति पत्र और आवेदन पत्र मांगा तो उन्होंने दे दिया, यह भी उनकी भलमनसाहत ही थी। उन्हें असहाय और असहज स्थिति में देखना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। मैंने कागज लिए और उबलते दिमाग के साथ बाहर निकल आया। 

घर आकर पिताजी की खूब लानत मलामत की। यह मेरी जीत और उनकी हार थी। उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था। मैंने दोनों कागज़ सामने रख दिए जिनमें नियुक्ति निरस्त की ऐतिहासिक इबारत लिखी थी। पिताजी ने फौरन एक लोकतांत्रिक सलाह दी कि इसकी लिखित शिकायत फूलपुर जिला कार्यालय को इन कागजात की फोटोकॉपी के साथ करो। मैंने वैसा ही किया लेकिन जैसा भंवर मेघवंशी के साथ हुआ था, वैसा ही मेरे भी साथ हुआ। शिकायत का कोई जवाब नहीं। यह विशिष्ट RSS  कार्यशैली है। 

बहरहाल, बाद के दिनों में इस "नियुक्ति निरस्त" प्रकरण के तीन कारण मेरी समझ में आए - 

१. मैं ब्राह्मण नहीं था। विद्यालय में ब्राह्मण और क्षत्रिय बच्चे भी पढ़ते थे। आरएसएस की परंपरानुसार आचार्य के पैर छुए जाते हैं। तो यह उनका एक धर्मसंकट था।

२. यदि मुझे अध्यापक रखा जाता तो विद्यालय द्वारा आचार्यों को दिया जाने वाला वेतन गोपनीय न रह जाता। मैं आरएसएस / भाजपा का आदमी नहीं था, विश्वसनीय नहीं था। ऐसे में ब्राह्मण बनिया प्रबंधन की घोटालेबाजी के पर्दाफाश का खतरा था। 

३. यदि मैं स्कूल में पढ़ाने लगता तो कई ट्यूशन मुझे मिल जाते, इसका सीधा नुकसान कस्बे में ट्यूशन पढ़ाने वाले दो ब्राह्मण मास्टरों को होता। यह व्यावसायिक हितों का मामला था। 

बस इतना ही मुझे समझ में आया।

*****

No comments: