Wednesday, August 19, 2015

अदालतें भी बन सकती हैं जनता की आवाज़

बम्बइया हिंदी फिल्मों ने कानून को लेकर जो पॉपुलर संवाद दिए हैं उनमें कानून अंधा होता है और कानून के हाथ लम्बे होते हैं इत्यादि के माध्यम से दो अतिवादी विचारों को स्थापित करने की कोशिश की गयी है। अर्थात् या तो कानून जड़ अथवा मशीनी तरीके से काम करता है या फिर वही सर्वशक्तिमान होता है और कोई भी उससे बच नहीं सकता। यह शायद ही कहीं बताया जाता हो कि अन्य संस्थाओं की ही तरह अदालतें भी शासकवर्ग अथवा जनता के विचारों की वाहक होती हैं।
हाल ही में अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा एक ऐसा फैसला सुनाया गया है जिसने दुनियां भर की तमाम अदालतों को अपने काम-काज के तरीकों पर पुनर्विचार करने को मजबूर कर दिया है। ओबरजेफेल् बनाम हॉजेस 2015 डब्ल्यूएल 2473451 मामले में अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा दिये गये निर्णय ने दुनियां भर का ध्यान आकर्षित किया है, जिसमें न्यायालय ने एक ही लिंग वाले जोड़े के विधिक रूप से वैध विवाह करने के अधिकार को मान्यता दी है। यह एक ऐसा अनूठा उदाहरण है जिसमें विधायिकाओं द्वारा बनाए गए कानून को न्यायालय द्वारा असंवैधानिक पाया गया। न्यायालय ने बहुमत से व्यवस्था दी कि एक ही लिंग वाले जोड़े विवाह करने के अधिकार का उपयोग कर सकते हैं। न्यायालय के अनुसार, विवाह संविधान के अंतर्गत मौलिक अधिकार है और यह एक ही लिंग वाले जोड़ों पर भी समान रूप से लागू होता है। न्यायालय ने कहा कि विवाह के संबंध में निजी पसंद का अधिकार व्यक्तिगत स्वायत्तता की अवधारणा में अंतर्निहित है।
यहाँ यह देखना रोचक है कि ऐसे ही एक मामले [सुरेश कुमार कौशल बनाम नाज़ फाउंडेशन (2014)1 एससीसी 1] में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 की संवैधानिक वैधता पर निर्णय सुनाते हुए किस प्रकार का रवैया अपनाया। उक्त मामले में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने निष्कर्ष दिया कि धारा 377 किसी विशिष्ट व्यक्ति या पहचान या पसंद को अपराध की श्रेणी में नहीं रखता बल्कि इसमें कतिपय ऐसे कृत्यों की पहचान की गयी है जिन्हें करने पर अपराध नियत होगा। इस प्रकार का प्रतिषेध लैंगिक पहचान और पसंद से निरपेक्ष रहते हुए यौन आचरण को विनियमित करता है और यह संवैधानिक है। जब तक संसद हस्तक्षेप करके भारतीय दंड संहिता के विवादास्पद प्रावधानों को न हटा दे अथवा देश का सर्वोच्च न्यायालय स्वयं अपने निर्णय की समीक्षा न करे तब तक भारत में समान लिंग वाले विवाह विधि का प्रवर्तन कराने वाली एजेंसियों को स्वीकार्य नहीं होंगे।
यहाँ पर दो लोकतांत्रिक देशों की इन सर्वोच्च अदालतों द्वारा एक ही किस्म के मामले में दिए गए निर्णय में भिन्नता के कारणों को समझने की जरूरत है। जैसा कि ऊपर कहा गया है, न्यायालय या तो शासकवर्ग की भाषा बोलते हैं या फिर वे जनमानस की इच्छाओं-आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति करते हैं। उपर्युक्त मामले में अमेरिका में चूँकि व्यक्तिगत स्वायत्तता को लेकर जन-आंदोलन मुखर हैं और उनकी आवाज़ संसद से सड़क तक और विद्यालयों से न्यायालयों तक गूँज रही है, इसलिये सर्वोच्च न्यायालय के फैसले में भी उसकी अभिव्यक्ति देखी जा सकती है। वहीं भारत में नागरिकों की व्यक्तिगत स्वायत्तता पर इतने हमले हो रहे हैं और यौन-स्वतंत्रता की माँग करने वालों का सरकारी एजेंसियों द्वारा इतना क्रूरतापूर्ण दमन-उत्पीड़न किया जाता है कि बिना किसी अपराध के ही मानों वे पूरी सजा भुगत लेते हैं। स्थिति कितनी भयावह है, इस बात का अंदाजा इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि समान लिंग के विवाह की बात छोड़ भी दी जाए तो अभी स्वेच्छा से विपरीत लिंग के विवाह भी हमारे समाज में कोप का शिकार बन रहे हैं। धर्म और संस्कृति के नाम पर थोपी गयी झूठी नैतिकताएं ऐसी हैं कि कुछ महीनों पहले तक मध्य प्रदेश सरकार के एक वरिष्ठ मंत्री अपने समलैंगिक संबंध को स्वीकार कर पाने का साहस नहीं जुटा सके थे। यह भी कोई छिपी बात नहीं है कि दुनियां के अन्य देशों की ही तरह भारत में भी यौन संबंधों में समलैंगिक झुकाव वाले लोगों की संख्या काफी है और यह कोई असामान्य बात नहीं है। असामान्य है इसकी अभिव्यक्ति करने में लोगों का संकोच और झिझक। जनता द्वारा अपनी आवाज़ खुद पुरज़ोर तरीके से न उठाए जाने का फायदा शासक-वर्ग को मिलता है और वह अपनी पसंद-नापसंद को कानूनी जामा पहनाने के लिए अदालतों का इस्तेमाल करता है। भारत में यही हुआ है। हमारे सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता की धारा 377 की वैधानिकता के मसले पर गेंद संसद (विधायिका) के पाले में डालकर अपना कर्तव्य पूरा किया जब कि अमेरिका की सर्वोच्च अदालत ने समलैंगिक विवाह को सीधे-सीधे व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार के रूप में व्याख्यायित करके सही मायने में अपना काम पूरा किया। लेकिन अमेरिका में ही क्या यह बिल्कुल सहज प्रक्रिया रही होगी? नहीं, यह उस जन-दबाव के बाद मुमकिन हुआ होगा जिसने ऑकूपाई वाल स्ट्रीट सरीखे आंदोलनों के माध्यम से शासक-वर्ग की नींद उड़ा रखी है। महिलाओं द्वारा सार्वजनिक स्थलों पर बच्चों को स्तनपान कराने का आंदोलन भी ऐसा ही एक आंदोलन है जिसने स्त्रियों की व्यक्तिगत आजादी को अभिव्यक्ति दी है और दुनियां भर का ध्यान आकर्षित किया है। कुल मिलाकर देखा जाए तो समलैंगिक संबंधों और विवाहों की वैधता के इस मौजूदा प्रसंग ने इस बात की पुष्टि कर दी है कि अगर समाज में जन-आंदोलन मौजूद हों और जनता की आवाज़ बुलंद हो तो न्यायालय भी जनता की आवाज़ की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सकते हैं।

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