Wednesday, August 19, 2015

यह समय; और भवानी भाई की कविता-टिप्पणियाँ - आलोक कुमार श्रीवास्तव


बीसवीं सदी के सातवें-आठवें दशक तक बलात्कार के कुल दर्ज़ होने वाले मामलों में से लगभग आधे मामलों में आरोपियों का दोष साबित हो जाता था। आज इक्कीसवीं सदी के शुरुआती दशक का किस्सा यह है कि बलात्कार के कुल दर्ज़ होने वाले मामलों में से बमुश्किल एक चौथाई मामलों में आरोपियों पर अपराध साबित हो पाता है। इसका मतलब यह कतई नहीं कि इन दिनों बलात्कार के झूठे मामले दर्ज़ कराए जा रहे हैं, बल्कि इसका मतलब यह है कि हमारी व्यवस्था पहले से कहीं ज्यादा मर्दवादी हो गई है। यह मर्दवाद भारत के सामंती समाज में इन दिनों कुछ ज्यादा ही मुखर दिख रहा है। समाज में महिलाओं के प्रति लैंगिक संवेदनशीलता की कमी का स्तर शर्मनाक है। यह मर्दवादी नज़रिया महिलाओं को सम्मान देना तो दूर, उनका वजूद स्वीकारने से भी कन्नी काटता है। सामंती व्यवस्था के लोग किसी भी तरह स्त्री की स्वतंत्र सत्ता स्वीकार ही नहीं कर सकते। जिनके (सामंती) अस्तित्व की शुरुआत ही स्त्री को वस्तु के रूप में पाने से होती है, स्त्री के प्रति उनका नज़रिया भला इसके सिवाय और हो ही क्या सकता है। वस्तु के रूप में प्राप्त स्त्री; और फिर वस्तु के ही रूप में उस पर अधिकार, वस्तु की ही तरह उसकी नुमाइश, वस्तु के रूप में ही त्याग; कहीं भी इस सामंती व्यवहार में कोई बदलाव नहीं आता। आज के भारतीय समाज में इस सामंतवादी विचारधारा का सबसे घिनौना संस्करण ऑनर किलिंग के मामलों के रूप में देखा जा सकता है। समाज का पुरुष प्रधान होना ही इसके लिए एक मात्र कारण नहीं है, बल्कि इसके लिए सरकार और उसकी मर्दवादी प्रशासनिक व्यवस्था कहीं ज्यादा जिम्मेदार है। कहने को हम लोकतांत्रिक सरकार की शासन व्यवस्था से शासित हैं लेकिन उसका वास्तविक चरित्र आज भी सामंतवादी है। हमारे समाज और हमारे देश की सरकारों की प्रकृति आधी औपनिवेशिक और आधी सामंती है; ऐसे में लोकतंत्र के लिए जगह ही कितनी बचती है! अगर किसी समाज को समानता पर आधारित और लैंगिक भेदभावरहित लोकतंत्र की गारंटी दी जा सकती तो हम रामराज्य जैसे खोखले (सामंती) आदर्शों को उनकी औकात बता पाते। लेकिन शहरों और महानगरों में बैठकर यह नहीं हो पाएगा। औपनिवेशिक सत्ता हो, सामंती शासन हो या फिर लोकतंत्र, जिस तरह औरत और मर्द के बिना किसी समाज की कल्पना नहीं की जा सकती, उसी तरह बिना किसान और मजदूर के, बिना गाँव और कस्बे के, बिना नदी और जंगल के भारत में कोई भी व्यवस्था साकार नहीं हो सकती। लेकिन ताज्जुब की बात तो ये है कि आज औरत को किनारे धकेल कर (पुरुष?) समाज आगे बढ़ने की बेवकूफाना कवायद में लगा हुआ है; और हमारा लोकतंत्र (जैसा भी हो, अर्ध-औपनिवेशिक, अर्ध-सामंती) शहरों-महानगरों में बैठे चंद लोगों की राय को देश की राय मानकर नए-नए विधान रचता जा रहा है। जनता के बुनियादी सवालों से जुड़े मसलों पर कानून बनाने, रायशुमारी करने के लिए सरकारों की तरफ से जो कमेटियाँ बनती हैं, जो जाँच-दल बनते हैं, बड़े‌-बड़े नामों से सजे हुए जो आयोग बनते हैं उनमें कौन लोग होते हैं? शहरों में बैठे हुए मुट्ठी भर लोग। इस बेहद (राजनैतिक) चुनौती-भरे समय में भवानी प्रसाद मिश्र की (अपेक्षया कम चर्चित) कविता भारतीय समाज मुझे बार-बार याद आती है। यह कविता मुझे व्यंग्य नहीं, आज के समय में अपने मन की खीझ और तड़प की अभिव्यक्ति लगती है। प्रसंगवश, इस कविता के अंत की कुछ पंक्तियाँ देखी जाएँ :

जिंदगी पहले के दिनों की बड़ी प्यारी थी
सपने हो गये वे दिन जो रंगीनियों में आते थे
रंगीनियों में जाते थे
जब लोग महफिलों में बैठे बैठे
रात भर पक्के गाने गाते थे
कम्बख़्त हैं अब के लोग, और अब के दिन वाले
क्योंकि अब पहले से ज्यादा पानी गिरता है
और कम गाये जाते हैं पक्के गाने ।

और मैं सोचता हूँ, ये सब कहने वाले
हैं शहरों के रहने वाले
इन्हें न पचास साल पहले खबर थी गांव की
न आज है
ये शहरों का रहने वाला ही
जैसे भारतीय समाज है ।

भवानी भाई ने जिस धोखे को इस कविता के जरिए उजागर किया था, उसे आज बार-बार दुहराने-तिहराने की जरूरत है। आज वंचित-पीड़ित वर्ग के दुख-दर्द, कष्ट-मुसीबत का निर्धारण सुविधा-सम्पन्न वर्ग की स्वयंभू रिपोर्टों के आधार पर हो रहा है। पिज्जा-बर्गर खाने वाले और पेप्सी-कोक पीने वाले लोग बेखौफ दहाड़-दहाड़ कर कह रहे हैं कि गाँव वाले मुफ्तखोर हो गए हैं, इन्हें सब्सिडी पाने की लत पड़ गयी है। यह सब कुछ इतने विश्वास और इत्मीनान से चल रहा है कि आप इसी को सच मानने की गफलत में पड़ सकते हैं। इसी खतरे को भाँपते हुए भवानी भाई ने चेताया है ये सब कहने वाले/ हैं शहरों के रहने वाले/ इन्हें न पचास साल पहले खबर थी गाँव की/ न आज है। इन शहरियों की खबर भी भवानी भाई ने ली है। इसके लिए जब वे गुलाब के प्रतीक का इस्तेमाल करते हैं तब बरबस निराला की कविता कुकुरमुत्ता याद आ जाती है। सामयिक यथार्थ के सहारे, निराला से तनिक आगे जाते हुए भवानी भाई ने कविता में व्यंग्य (satire) की शैली का उपयोग कर के जिन लोगों पर कटाक्ष किया है, अब उनकी तो एक प्रजाति ही बन गई है। ये एन.जी.ओ.- मानसिकता वाले लोग हैं जिन्हें गाँव के पक्ष में प्रदर्शन तो प्रिय है लेकिन व्यवहार में ये उससे उतना ही दूर रहना चाहते हैं। क्योंकि अपनी कमजोरियों और सुविधाओं के प्रति मोह से वे खुद भी वाकिफ हैं। अफसोस की बात है कि आज के तमाम साहित्यकारों पर भी यही वृत्ति हावी है। इसे भवानी भाई ने गुलाब वृत्ति कहा है; और कुछ इस तरह की चुटकी ली है -  

बुरा नहीं मानना चाहिए
इस गुलाब - वृत्ति का
गाँव वालों को
क्योंकि वहाँ रहना चाहिए

सिर्फ ऐसे हाथ-पाँव वालों को
जो बो सकते हैं
और काट सकते हैं
कुएँ खोद सकते हैं
खाई पाट सकते हैं


लेकिन साथ ही वे इन गुलाब वृत्ति वालों की पहचान प्रकट करना और यह चेताना नहीं भूलते कि ये भद्रजन सदा-सर्वदा के लिए लोक में शामिल नहीं होंगे, अपना वैशिष्ट्य, अपनी पहचान अलग बनाए रखेंगे; और समय-समय पर अपनी प्रदर्शनी कराते रहेंगे। एक बार फिर भवानी भाई इस वर्ग की कमजोरी को निशाना बनाते हैं। इन शब्दों में -   

 
बुरा मानने की इसमें
कोई बात नहीं है
बीच - बीच में यह प्रस्ताव कि गुलाब वहाँ जा कर
चिकित्सा करे या पढ़ाये
पेश करते रहने में हर्ज नहीं है
मगर साफ समझ लेना चाहिए
गुलाब का यह फर्ज नहीं है
कि गाँवों में जाकर खिले
अलसी और सरसों वगैरा से हिले-मिले
और खोये अपना आपा
ढँक जाये वहाँ की धूल से
सरापा

और वक्तन बवक्तन
अपनी प्रदर्शनी न कराये
आमीन
, गुलाब पर ऐसा वक्त कभी न आये।

 *****     *****     *****

 हमारे समाज की यह बहुत बड़ी समस्या है कि किसी चीज़ से जिसका सीधा सरोकार है, उसी को उससे वंचित रखा जाता है। बहुमत प्राप्त लोकतांत्रिक सरकारों का आचरण ऐसा हो चला है मानो पाँच साल की तानाशाही हो। लोकतंत्र की इस विसंगति पर भवानी भाई की कविता चार कौवे उर्फ चार हौवे सीधी बात करती है। अभी हाल ही में भारत के खुदरा बाज़ार में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश की अनुमति देने के मसले पर सरकार का यह रवैया देखने को मिला। देश भर में तमाम विरोध-प्रदर्शनों और ज़बर्दस्त जन-असहमतियों के बावजूद, बगैर आम सहमति के, आम आदमी की जिंदगी पर सरकार ने दांव खेल लिया, वैसे ही जैसे पांडवों ने द्रौपदी पर खेला था। बहुमत से निर्वाचित सरकार के लिए अब जनता भी वस्तु से ज्यादा नहीं रह गई है। ऐसे ही आचरण पर टिप्पणी करते हुए भवानी भाई ने लिखा था -         

बहुत नहीं थे सिर्फ चार कौए थे काले
उन्होंने यह तय किया कि सारे उड़ने वाले
उनके ढंग से उड़ें, रुकें, खायें और गाएँ
वे जिसको त्योहार कहें सब उसे मनाएँ ।

कभी-कभी जादू हो जाता है दुनिया में
दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुनिया में
ये औगुनिए चार बड़े सरताज हो गये
इनके नौकर चील, गरुड़ और बाज हो गए ।

हंस मोर चातक गौरैयें किस गिनती में
हाथ बांधकर खड़े हो गए सब विनती में
हुक्म हुआ, चातक पंछी रट नहीं लगाएँ
पिऊ-पिऊ को छोड़ें कौए-कौए गाएँ ।

बीस तरह के काम दे दिए गौरैयों को
खाना-पीना मौज उड़ाना छुटभैयों को

कौओं की ऐसी बन आयी पांचों घी में
बड़े-बड़े मनसूबे आये उनके जी में
उड़ने तक के नियम बदल कर ऐसे ढाले
उड़ने वाले सिर्फ रह गये बैठे ठाले ।

*****     *****     *****  

अब इस समय के सबसे गरम मुद्दे की बात करें। वह आंदोलन, जो भारत में पहली बार देखा गया है। किसी समाज-सुधारक का आंदोलन नहीं, बल्कि आजादी, लोकतंत्र, कानूनन बराबरी, अपने अधिकारों  और सम्मान की माँग के लिए मर्दवादी व्यवस्था के खिलाफ भारत की औरतों का मुखर अभियान। पितृ-सत्तात्मक संरचना वाला देश का मीडिया भी इस अभियान से जुड़ने को मजबूर हुआ है। दिल्ली की दुर्घटना के बाद अधिक मुखर हुए इस आंदोलन से जुड़ी कविता कृष्णन, सुचेता डे आदि महिलाओं को मुख्य धारा की मीडिया द्वारा देसी तहरीर चौक के सितारे की संज्ञा दी गयी। मतलब यह कि मीडिया की मुख्यधारा के इतिहास में यह सब दर्ज़ हो रहा है। यह ज्यादा महत्वपूर्ण इसलिए भी है क्योंकि इसके पास स्पष्ट विचार और समस्या के समाधान मौजूद हैं। इससे पहले के औरतों के प्रतिरोध इतिहास द्वारा दबा दिए जाते थे। औरत की आजादी के मसले को मर्द की इच्छा पर छोड़ दिया जाता था। उससे कहा जाता था कि तुम्हारे मर्द का सम्मान तुम्हारा सम्मान है, लेकिन अपमान सिर्फ तुम्हारा है। उसे मर्द साझा नहीं करेगा। औरत के दमन और उस पर अत्याचार का यह अधिकार समाज के ऊपरी वर्ग को कहीं ज्यादा आसानी से सुलभ था। भारत के सामंती इतिहास में अगर औरत के लिए सबसे दारुण यातनाघर कोई था तो वह था रनिवास। भारतीय इतिहास के मध्यकाल के दर्शन इक्कीसवीं सदी में भी बार-बार हो रहे हैं। भवानी भाई ने मर्द की इस मध्ययुगीनता पर बीसवीं सदी में टिप्पणी की थी। उन्नीसवीं सदी में अंग्रेजी के विक्टोरियन युग के शुरुआती कवि राबर्ट ब्राउनिंग ने इसी विषय पर एक मर्द का बेहयाई-भरा बयान ड्रामैटिक मोनोलॉग की शक्ल में अपनी कविता माई लास्ट डचेस फरेरा के माध्यम से प्रस्तुत किया था। (इससे पीछे जाएँगे तो सचमुच का ही मध्ययुग आ जाएगा। हम बात इस समय; यानी आधुनिक काल की कर रहे हैं।) भवानी भाई की कविता है सन्नाटा। कविता के भीतर तैरती है एक कथा। ऑनर किलिंग का राजसी आख्यान है इस कविता के भीतर किसी गंदले तालाब में उतराती हुई किसी फूली लाश की तरह। एक सामंत के किले में बंधक बना कर रखी गई एक औरत की हत्या का किस्सा नया तो कतई नहीं था भवानी भाई के लिए, लेकिन सन्नाटे के मार्फत उन्होंने इस किस्से पर जिस तरह टिप्पणी की, वह इसमें एक कवि का अर्थपूर्ण हस्तक्षेप है। कविता सन्नाटे के आत्म-कथ्य से शुरू होकर जन-श्रुति की एक कथा के जरिए इस मुद्दे पर कवि की टिप्पणी के अंजाम तक पहुँचती है। औरत के दमन की कहानी को रहस्य की भयानकता में लपेटने की साजिश के तहत चुप्पी (मौन/गोपन/इज्जत का वास्ता/भूत-प्रेत का भय) को आगे धकेला जाता है। खुद सन्नाटे का बयान है - 

कुछ जन श्रुतियों का पहरा यहाँ लगा है,
जो मुझे भयानक कर देती है छू कर।

सन्नाटे की इस भयानकता के बीच कवि ने एक नया काम किया है। वह काम जिसे इतिहास ने जान-बूझकर नहीं किया। इतिहास ने जिस बात को जनश्रुतियों के हवाले करने की गुस्ताखी की, कवि ने उसे शब्दबद्ध करने का जिम्मा उठाया। बात तो सिर्फ चार लाइन की है -                 

 
यहाँ बहुत दिन हुए एक थी रानी,
इतिहास बताता उसकी नहीं कहानी
वह किसी एक पागल पर जान दिये थी
,
थी उसकी केवल एक यही नादानी!


 

लेकिन आगे का विवरण देकर कवि ने घटना को विमर्श में रूपांतरित कर दिया है। ब्राउनिंग अपनी कविता में यह बात पूरी तरह साफ नहीं करते कि ड्यूक की मृत पत्नी (डचेस) और फ्रा पेडॉल्फ नामक चित्रकार के बीच का क्या रिश्ता था (हालांकि संकेत पर्याप्त हैं, लेकिन कवि को भी तो साहस करना चाहिए था) जबकि भवानी भाई दो टूक कह देते हैं – वह किसी एक पागल पर जान दिए थी। इसी तरह ब्राउनिंग की कविता की स्त्री की मृत्यु का तरीका (मोडस ऑपरैंडी ऑफ किलिंग) भी जाहिर नहीं है जबकि सन्नाटा में इस कुकृत्य का पूरा चित्र ही उपस्थित कर दिया गया है -‌    

 
तुम जहाँ खड़े हो, यहीं कभी सूली थी,
रानी की कोमल देह यहीं झूली थी
हाँ
, पागल की भी यहीं, यहीं रानी की,
राजा हँस कर बोला
, रानी भूली थी।

 
इस तरह यह दुहरा हत्याकांड (डबल मर्डर) हमारे सामने आता है। इसी के बाद हम इस कविता के सबसे मजबूत और जरूरी हिस्से से रू-ब-रू होते हैं –

 
किन्तु नहीं फिर राजा ने सुख जाना,
हर जगह गूँजता था पागल का गाना
बीच बीच में
, राजा तुम भूले थे,
रानी का हँसकर सुन पड़ता था ताना।


 
यहाँ हत्यारे की मनोदशा के ब्यौरे के बीच, सन्नाटे के मार्फत, दिवंगता स्त्री का पक्ष भी भवानी भाई रखते हैं, हालांकि उस पक्ष में कोई तीखा तेवर नहीं है, लेकिन अपने उत्पीड़न के खिलाफ एक लाचार स्त्री के प्रतिरोध की गूंज तो रानी के ताने में है ही, वैसे ही जैसे अभी दिल्ली में गिरोहबंद दरिंदों के खिलाफ 23 वर्षीया बहादुर दामिनी ने एक लाचार लेकिन भरपूर प्रतिरोध किया। इस प्रतिरोध के बाद की स्थितियों में समाज और सरकार की पितृ-सत्तात्मक व्यवस्था के भीतर औरतों के सामाजिक और राजनैतिक हस्तक्षेप की ज़रूरत बढ़ गई है, जिसे पूरा करने के लिए लड़कियाँ खुद आगे आ रही हैं। बिल्कुल अभी-अभी बी.एच.यू. से लड़कियों के ऐसे हस्तक्षेप की खबर मिली है, मन में उम्मीद और आश्वस्ति के भाव जगे हैं। भवानी भाई, आप की कविता-टिप्पणियों पर ठोस कार्रवाई शुरू हो गई है।

 

No comments: