यह एक खाली पड़ा तलाव1 है ।
राजाराम के इंजन,
लालजी की भट्ठी
और मोती के सुअरबाड़े के
बाद
जो थोड़ी-सी खड़ंजा सड़क है
उसके आजू-बाजू यही तो है ।
हर डेढ़ बालिश्त या एक हाथ
के फासले पर
आधे इंच की दरार लिए काली
मिट्टी
बताती है
कि यह तलाव हमेशा खाली
नहीं रहता ।
बात सिर्फ खाली रहने
या भरे रहने की नहीं है,
बात दलईपुर की पहचान की है
।
खाली हो या भरा
दलईपुर का पर्याय यह तलाव
अब एक पुलिया बन जाने के
बाद
छोटका2 तलाव और
बड़का3
तलाव –
दो हिस्सों में हो गया है।
पुलिया स्वर्गीय बाबूलाल
सभापति की दी हुई है
और खड़ंजा
उनके बेटे रामखेलावन परधान
का
गो कि ग्राम प्रधान अब कोई
और है
मगर दलईपुर की पहचान
तलाव के बाद
खड़ंजा और पुलिया ही हैं ।
बीसवीं सदी के मध्याह्न का
यह मुंशी छोटे लाल का गाँव
है,
उनसे कुछ पहले मुंशी
ज़लाहलदीन का,
बीसवीं सदी के अवसान की
बेला में
इस गाँव की मनुष्यगत पहचान
से जुड़े हैं
दलित क्षत्रप नेता धनीराम
और इक्कीसवीं सदी के इन
शुरुआती सालों में
मैं भी रहना सीख रहा हूँ
दलईपुर में
अपनी; और इसकी संयुक्त पहचान के साथ ।
गाँव की भौगोलिक पहचान बना
‘डेलईपुर’ वालों का यह ‘तलाव’
नवागंतुक गँवइयों के लिए
गड़ही4
है
और शहरियों के लिए तालाब,
कोई फैन्सी साहित्यिक इसे
पोखर भी कह देता है
और विद्वज्जन जलाशय,
बिना यह जाने
कि छोटका तलाव बिलासे ने
ले लिया है
और बड़का दिनेस डाक्टर ने
मछली-पालन के दस साल के
पट्टे पर ।
गो कि अब भी इसमें
सहरी, सउरी और पहेना नाम से विख्यात
सर्वाधिक लोकप्रिय मछलियाँ
रहती हैं,
सयान5 लोग
बताते हैं
कि सींघी, बाम और कटेहरी मछलियाँ भी
रहती थीं यहाँ बहुतायत में
और साथ ही सुनाते हैं
सींघी के हमले की दास्तान
बहादुरी के साथ,
मगर सुनता कौन है ?
...अनंतराम भी गुजर गये
जो सयान लोगों को
हमेशा सग्गियान6 कहते थे
और तमाम मतभेदों के बावजूद
मछरी-पुराण मन लगाकर सुनते
थे ।
दलईपुर के पारिस्थितिक
तंत्र के भीतर
गाँव वालों के लिए
दूसरी गर्व करने की चीज़ है
–
नइहर7 में
टिकी
थानदानिन मइया8 का
मंदिर,
जो डेलईपुर वालों का
महरानी का थान है,
जिसमें बैठकर बीड़ी पीते
और जुआ खेलते हुए
जगा गोपाल बाबू में
भक्तिभाव;
और संतोष मुंशी जी की
घोटाले की तमाम सफल
कोशिशों के बावजूद
यह मंदिर की शक्ल ले रहा
है ।
हालांकि पूजा-पाठ की
एक भी निश्चित प्रविधि
नहीं जानते दलईपुर के लोग
पर ग्रामदेवी से रिश्ता
बनाए हुए हैं
लगातार और मीठा,
चालीस साल पहले आयी
हैजे की महामारी से
निहत्थी लड़ी ग्रामदेवी
अब काली और दुर्गा के
अवतार के रूप में
प्रतिष्ठित और मान्य हैं
और दलईपुर की पहचान से
वैसी ही जुड़ी हैं
जैसे तलाव, पुलिया और खड़ंजा ।
इस ‘पहचान’ की कड़ी में
इधर एक मनोरोग भी जुड़ने
लगा है
और इससे जो सबसे बड़ा खतरा
बना है
वो ये
कि कहीं दलईपुर पागलों का गाँव
न कहा जाने लगे !
और तब
कहीं तालाब, पुलिया, खड़ंजा और ग्रामदेवी
से भी ऊपर की जगह
यह मनोरोग ही न हथिया ले !
देर बस इतनी है
कि जब तक कोई ‘सबसे तेज़’ चैनल किसी ‘आँखों
देखी’ में
सब कुछ के साथ यहाँ के
मनोरोगियों को शूट करने
न आ पहुँचे !
त्रिलोकी बाबा उर्फ पुजारी
चाचा
और मुंशी मेवालाल से लेकर
पुत्तन वकील और बाला पटेल
के पगला जाने को
देखा है दलईपुर ने,
हाल के दिनों में
बेहद दुखद रहा है
रंजू, नीलू, मंजू आदि लड़कियों का पागलपन ।
सिर्फ डॉक्टर टंडन ही
इन मनोरोगियों की एकमात्र
आशा हैं
जो कि एक बार ‘देखने’ की फीस लेते हैं
ढाई सौ रुपए नगद
और साथ ही साल में दो-चार
बार
चले जाते हैं विदेश
इन पागलों को बेसहारा
छोड़कर ।
वैसे भी
दलईपुर में
बहुतों को
बेसहारा रहने की आदत पड़
गयी है,
हारी-बीमारी तो एक बात है
यहाँ निचाट जिंदगी में
बेसहारा रह आये हैं लोग
कोई गाँव की सरहद में
तो कोई गाँव के बाहर,
पर मामला तो आखिर दलईपुर
का ही होता है ।
जैसे, दो कमाऊ बेटों की माई
रजगिराइन दादी,
स्वर्गीय बुधराम राजगीर की
बेवा,
झुकी शरीर और बेसहारा मन
लिए
देखते-देखते सिकुड़ी, ऐंठी...
और छोड़ गयी दलईपुर को
हँसते-खेलते ।
जैसे लाला मिथिलेश,
अपना घर-दुआर, खेती-बारी
सब कुछ भूल-भालकर
किसी दीवाने की तरह
बेसहारा होकर
अभी तक लापता हैं
दलईपुर की प्रतिष्ठा को
सिर-माथे रखकर ।
जैसे पाँच जवान-जिम्मेदार
भाइयों की सबसे छोटी बहिन
सुमिंतरा ने
बिताए दलईपुर में
पाँच-एक साल
बेसहारा,
विधवा माँ की मौत के बाद
मिर्गी के दर्ज़नों दौरे
झेलकर;
और अब
शायद किसी सहारे की टोह
में
लापता है दो-तीन सालों से
चुपचाप; और मर्यादा के साथ...
हालांकि कुछ लोग यह भी
कहते हैं
कि सुमिंतरवा
किसी बूढ़े के साथ
‘बैठ’ गयी है9
और अगर ऐसा हो गया हो
तो उसके मन को कम-से-कम
एक सहारा तो मिलता होगा
यह सोचकर
कि अभी एक नइहर है –
दलईपुर ।
खासी महत्वपूर्ण है
नइहर की अवधारणा यहां
थोड़े हेर-फेर के साथ
विवाहिताओं और अविवाहिताओं
के बीच
‘नइहरे’ का प्रत्यय
काफी आकर्षक ठहरता है ।
जब कि
इसी का समानांतर सत्य यह
भी है
कि सम्पतिया और चँदवा
कुँवारी ही नइहर की
अवधारणा पर विचार करते-करते
स्वर्ग सिधार गयीं
क्योंकि ‘नइहर-सासुर’ की उमर में
वे बीमार हो गयी थीं
और इलाज; और फिर विवाह के
दोहरे खर्च के मुकाबले
बहुत सस्ता
और सुविधाजनक था उनका मर
जाना ।
ऐसे ही सुविधाजनक तरीके से
झेल रहे हैं अंधापन
भुल्लर के दादा – अलगूराम ।
शहर में
तेलियरगंज, शिवकुटी या कटरा में
सीमेंट की दुकानों पर
सीमेंट की बोरियाँ
लादते-उतारते,
खो चुके हैं
सिर के बाल
और आँखों की रोशनी, एक साथ
जब कि दोनों जवान बेटे
भुल्लर और अर्जुन भी
कमाने की हर चंद कोशिश कर
रहे हैं
मगर अलगू के अंधेपन का
इलाज
मुमकिन नहीं है यहाँ,
बल्कि बड़ी बेसब्री से
इंतज़ार है
दलईपुर को
उनके गुज़रने का !
....और तब शायद मिल सके
भुल्लर की माई को विधवा
पेंशन
जिसके लिए बाकायदा
दोनों परानी आँख मूँदकर
डाल चुके हैं वोट
बब्बू नेता की निगरानी में
।
आशा और विश्वास की अंतिम
वजह ये
कि दलईपुर के तलाव पर
पुलिया, खड़ंजा और काली माई का मंदिर
सब उनके सामने ही बने हैं ।
1. तालाब 2. छोटा वाला 3. बड़ा वाला 4. गड्ढे का
स्त्रीलिंग। ऐसा गड्ढा जिसमें अक्सर पानी भरा रहता है। 5. वरिष्ठ 6. जानकार, ज्ञानवान 7. मायका 8. स्थानीय देवी 9. स्वेच्छा से बिना विवाह के ही
पत्नी के रूप में रहने लगी है। अंग्रेजी के ‘लिव-इन’ जैसे संबंध का
वाचक अवधी मुहावरा।
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