Sunday, September 20, 2015

सपने में दलईपुर


सपनों में ही हो पाता है

अब दलईपुर जाना ।

 

एक निराला सपना कोई

जाने कब से देख रहा हूँ

गाँव-देस की सूरत ऐसी

जाने कब से देख रहा हूँ ।

जाने कब से देख रहा हूँ

खेतों में फसलों का होना

जाने कब से देख रहा हूँ

लगा गाँव के माथे पर

झक्कास डिठौना ।

और न जाने कब से ऐसे

लगातार मैं सोच रहा हूँ

ऐसे लिखना, वैसे लिखना

लिखना-पढ़ना यूँ ही जब-तब

शेष समय में ग्रंथ बाँचना

मौका लगते समय ताड़कर

चाह रहा हूँ चुपके-चुपके

जाने कब से, एक बार फिर

दलईपुर जाना ।

सपना दलईपुर का ही है

जाना-पहचाना,

खैर ठीक है, इसी तरह

सपने में ही

मुमकिन तो है –

दलईपुर जाना ।

 

इस सपने में

कोई गफलत, कोई हैरत

वाली बात नहीं है

सुनो बिरादर, इस सपने की

कोई जात नहीं है ।

यह है दीगर बात

कि अपने जीतलाल की दुलहिन की

बटुई1 में बिल्कुल भात नहीं है ।

ऐसे कोई भेद नहीं है

वैसे कोई भाव नहीं है

सपना ही तो है यह जिसमें

कुछ करने का चाव नहीं है ।

भात नहीं बटुई में बिल्कुल

थारी2 में दाल नहीं है

इसी तरह पहिलौंठी की बिटिया3 की मूड़ी4 

जिस पर कोई बाल नहीं है।

कौड़े5 में भूनी है मछली

और नमक के बिना चबाते

बच्चों के चेहरे पर कोई

पछतावे का भाव नहीं है ।

जीतलाल चाउर6 ले आते

पर उठने का ताब7 नहीं है

दाएं-बाएं से कुछ करते

पर वैसा भी दांव नहीं है

नहीं सोचिएगा कि उन्हें

अपनों से तनिक लगाव नहीं है

यह दुनियां है रैनबसेरा

जीवन की मस्ती, फक्कड़पन

यह कबीर का दर्शन है

जो जीतलाल के चेहरे पर

कुण्ठा, भय और तनाव नहीं है ।

ऐसे ही सपने में आती

आमे-तिर8 चाची के दुआर की दुपहरिया

सींकर9 गिरने की आवाज़

जहाँ दौड़ा देती

बच्चों को भी

बूढ़ों को भी

सपने में भी

चाची मंजूर नहीं करतीं

बिन देखे

सींकर को ले जाने देना

चाहे कोई भी हो,

और अगर

उनके मन-माफिक का सींकर

दिख जाए तो

धरवा लेतीं

बीना हो चाहे बच्चे ने

या बूढ़े ने

भारी पांवों की दुलहिन को भी

नहीं बख्शतीं

ऐसी चाची

छोड़ कहाँ सकती हैं

मुझको भी, सपने में ।

 

चाची के जैसी कद-काठी की शेट्टी मैडम

इधर जब रोज़ ही दफ़्तर में

आती हैं साड़ी पहन

तब मुझे बार-बार

आती है बिट्टी की याद ।

इधर नीलिमा शेट्टी -

उधर नीलम, उर्फ बिट्टी ।

 

बिट्टी ने पहनी नहीं साड़ी

चाहे नौकरी से निकाल दी गईं

या लड़की देखने आये

लड़के द्वारा नकार दी गईं ।

ऐसे कितने ही लड़कों से पूछा हमेशा

बिट्टी ने पहला ही सवाल –

कि साड़ी पहनने वाली लड़की तो नहीं चाहिए ?

और होती रहीं, करती रहीं रिजेक्ट

 

हाँ, खूब जमकर रिजेक्ट किया

गाँव को, देस को

दुनिया को, समाज को

धर्म को, धर्म की संस्कृति को

स्थिति को; और स्त्री के विरुद्ध

रची-गढ़ी-मढ़ी गयी

सारी परिस्थिति को

यहाँ तक कि ज़िंदगी को भी । 

फिर से गढ़ी बिट्टी ने

एक नयी ज़िंदगी

बनायी अपनी ही संस्कृति –

फिर दया की उन्होंने

अपने ही बड़े भाइयों पर ।

भाई भी हाथ फैलाने को हुए मजबूर

उन्हीं बिट्टी के सामने,

जिन्हें कभी कमरे में बंदकर

पीटा करते थे वे

लातों से, घूंसों से –

रोकने को, बरजने को

किसी कुर्मी-पासी-चमार लौंडे से

हंसकर बतियाने से ।

 

सांस तक लेने की सांसत के बीच यहाँ

बार-बार आता है याद मुझे

विद्रोह बिट्टी का

जब कच्चे कुएँ की जगत पर नहाते हुए

परसा या नन्हउआ को डपटकर

फिरवाती थीं मुँह

या मुँदवाती थीं आँखें

कपड़े बदलते समय ।

तौलिया लपेटकर

मिलती थीं अक्सर ही घर पर । 

यह साड़ी और पायजामे का

निषेध करने की युक्ति थी

उससे भी ज्यादा मर्दवाद का विरोध था 

ऐसा साफ, ज़बर्दस्त

बिट्टी का विद्रोह था ।

 

हारा कभी, जीता कभी

रुका नहीं किंतु कभी

विद्रोह बिट्टी का

याद करते हैं सभी

लेकिन मर्दवादी सब

नहीं दुहराते उसे ।

आँखें बचाते रहे बिट्टी से

मर्द उस जमाने के सारे के सारे,

उनमें शामिल थे मेरे पिता भी

और दलित नेता धनीराम से लेकर

रामसुमेर के बेटे पितई तक

पाते रहे खुद को असुरक्षित सड़क पर

बिट्टी की मौजूदगी में ।

 

घंटी बजाकर साइड मारते

आगे निकलने वाले मर्द

आज नहीं तो कल

आए ही बिट्टी की

डंडहिया साइकिल की चपेट में ।

साइकिल, कि जिसमें

मोटा-सा मजबूत बमछड़ था

ज़बर्दस्त, भारी और चौड़ा-सा कैरियर था

दुहरा स्टैंड और डंडेदार फ्रेम था ।

साइकिल की यह तफ़सील

छोड़ नहीं सकता मैं सपने में

वैसे ही जैसे 

बिट्टी को दलईपुर में ।

सपने की कविता में

साइकिल की तफ़सील

लग सकती है अप्रत्याशित,

मगर बिट्टी भी तो ऐसे ही

रहीं अप्रत्याशित दलईपुर में ।

एक पूरी मरदाना साइकिल पर

बीस साल की युवती का चलना

गड़ता रहा दलईपुर से लेकर

कस्बे सोरांव तक की आंखों में,

बिना डंडे वाली लेडीज़ साइकिल के

प्रस्ताव भी आए

मगर लौट गए सब बैरंग

ठुकराए गए जब बिट्टी से

वैसे ही जैसे गए थे देखवार10 सभी ।

शामिल थे उनमें एक युवा कवि सजातीय

आकाशवाणी से प्रसारित हुआ करती थीं

उनकी कविताएं

मगर हकलाने लगे

सूख गईं सारी कविताएं जीभ में ही, जब

बिट्टी ने पीठ पर

रखा उनके हाथ मजबूती से ।

और कहा –

खाने की तंगी है क्या कुछ जी ?

बड़े दुबले-पतले हैं !

आए थे साइकिल से युवा कवि

बैठ गयीं बिट्टी, उछलकर कैरियर पर

हड़बड़ाए, लड़खड़ाए

और भहरा-से गए

तारे दिन में ही दिखे,

संकट गहरा-से गए ।

संकट की घड़ियों से

बिट्टी ने कितनों को पहले भी उबारा था

इन्हें भी उबारा

जैसे बाकी सब लड़कों को ।

लौट गए खिसियाते, काँपते, झेंपते

और बिट्टी अगले दिन

ठठाकर बताती रहीं

चाची से, भाभी से

यारों से – शेरों से, सियारों से

घटना का जायका

बखानती रहीं जैसे

सुना रही हों

कोई कविता वीर रस की ।

रस लेकर सुनते भी रहे

उनकी बात सभी

खासकर यार –

शेर हों या सियार

लोहा तो मानना ही पड़ा उन्हें

बिट्टी की हिम्मत का

लड़की की मरदानी हरकत का ।

हाँ, उनके यारों में

हमेशा ही रह आए

पिछड़े, दलित, कम पढ़े-लिखे

या फिर निरक्षर जन

ऐसे जो उनको

चराने की कोशिश न करें

चराते रहें निर्विघ्न

अपनी भैंसों-बकरियों को

और दौड़ आएँ पुकार एक सुन कर

हाँक दें हँइचहवे11 भैंसे को खलिहान से  

कच्चे कुएँ में गिरे साँप को निकाल दें

मिलकर खींचें जोर कुएँ की रस्सी का

अपनी बारी पर बराबर चलाएँ हाथ

झूले के पटरे पर पेंग दें बराबर से

मन करे बिट्टी का जब

तो डेड़हिया12 भी दें

साथ दें उठान में

साथ उतरइया में

हों चाहे धरती पर

या कि रमें सपनों में । 

याद उन्हीं सपनों की

करते-करते अक्सर

याद मुझे आता है

ब्याह उन्हीं बिट्टी का ।  

जीत हुई बिट्टी की

मीत मिला मनमाफिक

कोई शिकवा नहीं

कि फासला उम्र का...  

या पति के साथ बेटा भी...

सपना ज्यों पूरा हुआ

बिट्टी का, बिट्टी की अम्मां का

कितनों का, और फिर मेरा भी ।

अब जब कि

दलईपुर में

पूरा हो गया है सपना

किसी लड़की का पहली बार

सोचता हूँ पकड़ रखूँ

इस प्यारे पल को

रोक दूँ काम सभी

चाहे वह घास छीलने का हो

या लिखना कविता में

वृत्त दलईपुर का ।

 

आऊँगा मित्रो !

मैं आऊँगा लेकर

इस सपने से आगे की बात कभी

कविता में नहीं किंतु

गाँव की धरती पर

लौटूंगा तथ्य और सत्य लिए

अगर साहित्य हुआ

तो समझो गद्य लिए

सच्चा और घटित यथार्थ लिए

द्वंद्व और युद्ध लिए लौटूंगा 

दुनियां में और दुनियादारी में

औरत की हिस्सेदारी

सपने से आगे

हकीकत दिखेगी जब

लौटूंगा लोक में सशरीर

लड़ूंगा मिलकर

गिरधरही, बिट्टी

सुमिंतरा, बिटाऊ

कलउती, चँदवा, लंगड़

और शंकर की दुलहिन समेत

दलईपुर की आधी से ज्यादा दुनियां के

हक की लड़ाई जब

अपने इन्हीं हाथों से

भिड़ूंगा अपनी प्यारी भांजी दीपा के लिए

अपने ही भाई से, बाप से

दलईपुर की अदृश्य खाप से

तब सपनों के लिए

यह युद्ध होगा अपनों से । 

  

1. पतीली 2. थाली 3. पहली संतान के रूप में जन्मी बेटी 4. सिर 5. अलाव 6. चावल   7. शक्ति 8. आम के पेड़ के नीचे वाली 9. आम का पूरी तरह पका फल 10. शादी के लिए लड़की देखने आने वाले लोग 11. खिंची हुई लम्बी-लम्बी सींगों वाले 12. आडी-तिरछी लय में झूले को झुलाने की क्रिया। पानी वाले साँप को डेड़ही कहते हैं, उसकी चाल की नकल करते हुए झूला झुलाने की क्रिया डेड़हियाना कहलाती है। 

No comments: