Monday, April 22, 2019

मुसीबतज़दा औरत की डायरी


मुसीबतज़दा औरत की डायरी
 (सिमोन द बुववार की कहानी वूमन डिस्ट्रॉएड के एक अंश का हिंदी अनुवाद)
अनुवादक : आलोक कुमार श्रीवास्तव


सोमवार 13 सितम्बर, ले सैलाइंस
एक गाँव के किनारे वीराने में बसे और सदियों से समय के प्रवाह से बेअसर इस कस्बे का नज़ारा अद्भुत है। घुमावदार रास्ते पर कुछ दूर चलने के बाद मैं सदर इमारत की सीढ़ियाँ चढ़ गयी और देर तक इन वास्तु-संरचनाओं के वैभव को निहारती रही, जो बनायी तो किसी ख़ास मक़सद से गयी थीं मगर उनका कभी कोई इस्तेमाल नहीं हुआ। ठोस, मजबूत और असली होने के बावजूद, इन इमारतों का खाली पड़ा रहना हमें अचरज में डालता है अपने वीरानेपन के कारण ये विलक्षण दिखाई देती हैं। स्वच्छ आकाश तले बिछी घास की मुलायमियत और ज़मीन पर झड़ी सूखी पत्तियों की गंध ने मुझे इस बात का एहसास कराया कि मैं इसी दुनिया में हूँ, किसी कल्पनालोक में नहीं। वहीं खड़े-खड़े मैं दो सौ साल पीछे अतीत में चली गयी थी। मैं कार के पास गयी और गाड़ी में रखा सामान निकाल लायी ज़मीन पर कम्बल बिछाया, ट्रांज़िस्टर चलाया और मोज़ार्ट का संगीत सुनते हुए सिगरेट पीने लगी। मैंने देखा कि इक्का-दुक्का लोग गाड़ियों में अपने-अपने काम पर जा रहे थे। एक बड़े दरवाज़े के सामने एक ट्रक रुका और मज़दूरों ने दरवाज़ा खोलकर उसके पीछे बोरे लादे। इसके अलावा वहाँ कोई और आवाज़ नहीं हुई जिससे कि उस दोपहर के शांत वातावरण में कोई खलल पड़ती। फिर मैं काफी दूर एक अनजान नदी के किनारे तक निकल गयी जहाँ उस समय मेरे; और नदी किनारे के पत्थरों के अलावा कोई नहीं था। उन पत्थरों की ही तरह मैं अपनी ज़िंदगी से बड़ी दूर निकल आयी थी और उनके संग मिल गयी थी।
कितना अजीब है कि मैं ऐसी जगह पर हूँ और उससे भी ज्यादा अजीब है मेरा यहाँ आकर खुश होना। जब मैं पेरिस में थी तो मैंने इस यात्रा के एकांत के बारे में सोचा भी नहीं था। अब तक अगर मॉरिस नहीं होते तो बेटियाँ ही मेरी हरेक यात्रा में मेरे साथ रहतीं। मुझे लगा भी था कि इस यात्रा में मुझे कोलेट की खिलखिलाहट और लूसिएन की फरमाइशों की कमी महसूस होगी। और यहाँ खुद मुझे ही मानों अतीत के दिनों से निकली एक उपेक्षित किस्म की खुशी वापस मिल गयी है। आजादी मिल जाने पर मेरी हालत ऐसी हो जाती है मानों मैं अभी बीस साल की ही होऊँ बिलकुल वैसे ही जैसे जब मैं बीस साल की थी तब सिर्फ खुद को समय देने के लिए मैंने जो किताब लिखनी शुरू की थी, उसे छोड़ दिया था।
मॉरिस से विदा लेते समय हमेशा मेरा मन भारी हो जाता है। हालांकि सम्मेलन केवल एक हफ्ते चलेगा, फिर भी मोज़िस से नीस एयरपोर्ट जाते समय मेरा गला भर आया था। उनका भी यही हाल था। जब लाउडस्पीकर पर रोम जाने वाले यात्रियों की पुकार हुई तब उन्होंने मुझे कसकर भींच लिया। मैंने कहा – इस तरह सरेआम जान मत दो। उन्होंने कहा - प्लेन में संभलकर जाना। मेरी नज़रों से ओझल होने से पहले वो एक बार फिर मुझे देखने के लिए मुड़े। मैंने देखा कि उनकी आँखों में मेरी फिक्र थी।
प्लेन का टेक-ऑफ मुझे बड़ा नाटकीय लगा। चार इंजन वाले विमानों में टेक-ऑफ करते समय बहुत ज्यादा आवाज़ नहीं होती, लेकिन इस जेट ने बहुत ज़ोर की आवाज़ के साथ जमीन छोड़ी, जैसे आखिरी सलामी दे रहा हो।
फिलहाल तो मैं खुशी के समंदर में गोते लगा रही हूँ। बेटियों की अनुपस्थिति से मैं ज़रा भी उदास नहीं हुई – बल्कि बिल्कुल उलटा हुआ। मैं जितनी तेज़ चाहूँ उतनी तेज़ गाड़ी चलाऊँ, जितनी चाहूँ उतनी धीमी, जहाँ मन करे वहाँ रुक सकती हूँ। मैंने सोचा था कि इस हफ्ते बस घूमूँगी। इसलिए उजाला होते ही उठ जाती हूँ। बाहर किसी वफादार जानवर की तरह ओस से गीली कार खड़ी रहती है। मैं इसके शीशे पोंछकर उत्साह से भरी हुई उगते हुए सूरज की रोशनी के बीच इसे लेकर निकल जाती हूँ। गाड़ी में मेरे साथ सफेद थैला है जिसमें मिशेलिन का नक्शा, कुछ किताबें, एक कार्डिगन और सिगरेट हैं। सिगरेटें मेरी मौन सहचर हैं। यहाँ जिस छोटे-से होटल में मैं ठहरी हूँ, उसकी मालकिन से खाने का बिल माँगने पर वह नाराज़ नहीं होती।
दिन डूबने वाला है, मगर फिज़ां में अभी भी उत्साह है। यही वो कुछ दिलकश पल होते हैं जब क़ायनात इंसानी दुनियां से इस कदर एकमेक रहती है कि ऐसा मानने को जी ही नहीं करता कि वे खुश नहीं होंगे।

मंगलवार 14 सितम्बर
ज़िंदगी के प्रति मेरा समर्पण मॉरिस को बड़ा अच्छा लगता था। स्वयं से संवाद (एकांतवास) की इस छोटी-सी अवधि के दौरान यह फिर से प्रकट हो उठा है। अब जबकि कोलेट की शादी हो चुकी है और लूसिएन अमेरिका में है, मेरे पास इसे संवारने के लिए खूब समय है। मोज़िस में मॉरिस ने मुझसे कहा था, तुम अकेली ऊब जाओगी। तुम्हें कोई नौकरी ढूँढनी होगी। वह बार-बार यही बात कहते रहे थे। लेकिन मुझे कोई नौकरी नहीं करनी है। जो भी समय मेरे पास है, उसमें से कुछ समय मैं खुद अपने लिए जीना चाहती हूँ। मॉरिस और मुझे - हम दोनों को – इस एकांत का अच्छे से अच्छा इस्तेमाल करना है। हम दोनों ही इस एकांत से लम्बे समय से वंचित रहे हैं। मेरे दिमाग में तो इसको लेकर ढेरों योजनाएं हैं।

शुक्रवार 17 सितम्बर
मंगलवार को मैंने कोलेट को फोन किया। उसे ज़ुकाम था। जब मैंने कहा कि मैं वापस पेरिस चली आती हूँ तो उसने मुझे मना किया और बताया कि जीन-पियरे उसकी देखभाल ठीक से कर रहा है। लेकिन मुझे फिक्र हो रही थी इसलिए मैं उसी दिन लौट आयी। मैंने देखा कि वह काफी दुबली हो गयी थी और बिस्तर पर ही थी। उसे रोज़ शाम को बुखार आ जाता है। अगस्त में जब मैं उसके साथ पहाड़ पर गयी थी, तब भी मुझे उसकी सेहत की बड़ी चिंता थी। मैं मॉरिस के आने तक का इंतज़ार नहीं कर सकती, बल्कि मॉरिस से कहती हूँ कि वह टैल्बट को कह दें कि वह आकर देख जाए।
यहाँ मेरे ऊपर एक और आश्रिता की जिम्मेदारी है। बुधवार को डिनर के बाद जब मैं कोलेट के यहाँ से निकली तो मौसम इतना बढ़िया था कि मैं ड्राइव करते हुए लैटिन क्वार्टर तक चली गयी। एक कैफे के टैरेस पर बैठकर मैं एक सिगरेट पी रही थी। बगल की मेज पर बैठी पंद्रह-सोलह साल की एक लड़की ललचायी नज़र से मेरी जेब में रखी चेस्टरफील्ड्स सिगरेट के पैकेट को देख रही थी। उसने मुझसे एक सिगरेट माँगी। मैंने उससे बात करने की कोशिश की लेकिन वह मेरे प्रश्नों को टाल गयी और जाने के लिए उठ खड़ी हुई। तकरीबन पंद्रह साल की उस लड़की में अब मेरी दिलचस्पी बढ़ गयी थी, जो न तो स्टूडेंट थी और न ही सेक्स वर्कर। मैंने उससे कहा कि मैं तुम्हें अपनी कार में तुम्हारे घर तक छोड़ देती हूँ। पहले तो उसने इनकार किया, कुछ बताने से हिचकिचाती रही मगर अंत में उसने स्वीकार कर लिया कि उसका कोई घर नहीं है। वह उस रोज़ सुबह उस सेंटर (अनाथालय) से भागी थी जहाँ उसे पुलिस वालों ने रखवाया था। दो दिन तक मैंने उसे यहाँ अपने पास रखा। उसकी माँ दिमागी तौर पर कमज़ोर हैं और उसके सौतेले पिता उससे नफरत करते हैं। दोनों ने उसे छोड़ दिया है। उसके केस को देख रहे जज ने उससे वादा किया है कि वह उसे किसी ऐसे घर में भेज देंगे जहाँ उसे कोई काम सिखाया जाएगा। इस दौरान पिछले छ: महीने से वह अस्थायी तौर पर इस सेंटर (अनाथालय) में रह रही थी, जहाँ से वह केवल रविवार को चर्च जाने के लिए बाहर निकल पाती थी और वहाँ भी उसे कुछ करने नहीं दिया जाता था। इस केंद्र में लगभग चालीस ऐसी लड़कियाँ हैं जिनकी देखभाल तो ठीक तरह से होती है और शारीरिक रूप से वे ठीक दिखती हैं लेकिन मानसिक तौर पर वे ऊब, थकान और निराशा की शिकार हैं। रात को उन्हें नींद की एक-एक गोली दी जाती है। उसे वे किसी तरह बचा कर रख लेती हैं और किसी दिन इस तरह बचाकर रखी गयी सभी गोलियों को एक साथ निगल जाती हैं। मार्गुरीट ने मुझे बताया कि ऐसा वे इसलिए करती हैं ताकि जज का ध्यान उन पर जाए। जज उसी लड़की के मामले को निपटाने पर ध्यान देते हैं जो या तो यहाँ से भागने की कोशिश करे या फिर आत्महत्या की। भाग निकलना आसान है; अक्सर लड़कियाँ भाग जाती हैं; और अगर वे कुछ समय बाद पकड़ ली गयीं तो उन्हें कोई सज़ा नहीं दी जाती।
मैंने उससे वादा किया कि मैं उसे किसी घर में भिजवाने की हर कोशिश करूँगी। इस पर वह वापस उसी केंद्र में जाने को तैयार हो गयी। जब वह दरवाज़े से बाहर जाने लगी तो उसके झुके हुए सिर और उसकी काँपती हुई टाँगों को देखकर मेरा मन व्यथित हो उठा। मुझे  सिस्टम पर बड़ा गुस्सा आया। एक लड़की जो शक्ल-सूरत से लेकर समझदारी और बात-व्यवहार, हर चीज़ में अच्छी है, उसकी जवानी टुकड़े-टुकड़े करके बरबाद हो रही है। वह काम करना चाहती है। वह और उसके जैसी हजारों लड़कियाँ... वे काम माँग रही हैं। कल मैं जज बैरन को फोन करके इस मुद्दे पर बात करूँगी।
पेरिस कितना बेरहम शहर है ! इतना कि इन राहत देने वाले दिनों में भी इसकी बेरहमी का बोझ मुझे दबाये जा रहा है। आज की शाम मैं अजीब निराशा से घिरी हुई हूँ। मेरा मन है कि बेटियों के कमरे को आरामदेह बैठक में तब्दील कर दूँ क्योंकि अभी या तो मॉरिस के कंसल्टिंग रूम में या फिर वेटिंग रूम में बैठना पड़ता है। लूसिएन अब यहाँ नहीं रहेगी। घर शांत तो रहेगा, मगर बहुत खाली-खाली भी लगेगा। लेकिन सबसे ज्यादा चिंता मुझे कोलेट के बारे में हो रही है।

बुधवार 22 सितम्बर
मैं कोई नौकरी इसलिए नहीं करना चाहती ताकि जिन्हें मेरी ज़रूरत है, उनके लिए मैं पूरी तरह उपलब्ध रह सकूँ। मेरा ज्यादातर समय कोलेट के बिस्तर के पास गुज़रता है। उसका बुखार नहीं उतर रहा। मॉरिस का कहना है कि चिंता की कोई बात नहीं है। लेकिन टैल्बट जाँच कराना चाहता है। मेरे मन में डरावने विचार आने लगते हैं।
जज बैरन से आज सुबह मेरी मुलाक़ात हुई - बिल्कुल दोस्ताना मुलाक़ात। उनका कहना है कि मार्गुरीट ड्रिन का केस हृदय-विदारक है; और वह अकेली ही नहीं, उसकी तरह हजारों लड़कियाँ हैं। इससे भी दु:खद बात यह है कि इन बच्चों के लिए कोई जगह नहीं बनायी गयी है और इनकी सही तरीके से देखभाल करने के लिए कोई प्रशिक्षित स्टाफ नहीं है। सरकार कुछ करती नहीं है। इसलिए जुवेनाइल अदालतों और सोशल वर्करों की कोशिशों का कोई फायदा नहीं होता। मार्गुरीट जिस सेंटर में ठहरी है, वह सिर्फ एक ट्रांज़िट प्वाइंट है; तीन-चार दिन बाद उसे कहीं और भेजा जाना है। लेकिन कहाँ? कुछ मालूम नहीं। ये लड़कियाँ जिन सेंटरों में ठहरायी जाती हैं वहाँ कुछ काम-धाम या किसी प्रकार के मनोरंजन का कोई इंतज़ाम नहीं होता। मगर फिर भी जज बैरन मार्गुरीट के लिए कहीं इस तरह की जगह तलाशेंगे। उन्होंने कहा है कि वे सेंटर के कर्मचारियों से कहेंगे कि वे मुझे उससे मिलने दें। हालांकि उसके माँ-बाप ने उस पर से अपना हक छोड़ने संबंधी कागज़ पर आखिरी तौर पर दस्तख़त नहीं किए हैं मगर वे बच्ची को वापस लेने आएंगे, ऐसी कोई उम्मीद नहीं है। वे उसे नहीं चाहते और उसके लिए भी यही ठीक रहेगा कि वह उनके पास न रहे।
सिस्टम के नाकारेपन के चलते बदहाल अदालतों से मुझे कोई उम्मीद नहीं रही और मैं वहाँ से बाहर निकल आयी। किशोर अपराधियों की संख्या बढ़ती जा रही है मगर इसे रोकने का कोई उपाय नहीं किया जा रहा है।
जब मुझे ध्यान आया, मैंने खुद को संत चैपेल के दरवाज़े के सामने पाया। भीतर आकर घुमावदार सीढ़ियाँ चढ़ गयी। वहाँ विदेशी पर्यटक और एक पति-पत्नी एक दागदार काँच को हाथ में लेकर देख रहे थे। मैं कुछ समझ नहीं पायी। मैं फिर से कोलेट के बारे में सोच रही थी और चिंतित थी।
अब मुझे बड़ी चिंता हो रही है। पढ़ना मुमकिन नहीं। शायद मॉरिस से बात करके ही दिमाग का बोझ हल्का हो। आधी रात से पहले तो वह आ नहीं पाएंगे। जब से वह रोम से लौटे हैं, शाम का समय टैलबट और कोटोरियर के साथ लैब में ही बिताते हैं। उनका कहना है कि वे लोग सफलता के बहुत करीब पहुँच गये हैं। रिसर्च के लिए सब कुछ छोड़-छाड़ देने वाले व्यक्ति के समर्पण को मैं समझ सकती हूँ। लेकिन मेरी ज़िंदगी में ऐसा पहली बार हुआ है कि मुझे लग रहा है कि वह मुझसे कुछ छिपा रहे हैं।

शनिवार 25 सितम्बर
खिड़की से कोई रोशनी नहीं आ रही थी। मुझे लगा ही था कि अंधेरा होगा। पहले कभी-कभार जब मैं मॉरिस के बगैर अकेले कहीं बाहर जाती थी तो घर लौटने पर लाल परदों के बीच रोशनी की एक पतली-सी लकीर ज़रूर दिखती थी। मैं भागते हुए दो-दो सीढ़ियाँ एक साथ फाँदकर जल्दी से ताला खोलने की उतावली में रहती थी। अबकी बार मैं आराम से सीढ़ियाँ चढ़ी, भागती हुई नहीं गयी। ताले में चाबी लगायी और दरवाज़ा खोला। फ्लैट कितना खाली-खाली लग रहा था ! खाली है भी तो। जिस फ्लैट में कोई है नहीं, वह खाली ही तो होगा। लेकिन बात ये नहीं है। आम तौर पर जब मैं घर आती तो मॉरिस यहाँ ज़रूर होते थे, वो बाहर गये हों तब भी मुझे उनकी मौजूदगी का एहसास रहता था। मगर आज शाम का अनुभव दूसरा है। दरवाज़े खोलने पर आज कमरे बिल्कुल खाली महसूस हो रहे हैं। रात के ग्यारह बज रहे हैं। मॉरिस जो प्रयोग कर रहे हैं, उसका नतीज़ा कल आएगा। मुझे बड़ा डर लग रहा है। मुझे डर लग रहा है और मॉरिस यहाँ नहीं हैं। मैं जानती हूँ कि उनका रिसर्च कामयाब होगा। फिर भी, मुझे उन पर गुस्सा आ रहा है। मुझे आपकी ज़रूरत है, और आप यहाँ नहीं हैं! मन कर रहा है कि सोने जाने से पहले ये बात कागज़ पर लिखकर हॉल में रख दूँ। वर्ना दिमाग इसी में उलझा रहेगा। जब मुझे उनकी ज़रूरत महसूस होती थी, वह मेरे पास हुआ करते थे।
मैंने गमलों में पानी डाला। किताबें झाड़ी-पोंछी। इसी सब में थककर चूर हो गयी। जब मैं उनसे इस बैठक कक्ष को व्यवस्थित करने के लिए कहती थी तो इन कामों में उनकी दिलचस्पी न होने के चलते मुझे अजीब स्थिति का सामना करना पड़ता था। मुझे सच्चाई से जी नहीं चुराना। मैं हमेशा सच ही चाहती रही हूँ और मुझे वह मिला क्योंकि मैं उसे चाहती थी। ख़ैर। मॉरिस बदले हैं। उन्होंने खुद को अपने काम में झोंक दिया है। अब वो किताबें नहीं पढ़ते। अब वो म्यूज़िक नहीं सुनते। हम दोनों जब चुपचाप मोंतेवर्दी या चार्ली पार्कर को सुनते थे तो हम दोनों की चुप्पी और मॉरिस के चेहरे की एकाग्रता मुझे बहुत अच्छी लगती थी। अब हम दोनों एक साथ पेरिस या आसपास घूमने नहीं जाते। देखा जाए तो हम दोनों के बीच अब कोई वास्तविक संवाद नहीं होता। मॉरिस अब अपने सहकर्मियों की तरह मानों मशीन बनते जा रहे हैं – ऐसी मशीन जिसे सिर्फ पैसे छापने के लिए ऑन किया जाता है। ऐसा कहना गलत होगा। वह पैसे या शोहरत के पीछे बहुत नहीं भागते। लेकिन दस साल पहले जब मेरी इच्छा के खिलाफ उन्होंने रिसर्च करने का फैसला किया, तब से धीरे-धीरे (जिसका मुझे डर था) उनका व्यवहार रूखा होता गया है। यहाँ तक कि इस साल मोज़िस में भी मैंने उन्हें अपने से दूर ही पाया – हमेशा खोये-खोये-से, फौरन हॉस्पिटल और लैबोरेटरी लौटने की हड़बड़ी में बेताब, बिल्कुल बदमिज़ाज़। लेकिन यहीं पर मुझे खुद के सामने पूरी सच्चाई रखनी होगी। नीस हवाई अड्डे पर मेरा दिल भारी हो जाने की वजह पहले बीती वे मनहूस छुट्टियाँ थीं। और वीरान समुद्र-तट पर मेरी चहकती खुशी का कारण यह था कि सैकड़ों मील दूर मॉरिस एक बार फिर मेरे नज़दीक थे। (डायरी भी क्या विचित्र चीज़ है : जो बातें हम इसमें लिखते हैं, उससे ज्यादा खास बातें छोड़ देते हैं।) कोई कह सकता है कि मॉरिस को अब अपने व्यक्तिगत जीवन में दिलचस्पी नहीं रही। पिछले वसंत में कितनी आसानी से उन्होंने हमारी आल्सेस यात्रा के लिए मना कर दिया था ! लेकिन मेरी निराशा से उन्हें काफी दुख हुआ। मैंने खुशी जताते हुए कहा था, ल्यूकेमिया का इलाज़ खोजने के लिए कुछ कुर्बानी तो देनी ही होगी। मगर एक समय ऐसा भी था जब मॉरिस के लिए दवा का मतलब था इंसान के शरीर को तकलीफ से राहत दिलाना। कोचीन में पढ़ाई के दौरान, प्रोफेसरों के निस्पृह व्यवहार और विद्यार्थियों के लापरवाह मिजाज़ के चलते मैं इतनी निराश, इतनी हताश रहती थी कि जब उस लम्बे लड़के की गहरी काली आँखों में देखा तो मुझे अपनी ही जैसी वेदना और रोष दिखायी दिए थे। शायद उसी पल मुझे उससे प्यार हो गया था। अब तो मरीज़ उनके लिए सिर्फ केस हैं। मरीज़ को आराम मिले, इससे ज्यादा उनका ध्यान जानकारी इकट्ठी करने में रहता है। यहाँ तक कि अपने करीबी लोगों के साथ भी उनका रिश्ता दूरी वाला होता जा रहा है। यही बंदा था जो पैंतालीस साल की उम्र में जब मैं उससे पहली बार मिली थी, इतना ज़िंदादिल, इतना खुशमिजाज़, इतना जवान था.... हाँ, कुछ तो बदला है। जब से मैं यहाँ उनके बारे में, खुद अपने बारे में, उनकी नामौजूदगी में लिख रही हूँ, कुछ बदलाव महसूस कर रही हूँ। अगर वह ऐसा करते तो मैं खुद को ठगी हुई महसूस करती। हम दोनों ही एक दूसरे के भीतर पूरी तरह देख लिया करते थे।
अब भी हम ऐसा कर सकते हैं; ये तो मेरा गुस्सा है जिसके कारण हम अलग-अलग हैं। बहुत जल्दी ही वह मेरे इस गुस्से को छूमंतर कर देंगे। वह मुझसे थोड़ा और सब्र करने; काम के बोझ के बाद के सुकून भरे, हल्के-फुल्के दिनों के इंतज़ार को कहेंगे। पिछले साल भी वह अक्सर शाम को भी काम करते रहते थे। हाँ, मगर उस समय मेरे पास लूसिएन रहा करती थी। और सबसे बड़ी बात ये कि तब मुझे परेशान करने वाली कोई बात नहीं थी। उन्हें अच्छी तरह पता है कि इस समय मैं न तो मैं कुछ पढ़ सकती हूँ और न ही कोई रिकॉर्ड सुन सकती हूँ क्योंकि मैं डरी हुई हूँ। मैं हॉल में कोई नोट लिखकर नहीं छोड़ूँगी, बल्कि मैं सीधे उनसे बात ही करूँगी। शादी के बीस-बाईस साल बाद भी अगर कोई इतना ज्यादा चुप्पी साधे रहता है तो ये खतरनाक बात है। मेरा ख्याल है कि पिछले कुछ सालों से मैं भी अपनी बेटियों – कोलेट और लूसिएन - में बहुत ज्यादा लगी रही। शायद मॉरिस ने जितना चाहा, मैं उतनी फुरसत नहीं निकाल पायी। उन्हें चाहिए था कि खुद को काम में झोंक देने के बजाय मुझसे यह बात बताते। हम दोनों को मिलकर कोई रास्ता निकालना है।
आधी रात का वक्त है। मुझे फिर से उनसे एकांत में मिलने की ऐसी जल्दी है कि मेरी निगाह घड़ी पर ही टँगी हुई है। घड़ी की सुइयाँ आगे बढ़ती ही नहीं हैं। मुझे जोर का गुस्सा आ रहा है। मेरे दिमाग में बनी मॉरिस की छवि टुकड़े-टुकड़े हो जाती है। जो आदमी अपनी ही बीवी से सही बर्ताव नहीं कर पा रहा, वह दूसरों की बीमारी का इलाज क्या करेगा? यह उदासीनता है। यह संगदिली है। गुस्सा करने का कोई फायदा नहीं। इसे रोकना होगा। अगर कोलेट की जाँच की रिपोर्टें ठीक नहीं आती हैं तो कल मुझे खुद पर काबू करने की अपनी पूरी की पूरी शक्ति की ज़रूरत पड़ेगी। इसलिए अब मैं सोने जाती हूँ।


रविवार 26 सितम्बर
 हो गया। मेरे साथ ये काण्ड हो गया।

सोमवार 27 सितम्बर
हाँ, ये मैं ही हूँ। मेरे ही साथ ये काण्ड हुआ है। बिल्कुल उसी तरह जैसे आम तौर पर होता है। मुझे खुद को इस सच्चाई का सामना करने के लिए तैयार करना है और इसके कारण पैदा हुए उस रोष को दबाना है, जिससे कल का मेरा पूरा दिन बर्बाद हुआ। मॉरिस ने मुझसे झूठ बोला : हाँ, बिल्कुल वैसे ही जैसे और लोग बोलते हैं। मुझे बताए बिना ही मॉरिस यह सब करते रहे होंगे। हालांकि देर हो चुकी है, लेकिन इस ईमानदारी के लिए मैं उनकी एहसानमंद हूँ।
आखिरकार मैं शनिवार को सोने गयी। थोड़ी-थोड़ी देर पर उठकर मैं दूसरे बिस्तर को छूकर देख लेती थी – चादर पर एक भी सिल्वट नहीं। (जब मॉरिस अपने कंसल्टिंग रूम में काम कर रहे होते हैं तब मैं उनसे पहले सोने चली जाती हूँ। सपने में मुझे पानी की धार की आवाज़ सुनायी देती है, यू डी कोलोन की हल्की-सी खुशबू आती है; मैं जाकर देखती हूँ तो वह चादर ओढ़े लेटे हैं। यह देखकर बहुत खुश होती हूँ।) बाहर वाले दरवाज़े पर दस्तक हुई। मैंने पुकारा - मॉरिस! सुबह के तीन बज रहे थे। तीन बजे तक वे लोग काम नहीं कर रहे होंगे; वे शराब पी रहे होंगे और गपबाजी का रहे होंगे। मैं उठकर बैठ गयी। ये घर आने का वक्त है? कहाँ थे आप?’  
वह कुर्सी पर बैठ गये। उनके हाथ में व्हिस्की का गिलास था।
मुझे मालूम है कि तीन बज रहे हैं।
कोलेट बीमार है, घबराहट के मारे मेरा बुरा हाल है और आप तीन बजे घर आ रहे हैं। आप सब लोग तीन बजे तक काम नहीं कर रहे थे न?’
क्या कोलेट की तबियत बहुत ज्यादा खराब है?’
वह ठीक नहीं है। आपको कोई परवाह ही नही है! मतलब ये कि चूँकि आप पूरी इंसानियत की सेहत पर काम कर रहे हैं इसलिए अपनी बीमार बेटी की फिक्र नहीं करेंगे?’
गुस्सा मत करो। उन्होंने कातर दृष्टि से मुझे देखा। और मैं मानों पिघल गयी, वैसे ही जैसे हमेशा जब वह मुझे अपने आगोश में लेते हैं तब पिघल जाती हूँ। नरम पड़कर मैंने पूछा, बताइए न, आप इतनी देर से घर क्यों आये?’
उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।
शराब पी रहे थे? पोकर खेल रहे थे? सब लोग मिलकर कहीं बाहर घूमने गये थे? या आपको वक्त का अंदाज़ा ही नहीं रहा?’ वह चुप ही रहे, मानों यह सायास चुप्पी हो। इस दौरान व्हिस्की का गिलास उनकी उँगलियों के बीच घूमता रहा। मैंने उन्हें अपशब्द इसलिए कहे ताकि उन्हें गुस्सा आये और सफाई में वह कुछ कहें। बात क्या है? क्या आपकी ज़िंदगी में कोई दूसरी औरत है?’
मेरी तरफ अपलक देखते हुए उन्होंने कहा, हाँ मोनीक, मेरी ज़िंदगी में कोई औरत है।
(हमारे सर के ऊपर नीला आसमान था और पैरों के नीचे नीला सागर। हमारे दूसरी ओर  अफ्रीका का सपाट घुमावदार तट था। उन्होंने मुझे अपनी तरफ खींच लिया था। अगर तुमने मुझे धोखा दिया तो मैं अपनी जान दे दूँगा। अगर आपने मुझे धोखा दिया तो मुझे जान देने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। मैं दुख से ही मर जाऊँगी। ये पंद्रह साल पहले की बात है। पंद्रह साल क्या होते हैं? वैसी ही एक गिनती जैसे दो दूने चार। आई लव यू। आई लव यू अलोन। सच नहीं बदलता – वक्त का इस पर कोई असर नहीं पड़ता।)     
कौन?’
नोएल गेरा। 
नोएल! क्यों?’
उन्होंने बस कंधे उचका दिए। जवाब बेशक मुझे पता था – क्योंकि वह खूबसूरत है, तेज़-तर्रार है, चुलबुली है, इस्तेमाल के लिए उपलब्ध है। जिन अदाओं का कोई खास मतलब नहीं होता, लेकिन जो मर्दों को रिझा लेती हैं, वह उसके पास हैं। क्या इन्हें ऐसी कोई ज़रूरत है?
वह मुस्कराए। ये अच्छा हुआ कि तुमने मुझसे पूछा। तुमसे झूठ बोलना मुझे बहुत बुरा लग रहा था।
कब से आप मुझसे झूठ बोल रहे हैं?’
अचानक वह अचकचा उठे। मैंने मोज़िस में तुमसे झूठ बोला था। और जब से वापस आया हूँ, तुमसे झूठ बोल रहा हूँ।
इस बात को पाँच हफ्ते हो गए। क्या मोज़िस में ये उसी के बारे में सोच रहे थे?
जब आप पेरिस में अकेले रुकते थे तब क्या उसके साथ सोते थे?’
हाँ।
आप उससे अक्सर मिलते हैं?’
अरे नहीं। तुम्हें तो पता है कि मैं रिसर्च में लगा हुआ हूँ...
आप ने मुझे तभी क्यों नहीं बताया?’
वे झेंप रहे थे। दुख भरी आवाज़ में बोले, तुम कहा करती थीं कि तुम इस दुख से मर जाओगी...
ये तो कहने की बात है।
उसी पल मेरा मन हुआ कि चिल्ला पड़ूँ कि मुझे इस बात से मरना नहीं है। इस प्रसंग की यह सबसे अफसोसनाक़ बात थी। नीले आकाश तले साथ-साथ अफ्रीका घूमते हुए हमने जो वादे किए थे वो कोरे वादे थे। मैं फिर लेट गयी। इस आघात ने मुझे हिलाकर रख दिया था। इस चोट से मेरा दिमाग भन्ना गया था। मेरे साथ ये क्या हो गया है, इसे समझने के लिए मुझे ज़रा फुरसत और एकांत की ज़रूरत थी। मैंने कहा चलो सो जाते हैं।
गुस्से के कारण मैं जल्दी जाग गयी। सोते हुए ये कितने निष्कपट दिख रहे हैं। नींद में होने के कारण फिर से जवां दिख रहे माथे पर आ गये उलझे बालों में कैसे मासूम दिख रहे हैं। (अगस्त में जब मैं बाहर गयी थी, इनके बगल में वह औरत लेटी रही होगी – इस बात पर मैं यकीन ही नहीं कर पा रही हूँ! कोलेट के साथ मैं पहाड़ों पर घूमने क्यों गयी? कोलेट ने मुझे जाने को बाध्य किया हो, ऐसा नहीं था। बल्कि मैंने ही जाने की ज़िद की थी।) पाँच हफ्तों से ये मुझसे झूठ बोल रहे थे। आज शाम हमने एक महत्वपूर्ण कदम आगे बढ़ाया है। उनकी तरफ से तो ये रिसर्च की बात थी मगर सच्चाई ये थी कि उस समय ये तुरंत नोएल के घर से आ रहे थे। मेरा मन हो रहा था कि इन्हें झकझोरूँ, ज़लील करूँ, इन पर चिल्लाऊँ। पर मैंने खुद को काबू में किया। एक चिट लिखकर अपने तकिए पर रख दिया : शाम को मुलाक़ात होगी। मुझे पूरा यकीन था कि कहने-सुनने से ज्यादा उन पर मेरी नामौज़ूदगी का असर होगा। अगर मैं हूँ ही नहीं तो जवाब किसको दोगे? बिना कुछ सोचे-विचारे मैं निकल पड़ी। सड़क जिधर भी जाती थी, मैं चलती गयी। मुझ पर एक ही धुन सवार थी : इन्होंने मुझे धोखा दिया। मेरे दिमाग में उनकी छवियाँ चुभ रही थीं – वे छवियाँ जिनमें मॉरिस की आँखें नोएल पर जमी हैं, मॉरिस के चेहरे पर मुस्कान है। मैंने उन छवियों को दिमाग से निकाल फेंका। जिस तरह वह मुझे देखते हैं, वैसे उसको नहीं। मैं दुखी नहीं होना चाहती थी; मैं दुखी नहीं हुई; लेकिन मेरा गला कड़वाहट से भर गया। इन्होंने मुझे धोखा दिया। मैंने कहा था, मैं दुख से ही मर जाऊँगी। हाँ, मगर उन्होंने मुझसे यह कहलवाया था। एक दूसरे के प्रति समर्पण के लिए मुझसे कहीं ज्यादा बेताब वह थे। ऐसा रिश्ता जिसमें कोई जोखिम, कोई भटकाव न हो। हम सेंट बर्ट्रेंड-डी-कमिंग्स के पास की छोटी सड़क पर ड्राइव कर रहे थे, तभी इन्होंने मुझसे पूछा था – क्या तुम हमेशा मेरा साथ निभाओगी? जीवन भर सिर्फ मुझसे तुम्हारा काम चल  जाएगा?’ मेरे जवाब में माकूल जोश न देखकर वह भड़क उठे थे। (लेकिन उस पुरानी सराय के हमारे कमरे की स्थिति में भी क्या ही गजब का संयोग था – बीस साल पहले के उस रोज़ से एक दिन पहले की बात है - खिड़की के जरिए मधुमक्खी के छत्ते से आती शहद की गंध के बीच माहौल ज़बर्दस्त था।) मॉरिस मेरे लिए पर्याप्त रहे हैं। मैंने हर पल सिर्फ उन्हीं के लिए जिया है। और सिर्फ एक क्षणिक अनुभव के लिए उन्होंने हमारे वादे के साथ गद्दारी की है। मैंने खुद से कहा, मैं उनके साथ इस रिश्ते को फौरन तोड़ने पर ज़ोर दूँगी...। मैं कोलेट के फ्लैट पर गयी। दिन भर मैं उसकी देखभाल करती रही, लेकिन मेरे भीतर कुछ खौल रहा था। बहुत टूटी हुई मैं घर आयी। मैं इस रिश्ते को खत्म करने के लिए कहने जा रही हूँ। लेकिन पूरी ज़िंदगी प्यार और समझदारी के साथ बिताने के बाद यह कहने का क्या मतलब रह जाता है? जो चीज़ मैंने उनके लिए नहीं चाही, उसे खुद अपने लिए भी कभी नहीं चाहा।
उन्होंने मुझे अपनी बाहों में लिया। वह काफी व्याकुल दिख रहे थे। कोलेट के यहाँ उन्होंने कई बार टेलीफोन किया था और वहाँ से उन्हें कोई जवाब नहीं मिला था। (मैंने फोन की घंटी को बंद कर दिया था ताकि कोलेट को परेशानी न हो।) बेचैनी के मारे उनका दिमाग बेकाबू था।
लेकिन तुम्हें नहीं पता, मैं खुद ये बात तुम्हें बताने वाला था।
‘’मुझे सब पता है।
मैंने उनकी बेचैनी को महसूस किया और गुस्सा हुए बगैर उनकी बात सुनी। झूठ बोलकर उन्होंने बेशक गलती तो की थी लेकिन मुझे इस बात को शुरुआती लापरवाही से समझना था – वह अपनी गलती मानने की हिम्मत नहीं जुटा पाए थे क्योंकि तब उन्हें यह भी स्वीकार करना पड़ता कि उन्होंने झूठ बोला। ऐसे लोग जो वफादारी को जीवन का आदर्श गुण मानते हैं, उनके लिए यह और भी कठिन होता है – लगभग नामुमकिन। हम लोग इसी किस्म के लोग हैं। (मैं खुद क़ुबूल करती हूँ कि किसी झूठ को छुपाने के लिए मैंने भी कोई खतरनाक झूठ बोला होता।) मैंने झूठ को कभी स्वीकार नहीं किया है। लूसिएन और कोलेट ने पहले-पहल जब जब झूठ बोला था तो मैं हक्का-बक्का रह गयी थी। मैं यह यकीन कर ही नहीं पा रही थी कि सभी बच्चे अपनी माँओं से झूठ बोलते हैं। मुझसे नहीं ! मैं वैसी माँ नहीं हूँ जिससे झूठ बोला जाए; मैं वैसी बीवी नहीं जिससे झूठ बोला जाए। यह व्यर्थ मिथ्याभिमान है। सभी स्त्रियाँ यही सोचती हैं कि वे सबसे अलग हैं; कुछ ख़ास हैं; सब यही समझती हैं कि कुछ चीज़ें उनके साथ कभी नहीं होंगी; लेकिन वे सब गलत साबित होती हैं।
आज के दिन मैंने बहुत-सा वक्त सोचने में बिताया है। (क्या संयोग है कि लूसिएन अमेरिका में है। मुझे उससे मदद लेनी चाहिए थी। वह मुझे कभी शांति से न रहने देती।) फिर मैं इसाबेल से बात करने चली गयी। हमेशा की तरह, उसने मेरी मदद की। मुझे डर था कि कहीं वह मेरा पक्ष न समझ पाए, क्योंकि उसने और चार्ल्स ने आज़ादी की शर्त पर शादी की है, मेरी और मॉरिस की तरह वफ़ादारी की शर्त पर नहीं। लेकिन उसने मुझे बताया कि इससे कोई खास फर्क नहीं पड़ा है – पाँच साल पहले उसे लगा था कि चार्ल्स उसे छोड़ने वाला है। उसने मुझे सब्र रखने को कहा। वह मॉरिस की बहुत इज्जत करती है। उसे यह बात सामान्य लगती है कि मॉरिस ने शौक के लिए ऐसा किया होगा, पहले तो उन्होंने मुझसे छुपाया होगा मगर आखिरकार वो इससे ऊब जाएंगे। इस तरह के रिश्ते बस चार दिन की चाँदनी होते हैं। नोएल भी जब उम्रदराज़ होगी तो मॉरिस की आँखों में उसके लिए जो आकर्षण है, वह जाता रहेगा। लेकिन अगर मैं चाहती हूँ कि इस घटना का हमारे प्यार पर असर न पड़े तो मुझे न तो पीड़ित दिखना चाहिए और न ही झगड़ा करना चाहिए। उसने मुझसे कहा, समझदार बनो, खुशमिजाज़ बनो। और सबसे ज़्यादा ज़रूरी है कि रिश्ते को दोस्ताना रखो। इसी तरीके से उसने अंतत: चार्ल्स को वापस हासिल किया था। सब्र करने के मामले में मैं बहुत अच्छी नहीं हूँ लेकिन मुझे अपनी पूरी कोशिश करनी होगी। सिर्फ रणनीतिक तौर पर ही नहीं बल्कि मुझे ईमानादारी से सब्र रखना होगा। मैं जैसा चाहती थी, मैंने वैसा जीवन जिया। अब मुझे जीवन से समझौता करना होगा। अगर शुरुआती बाधा से ही मैं डगमगा गयी तो मैंने अपने बारे में जो कुछ भी सोच रखा है, सब बेकार चला जाएगा। मैं समझौतावादी नहीं हूँ। मैंने पापा से विद्रोह किया, जिसके लिए मॉरिस मेरी कद्र करते हैं; लेकिन मुझे भी दूसरों को समझना होगा और उनके हिसाब से खुद को ढालना होगा। इसाबेल बिल्कुल ठीक कहती है। शादी के बाईस साल बाद भी विवाहेतर संबंध होना मर्दों के लिए बिल्कुल सामान्य बात है। अगर मैं इसे पचा नहीं पाती तो असामान्य मैं हूँ, मेरा आचरण बचकाना है।
इसाबेल के यहाँ से निकलने के बाद मेरा मन मार्गुरीट से मिलने जाने का नहीं था; लेकिन उसने मुझे एक छोटा-सा मार्मिक पत्र लिखा था और मैं उसे मायूस नहीं करना चाहती थी। विज़िटिंग रूम की मुर्दनी और उन लड़कियों के बुझे-बुझे चेहरे। उसने मुझे खुद के बनाये कुछ चित्र दिखाए। चित्र बढ़िया थे। उसका मन साज-सज्जा का काम सीखने या कम से कम विंडो ड्रेसर बनने का है। इससे उसे सभी आयोजनों के मौके पर काम करने को मिलेगा। मैंने उसे जज द्वारा किए गए वादे के बारे में बताया। मैंने उसे रविवार को अपने साथ ले जाने की अनुमति लेने के लिए जो कार्रवाई की थी, वह सब भी बताया। उसे मुझ पर भरोसा है; वह मुझे बहुत चाहती है; वह सब्र रखेगी और इंतज़ार करेगी लेकिन बहुत ज्यादा समय तक नहीं।
आज शाम मैं मॉरिस के साथ बाहर जा रही हूँ। इसाबेल की सलाह और अखबार में छपने वाले मिस लोनलीहार्ट के कॉलम के मुताबिक, जिसमें बताया गया है कि अपने पति को फिर से हासिल करने के लिए प्रसन्नचित और बन-ठन कर रहें और उनके साथ घूमने जाएं - सिर्फ आप दोनों। मुझे मॉरिस को फिर से नहीं हासिल करना है, मैंने उन्हें कभी खोया ही नहीं। मगर फिर भी मुझे उनसे ढेर सारे सवाल पूछने हैं और पूरी बातचीत तभी सहज तरीके से हो सकेगी जब हम बाहर खाना खाएं। कुल मिलाकर मैं उनके लिए इसे ज़ुर्म कुबूल करने का कोई औपचारिक आयोजन नहीं बनाना चाहती।
एक बात मेरे दिमाग में खटक रही है – उनके हाथ में व्हिस्की का गिलास क्यों था? मैंने बुलाया था – मॉरिस! चूँकि मैं भोर के तीन बजे जगी थी, उन्हें लगा होगा कि मैं उनसे सवाल पूछूँगी। आम तौर पर वह मुख्य दरवाज़ा इतनी ज़ोर से नहीं बंद करते हैं।


मंगलवार 28 सितम्बर
मेरे हिस्से की तमाम ड्रिंक अभी बची हुई थी, मगर मॉरिस ने हँसते हुए मुझे बताया कि मैं नशे में खूबसूरत दिख रही हूँ। कैसी अजीब बात है : हम फिर से जवानीं के ज़माने की रातों का अनुभव कर सकें, इसके लिए मॉरिस को मुझे धोखा देना पड़ा। रोज़-रोज़ का पचड़ा बहुत बुरी चीज़ है। झटके लगने पर आदमी जाग जाता है। सन ’46 से अब के सेंट-जर्मैन-डी-प्रेस में काफी बदलाव आ चुका है। अब यहाँ एक अलग ही किस्म के लोग जाते हैं। ज़रा उदास-से होकर मॉरिस ने कहा – ये दूसरा ही ज़माना है। पिछले करीब पंद्रह सालों से मैंने किसी नाइट क्लब में कदम ही नहीं रखा था, इसलिए मेरे लिए सब कुछ रोमांचक था। हमने डांस किया। नाचते वक्त एक पल ऐसा आया जब उन्होंने मुझे कसकर भींच लिया और कहा, हमारे  बीच कुछ भी तो नहीं बदला है। जो भी जी में आया, हमने हर तरह की बात की। लेकिन चूँकि मैं नशे में थी इसलिए उन्होंने जो कुछ कहा वह मुझे याद नहीं है। कुल मिलाकर वैसा ही हुआ जैसा मैंने सोचा था। नोएल एक बेहतरीन वकील है लेकिन महत्वाकांक्षा की शिकार है। वह ख़ुदमुख़्तार औरत है – तलाकशुदा, एक बेटी की माँ – उन्मुक्त, स्वतंत्र, आधुनिक, हमेशा व्यस्त रहने वाली। मेरे बिल्कुल विपरीत। मॉरिस जानना चाहते थे कि क्या उस किस्म की औरत के लिए वे आकर्षक हो सकते हैं। जब कीयाँ से मेरा प्यार चल रहा था तब मैंने खुद से वह सवाल पूछा था क्या मैं इस किस्म के लड़के को.... मैंने अपनी ज़िंदगी में सिर्फ एक ही बार फ्लर्ट किया, और जल्दी ही उसे बंद भी कर दिया। ज्यादातर जवान मर्द खुद जैसे दिखते हैं, हकीकत में ठीक उसके विपरीत होते हैं। मॉरिस के मामले में भी ऐसा ही था। नोएल ने उन्हें तसल्ली दी। और अंतत: ये सीधी चाहत का भी सवाल है – उसे देखकर मर्दों का मन ललचा तो जाता ही है।       
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