Sunday, September 20, 2015

फिर दलईपुर


मैं याद करना चाहता हूँ

कोई ऐसी लोककथा

जिसे सुनाकर

यह प्रमाणित कर सकूँ

कि मैं रह चुका हूँ

गाँव का बासिंदा1

गाना चाहता हूँ

कोई ऐसा लोकगीत

जिसकी धुन से

टपक पड़े

निछान2 गँवई सुर,

रचना चाहता हूँ

एक ऐसा धुरपंगा3

जिसके भीतर का भोंदूपन

सिर्फ गँवारों के

दिमाग के बस का हो,

दोस्तो !

कुल मिलाकर

मेरी ख्वाहिश

दलईपुर लौटने की है ।

 

मैं नहीं लौटना चाहता

किसी अम्बेडकर ग्राम में

न मुझे दरकार है

डामर की सड़क

और हाथी की मूरत,

बहन जी की

सोशल इंजीनियरिंग से

तनिक भी

प्रभावित या विचलित

नहीं हूँ मैं,

मगर साथ में

यह भी उतना ही सच है

कि क्या खाकर झेलूँगा

गाँव का यथार्थ

दलईपुर लौटकर ।

 

तलाव

अब भी खाली पड़ा है

मुँह बिराता-सा4

शिव के धनुष की माफिक

और स्वयंवर में

सीता की जगह

अब दाँव पर है

दलईपुर ।

 

लालजी की भट्ठी

ठंडी हो चली है

और ग्राम सड़क योजना के वास्ते

लालजी, राजकरन और मुन्ना –

तीनों बाप-पूत

जुटे हैं

माटी फेंकने की मजूरी में

इस भरोसे के साथ

कि अस्सी रुपए रोज़ का

खरा धंधा कर रहे हैं,

जब कि मोती का भाव

कुछ ज्यादा ही बढ़ गया है –

इस्माइलपुर से लेकर

मलकिया तक के सेठ

घर छेंके रहते हैं मोती का

मोटर-साइकिल लेकर

मगर मोती

ईमान का धंधा करते हैं

एक ही सेठ के साथ

तब तक वफादारी निभाते हैं

जब तक अगला सेठ

प्रति बोरी

एक रुपया बढ़ा नहीं देता,

बावजूद इसके

मोती हर हाल में

लौट आते हैं भोर से पहले

सीमेंट बनाकर

क्योंकि लवकुश की दौड़ के अभ्यास के वक्त

वे साइकिल से साथ लगे रहते हैं,

उम्मीद यह

कि मैराथन में दौड़ेंगे लवकुश,

नोकरिया जाएँगे

तो बदल जाएगी किस्मत,

देवी-देउता मनाने से

अब तक जो नहीं हुआ

शायद वह लायक पूत कर दे,

इसे उम्मीद मानिए

या चुनौती

मगर सुनने-सोचने में

किसे नहीं सुहाता यह ?

 

लौकुस की अम्मां गिरधरही भी

दौड़ सकती थी इंदिरा मैराथन

और बदल सकती थी

गिरधरपुर की किस्मत

और अपना नाम,

एक साथ ।

बहुत बार आयी भी

उसके मन में यह बात

जब कजियानी की शास्त्री देवी ने

मैराथन दौड़कर

भर दी थी

तमाम दलित लड़कियों के मन में उमंग

और फेफड़ों में ताज़ा हवा

तब कितनी ही

दूसरी लड़कियों की तरह

लौकुस की अम्मां ने भी

सुअर चराना छोड़कर

मैराथन में हिस्सा लेने का मंसूबा बाँधा था ।

और यह मंसूबा

कोई हवाई किला नहीं था,

बल्कि बहुत करीब था उसके

इतना, कि ज़रा दम बाँधकर

हासिल करने लायक ।

क्योंकि बजुई और धामापुर से लेकर

गोरइयन के ताल तक

सुअरों के पीछे दौड़ना

21 किलोमीटर की

महिला मैराथन से

ज्यादा अलग नहीं होगा

तिस पर

मज़े और गुदगुदी की बात ये

कि बहुत नाम, दौलत और नौकरी भी

मिल सकती है दौड़कर मैराथन

जब कि मैले की गंध के बीच

थूकते-थूकते, या साँस बाँधे हुए

गुज़रती है रोज़

सुअर-चारण की प्रक्रिया ।

गिरधरही के लिए तो 

यह सपना

अब बीती बात हो गया है

और आशा

अब लवकुश के कदमों से है

जो किरमिच के जूते चढ़ाकर

हो जाते हैं और भी मजबूत,

और बाकी का सहारा लेकर

चलते हैं पीछे-पीछे मोती

साइकिल की शक्ल में

अभ्यास के वक्त ।

...इन सपनों-उम्मीदों के बीच

मोती का सुअरबाड़ा सलामत है

जब कि लालजी की भट्ठी के

ठंडाने के साथ ही

उखड़ गया है

राजाराम का इंजन

खाँस-खाँस कर

सब कुछ नि:शेष होने तक

दमे के मरीज़

रामसुमेर की साँस की तरह ।

 

अब कुछ भी

मर्यादापूर्ण नहीं दिखता यहाँ

और न ही उल्लेखनीय

कि बहुत हुलस कर समेट लूँ उसे

अपनी कविता में

स्मृतियों में, साँसों में

मगर यह नंगा सच भी काबिलेगौर है

कि दुनियां के जिस हिस्से में

मैं रहना चाहता हूँ

वह दलईपुर की सरहद में आता है ।

यद्यपि मेरी चाहत

बहुतों की इच्छा और राय से

मेल नहीं खाती

तथापि

स्वांत: सुखाय ही सही

मैं लौटना चाहता हूँ दलईपुर

और मेरा सुख

अब लंगड़ को

आलू की बिनाई में

साठ रुपये के भुगतान से ताल्लुक रखता है ।

मेरे सुख का कोई अंश

बेरोज़गारी भत्ते के इंतज़ार में

बैंकों में पूछताछ करते

ग्रेजुएट बेकारों की साइकिल

और विशिष्ट बीटीसी की

नयी सूची के इंतज़ार में डायट घेरे खड़े बेरोज़गार शिक्षकों के

धूल भरे जूतों के दरमियान

कहीं दबा पड़ा है।

मेरे सुख की कोई किश्त

गाँव में सोलह घंटे

बिजली पाकर

रिलीज होगी ।

मगर फिर भी

बहुत कुछ बाकी रहेगा

मेरे सुखी होने में,

जिसके लिए सही रास्ता

दलईपुर पहुँचकर ही मिलेगा –

जहाँ महरानीदीन का बंस5

खतम नहीं होगा

और टंटू की किसानी और बरात देखना भी

शामिल होगा

मेरे हिस्से के सुख में

और मिल्लू की ग्रेजुएशन

मेरी किसी कविता की तरह

पूरी हो जाएगी निर्बाध,

तो क्यों न लौट पड़ूँ

इन तमाम संभावनाओं की तरफ

अर्थात् फिर दलईपुर ।

 

 
 

1. निवासी 2. शुद्ध 3. स्वांग 4. चिढ़ाता-सा 5. वंश

No comments: